भोजपुरी फिल्मों के नाम क्यों होते हैं बॉलीवुड की कॉपी, बता रहे हैं इंडस्ट्री के दिग्गज फिल्मकार

भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ से हुई। एक लंबे अरसे तक भोजपुरी सिनेमा के शीर्षकों में मिट्टी की खुशबू और इसकी संस्कृति की मिठास कायम रही। ‘धरती मइया’, ‘गंगा किनारे मोरा गांव’, ‘हमार भौजी’, ‘दूल्हा गंगा पार के’, ‘बैरी कंगना’ जैसे शीर्षकों से सैकड़ों फिल्में बनीं।  फिर आया ‘विवाह’, ‘संघर्ष’, ‘गुलामी’, ‘गॉडफादर’, ‘जीना तेरी गली में’, ‘बागी’, ‘अंधा कानून’, ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी भोजपुरी फिल्मों का जमाना। हिंदी सिनेमा कहानियों की कमी से जूझ रहा है और भोजपुरी सिनेमा शीर्षकों के नाम सोच न पाने के दौर से। भोजपुरी फिल्मों के नाम हिंदी फिल्मों के नाम पर रखने की क्या वजह रही है, आइए जानते हैं भोजपुरी सिनेमा के इन दिग्गजों से…..

ChatGPT Image Jul 20, 2026, 05_14_44 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 05_53_50 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 06_08_26 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 06_16_13 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 06_22_41 PM

दिनेश लाल यादव निरहुआ, अभिनेता

हमारी कोशिश तो यही रहती कि भोजपुरी फिल्मों के जो टाइटल हो वह भोजपुरी भाषा से मिलते जुलते रहे ताकि भोजपुरी सिनेमा की गरिमा बनी रहे लेकिन कभी कभी कुछ प्रोड्यूसर ऐसे ही आते है जो भोजपुरी भाषी नहीं होते और उनकी इच्छा होती है कि भोजपुरी फिल्मों का नाम हिंदी से मिलता जुलता रहे। वैसे देखा जाए तो हिंदी और भोजपुरी के दर्शक वही हैं। अगर मैने ‘निरहुआ रिक्शा वाला’ की है तो भोजपुरी में ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्में की हैं और दोनों फिल्मों को दर्शको का बहुत प्यार मिला, कहने का मतलब यह है कि आप बना क्या रहे हैं, टाइटल भोजपुरी में हो या हिंदी में इससे हमारे दर्शको पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

मनोज पांडे, लेखक 

66071dc5-2d9e-4236-bea3-b3073018714b
hotal trinetra
gaytri hospital
WhatsApp Image 2026-05-10 at 2.46.41 PM (1)
17a09f88-37fa-496a-8923-b0e0bac9f15d

देखा जाए तो भोजपुरी सिनेमा में भोजपुरी ही टाइटल  होना चाहिए तभी उसकी मौलिकता बनी रहेगी। जिस तरह से मराठी, साउथ या फिर बाकी क्षेत्रीय सिनेमा की फिल्मों के टाइटल होते हैं। भोजपुरी फिल्मों में हिंदी फिल्मों का टाइटल रखना एक तरह से मानसिक दिवालियापन है, अगर आपको हिंदी फिल्मों के टाइटल रखने हैं तो हिंदी फिल्म ही बनाइए। मुझे हिंदी भाषा से कोई समस्या नहीं है लेकिन अगर आप भोजपुरी फिल्म बना रहे हैं तो टाइटल भोजपुरी में ही होना चाहिए। 90 के दशक में जो हिंदी फिल्में बन रही थी, अब वही भोजपुरी में बन रही हैं। क्या भोजपुरी में मौलिकता नहीं है? क्या भोजपुरी में कहानियां नहीं है? आज दर्शकों के भोजपुरी सिनेमा से दूर होने का कारण कहीं ना कहीं यही है कि उन्हें उनकी संस्कृति से जुड़ी फिल्में देखने को नहीं मिल रही हैं। आज भी भोजपुरी सिनेमा के निर्माता- निर्देशक को वही विश्वास जगाना होगा जैसे ‘गंगा किनारे मोरा गांव’, ‘हंमार भौजी’ जैसी फिल्में बनती थी।

एस के चौहान, लेखक

भोजपुरी में फिल्में बहुत बन रहीं है,लेकिन जब आप टाइटल के रजिस्ट्रेशन के लिए जाते हैं तो पता चलता है कि एक एक बैनर के नाम पर पहले से ही 100-150 टाइटल पहले से ही रजिस्टर्ड है। जब प्रोड्यूसर को भोजपुरी में टाइटल नहीं मिलता है तब उसी से मिलता जुलता कोई ना कोई टाइटल रख लेते हैं। अब देख लीजिए, दिनेश लाल यादव निरहुआ जी के बैनर पर ही कम से कम 150 टाइटल रजिस्टर्ड हैं। अब भोजपुरी सिनेमा में भी काफी बदलाव आ गया है पहले भोजपुरी फिल्में पूरा परिवार साथ में देखता था और आज सिर्फ वह युवा वर्ग देख रहा है जिसके हाथ में मोबाइल है और हर भाषा की सिनेमा वह देख रहा है। इंग्लिश बोलने वाले लड़के भोजपुरी बोलने में शर्म महसूस कर रहे हैं, इसलिए भोजपुरी फिल्में हिंदी और साउथ के स्टाइल में बन रही हैं और नाम भी हिंदी से मिलता जुलता है।