‘आओ कुछ ऐसा करें, बदले ये हालात, दिवस तराने छेड़ दे, झूम उठे यह रात‘

‘आओ कुछ ऐसा करें, बदले ये हालात, दिवस तराने छेड़ दे, झूम उठे यह रात‘
राष्ट्रीय युवा दिवस पर तुलसी साहित्य समिति की काव्यगोष्ठी

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अम्बिकापुर। तुलसी साहित्य समिति द्वारा स्थानीय विवेकानंद विद्यानिकेतन में शायर-ए-शहर यादव विकास की अध्यक्षता में ओजमयी काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वामी तन्मयानंद, विशिष्ट अतिथि डॉ. सपन सिंहा, पं. रामनारायण शर्मा, कवि व भाजपा जिला उपाध्यक्ष विनोद हर्ष थे।
मां वीणावती व स्वामी विवेकानंद के छायाचित्रों पर पुष्पार्पण पश्चात् कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। स्वामी तन्मयानंद ने विवेकानंद के दिव्य व्यक्तित्व पर व्याख्यान देते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद विलक्षण प्रतिभा एवं अद्भुत क्षमता के धनी थे। वे असाधारण विद्वान, संन्यासी, योगी, दार्शनिक, राष्ट्रभक्त, प्रखरवक्ता व भारत मां के महान सपूत थे। उन्हें उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने राष्ट्र कार्य के लिए उत्प्रेरित किया। आंख बंद कर समाधि लेने के स्थान पर उन्हें आंख खोल कर दुनिया देखने और लोककल्याण के कार्य करने की प्रेरणा दी। विवेकानंद ने जगत् को सतत् कर्मशील रहने का मंत्र दिया। पं. रामनारायण शर्मा ने विवेकानंद के जीवन वृत्त, उपदेशों व शिक्षाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया और कहा कि वे अदम्य इच्छाशक्ति से संपन्न महापुरुष थे। उन्होंने युवाओं मंे राष्ट्रभक्ति का अलख जगाया जिससे भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। उन्होंने लोगों को नवीन जीवन दृष्टि प्रदान की। वे संपूर्ण विश्व को भातृभाव से देखते थे। उन्हांेने विभिन्न देशों का भ्रमण कर भारत माता की महिमा व गौरव का गान किया। वे छत्तीसगढ के रायपुर मंे भी सन् 1877 से 1879 – दो वर्ष रहे। उन्हीं की पुण्य स्मृति में रायपुर स्थित आश्रम का नामकरण ‘श्रीरामकृष्ण मिशन विवेकानंद आश्रम’ रखा गया है। वरिष्ठ कवि यादव विकास ने कहा कि शिकागो विश्व धर्म-सम्मेलन ने विवेकानंद को विश्वविख्यात बनाया। उन्होंने अपने साढे़ चार मिनट के भाषण मंे विश्वगुरु भारत का सशक्त प्रतिनिधित्व करते हुए भारत की अप्रतिम धार्मिक सहिष्णुता, सौहार्द्र, भाई-चारा, दयाशीलता, शक्ति-सामर्थ्य की कई मिसालें पेश की। उन्होंने संघर्ष की जगह सहायता, मतभेद व कलह की जगह समन्वय व शांति तथा विनाश की जगह ग्रहण को श्रेयस्कर बताया तथा सब मिलकर एक ऐसे साझा कार्यक्रम बनाने का आह्वान किया, जिसमें सबकी सहमति हो।
काव्यगोष्ठी मंे कवयित्री व अभिनेत्री अर्चना पाठक ने युवाओं से विवेकानंद के उपदेशों का पालन व उनके आदर्शाें पर चलने की बात कही- दुश्मनों की नींद उडाने वीर युवाओं आओ तुम, हाथों मंे तलवार उठाओ, शब्द-बाण बरसाओ तुम। कवयित्री माधुरी जायसवाल ने स्वामीजी के विषय मंे सही कहा कि-संन्यासी, योगी बनकर सेवा का व्रत अपनाया। जन-जन के उत्थान को भारत मंे लक्ष्य बनाया। देश-विदेश मंे घूमकर ध्वज संस्कृति का फहराया। पूजा माना जनसेवा को, नाम विवेकानंद पाया। प्रकाश कश्यप ने अपने दोहे में विवेकानंद को युवाओं का प्रेरणास्त्रोत बताया-युवा-ज़गत् की प्रेरणा, दिया दुखों से त्राण। साधक थे वे शक्ति के, किया देश-कल्याण। डॉ. सपन सिन्हा अंचल के नामचीन कवि है। उन्हांेने अपनी कविता के द्वारा श्रोताओं को प्रेम का प्याला पिलाने की बात कही जो सबको अच्छी लगी- प्रीत दिल मंे जगा कर तो देखो ज़रा, रूठों को भी मना कर तो देखो ज़रा। झूमने सब लगेंगे तेरे सामने, प्रीत-प्याला पिलाकर देखो तो ज़रा। गोष्ठी मंे युवाकवि अम्बरीष कश्यप ने जहां सबको उम्र की किताब पढाने की बात कही कि- खुद के तजुर्बों को भी बताने लगा हूॅ मैं, उम्र की किताब पढाने लगा हंू मेैं। समझे न कोई मुझको उम्र की ढलान पर, इसीलिए अब डाई लगाने लगा हूं मैं। वहीं प्रताप पाण्डेय ने अपनी रचना मंे प्यार के लिए उम्र की सीमा को भी धता बताते हुए जिं़दादिली का ऐसा सबक़ दिया कि महफ़िल मंे हलचल-सी मच गई- अपनी उम्र का मज़ा लीजिए, जिं़दादिल रहिए जनाब। चेहरे पर उदासी कैसी ? वक़्त तो बीतेगा ही, उम्र की ऐसी-की-तैसी। इनसे भी दो क़दम आगे बढकर आले दर्ज़े के शायर यादव विकास ने अपनी ग़ज़ल मंे जिं़दगी के कुछ ऐसे सबक़ बताए, जो कभी भुलाए नही जा सकते- दिल हसरतों से लगाते क्यूं हो ? चराग़ हवा मंे जलाते क्यूं हो। जिं़दगी अपने ही क़ाबिल न रहे, जिं़दगी ऐसी बनाते क्यूं हो ?
गोष्ठी मंे वीररस के कवि विनोद हर्ष को उनके गुरु खूब याद आए। उनका मन गुरुभक्ति मंे डूब गया। अपने काव्य मंे उन्होंने गुरु के क्रोध को भी मंगलकारी बताया-हर नाते से उंचा नाता गुरु-शिष्य का नाता है। कितनी श्रद्धा है मन में, हर क्रोध गुरु का भाता है। सफल होने का गौरव लगभग उस बच्चे ने ही पाया है, जिस बच्चे ने गुरुदेव की पवित्र डांट को खाया है। गुरुओं के गुरु भगवान शंकर का ध्यान कवयित्री पूर्णिमा पटेल ने बखूबी किया। उन्हांेने अत्यंत मधुरिम स्वर में शिवभक्ति गीत की गंगा बहाते हुए सबको मंत्रमुग्ध कर दिया- देव-देव आदि देव महादेव। तुम सकल निधियों के दाता, तुम सजीवन मंत्र दाता। पूजते तुमको चरा-चर, भक्त तेरे सब बराबर। दसों दिशाएं मिल के गाएं-नमो शिवाय, नमो शिवाय। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर को आज़ादी के इतने सालों बाद भी प्रशासनिक स्तर पर कोई बदलाव महसूस नहीं हो रहा। इसीलिए उनको यहां तक कहना पडा-वही अंग्रेज़ और वही अंग्रेज़ी शासन। बदल गया है वेश पर बदला नहीं है प्रशासन। साहब, मैं जिं़दा हूं। कार्यक्रम मंे चंद्रभूषण मिश्र ने भी अपनी प्रतिनिधि कविता का पाठ किया। अंत मंे, संस्था के अध्यक्ष विख्यात दोहाकार मुकुन्दलाल साहू ने अपने दोहे मंे युवाओं मंे जोश का संचार करते हुए सुखद परिवर्तन का आह्वान किया- आओ कुछ ऐसा करें, बदले ये हालात। दिवस तराने छेड़ दे, झूम उठे यह रात। कार्यक्रम का संचालन अर्चना पाठक और आभार मुकुन्दलाल साहू ने जताया। इस अवसर पर केके त्रिपाठी, दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव सहित कई काव्यप्रेमी उपस्थित रहे।