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Ambikapur : ख़ुशबू से मोहब्बत के गुलशन को महकने दो.. सातों सुर गाएंगे.. चिड़ियों को चहकने दो…………..

ख़ुशबू से मोहब्बत के गुलशन को महकने दो, सातों सुर गाएंगे, चिड़ियों को चहकने दो…………..

पी0एस0यादव/ब्यूरो चीफ/सरगुजा// तुलसी साहित्य समिति की ओर से स्थानीय विवेकानंद विद्यानिकेतन में शायर-ए-शहर यादव विकास की अध्यक्षता में सरस वासंती काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि फ़िल्म एक्टर, डॉयरेक्टर व कवि आनंद सिंह यादव और विशिष्ट अतिथि कवयित्री गीता द्विवेदी व छ.ग. प्रदेश तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के कार्यकारी संभागीय अध्यक्ष दिनेश कश्यप थे।  कार्यक्रम का आग़ाज़ मां वीणावती की पूजा-आराधना से हुआ। गीतकार गीता द्विवेदी ने मधुरिम स्वरों में मां सरस्वती से विनय-निवेदन किया- तेरी दया हो, तेरी कृपा हो, हे शारदे मां, अवगुण क्षमा हो। रहे तू सदा मातु मेरे हृदय में, कुटिया से मेरी कभी न विदा हो। इसके साथ ही उन्होंने एक बेहद सरस वासंती गीत की भी प्रस्तुति दी, जिसमें ऋतुराज वसंत के व्यापक प्रभाव व सृष्टि के उत्सव मनाने का ज़िक्र हुआ और जिससे पूरी महफ़िल का माहौल ख़ुशनुमा हो गया- ले के रंग-तरंग जब आता वसंत, ख़ुशहाली चहुंओर छा जाती है, मां शारदा भी वीणा बजाती है। ले के आता वसंत सुख की सौगा़त, सारी सृष्टि तब उत्सव मनाती है। भांति-भांति के फूल तब खिल जाते हैं, भौंरे इनको देख ख़ूब हर्षाते हैं। अंगनाई में कोयल गाती है, उर आनंद-अमृत छलक जाता है। कवयित्री माधुरी जायसवाल ने अपने उत्कृष्ट काव्य में मधुमास के आगमन की सूचना पक्षियों के कलरव से होने की जानकारी साझा की- भोर से आवाजें़ आने लगीं, मैना, पपीहा, बुलबुल, कोयल भी गाने लगी। चिड़ियों की चहचहाहट ने यह ख़बर भी बता दी- वसंत ऋतु आई, वसंत ऋतु आई।

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83 वर्षीय शायर-ए-शहर यादव विकास जी ग़ज़ल की दुनिया के नामचीन हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अपनी उम्दा ग़ज़ल में जब मंज़रकशी का नायाब नमूना पेश किया, तो श्रोताओं का दिल ख़ुशी से झूम उठा। उन्होंने अपनी इस कालजयी ग़ज़ल में अपनी रूह को उतार दिया- ख़ुशबू से मोहब्बत के गुलशन को महकने दो, सातों सुर गाएंगे, चिड़ियों को चहकने दो। आसमां के सितारों! तुम ठगे रह जाओगे, महुआ के दरख़्तों से महुए को टपकने दो। मिज़ाज़ संभलता नहीं, मौसम ये शराबी है। हर कली पर शबाब आएगा, भौंरों को बहकने दो। पंछी, झरना, बादल रास्ता भूल जाएंगे, परबत की फ़ज़ाओं में कस्तूरी बिखरने दो। वसंत ऋतु में एक ओर जहां प्रकृति में सर्वत्र सुखद परिवर्तन का दौर जारी है वहीं दूसरी ओर आनंद सिंह यादव हैं, जो जीवन में कोई बदलाव महसूस नहीं करते। उन्हें जिं़दगी फ़क़त उलझनों से भरी हुई नज़र आती है। उन्होंने महफ़िल में अपने दर्दे-जिगर का बयान कर दिया- कहने को तो सारी दुनिया ही अपनी है, पर इस दुनिया में कोई भी अपना नहीं है। जीवन में उलझन-ही-उलझन है, क्या इनका कोई हल ही नहीं है। रिश्ते रह गए हैं बस नाम के दुनिया में, अपनापन अब कहीं बचा ही नहीं है! युवाकवि निर्मल कुमार गुप्ता को ऋतु के साथ-साथ ज़िदगी में फ़र्क़ साफ नज़र आया। उन्होंने अपनी कविता में कामयाबी के भी टिप्स दिए- अगर कुछ चीज़ें बदल रही हैं तो बदलने दो। ज़िदगी आसान हो जाएगी रंगों को पहचानने में। सफलता की कुंजी होशियार व जागरूक होना ही नहीं है, सफल आप तब होंगे, जब आप समझदार भी हों। कवि अभिनव चतुर्वेदी ने भी कमोबेश यही बात कही- उड़ने का ख़ुदा ने सभी को हक़ दिया है, कुछ को हौसला, कुछ को पंख दिया है। कवि अजय श्रीवास्तव ने तनहाई के आलम का दर्दनाक चित्रण किया- अकेले-अकेले कहां तक चलोगे? दिल की बातें किससे करोगे? कभी दौर ऐसा आएगा सुन लो, बेचैन होकर तुम रो पड़ोगे!

इस बार संस्था के अध्यक्ष, जाने-माने शायर व दोहाकार मुकुंदलाल साहू इश्क़ में खोए-खोए से नज़र आए। जब उन्हें वासंती दोहा सुनाने के लिए कहा गया, तो उन्होंने अपनी माशूक़ा की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ने शुरू कर दिए और महफ़िल को अपने दमदार दोहों से रौशन कर दिया- तुम आए तो ज़िदगी, हुई सनम गुलज़ार। पतझड़ में भी आ गई, फिर से नई बहार। दिलबर तेरे सामने, फीका है ऋतुराज। शरमाए सब फूल हैं, वन-उपवन भी आज। जानेमन जब से हुआ, तुमसे हमको प्यार। हरदम करना चाहता, दिल तेरा दीदार। कार्यक्रम का काव्यमय संचालन मुकुंदलाल साहू और आभार संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष कवयित्री माधुरी जायसवाल ने जताया। इस अवसर पर लीला यादव, सुधीर राणा, राजेश्वर सिंह, अजय शुक्ला, निशांत दुबे, मनीष दीपक साहू, अमित सिसोदिया, विजय गुप्ता व संजय यादव सहित अन्य काव्यप्रेमी भी उपस्थित रहे।

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