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Ambikapur : गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर तुलसी साहित्य समिति की सरस काव्यगोष्ठी…………

‘चलना तुझको किस तरह, पांव न आए मोच, मैंने पा लीं मंज़िलें, तू अपना अब सोच’

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर तुलसी साहित्य समिति की सरस काव्यगोष्ठी…………

पी0एस0यादव/ब्यूरो चीफ/सरगुजा// गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर तुलसी साहित्य समिति द्वारा स्थानीय केशरवानी भवन में पीजी कॉलेज़ अम्बिकापुर के पूर्व अध्यक्ष ब्रह्माशंकर सिंह की अध्यक्षता में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ नागरिक सुरेंद्र गुप्ता, विशिष्ट अतिथि सामाजिक कार्यकर्ता वंदना दत्ता, शायर-ए-शहर यादव विकास एवं आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर थे। संचालन सरगुजा के वरिष्ठ साहित्यकार पूर्व बीईओ एसपी जायसवाल ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मां भारती व गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के छायाचित्रों पर पुष्पार्पण से हुआ। गीत-कवि कृष्णकांत पाठक ने सुंदर सरस्वती-वंदना की प्रस्तुति दी। विद्वान ब्रह्माशंकर सिंह ने कहा कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर एक महान कवि, साहित्यकार, दार्शनिक, चिंतक, मनीषी, संगीतकार व चित्रकार थे। वे एशिया के ऐसे पहले साहित्यकार थे, जिन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनके दो गीत भारत व बांग्लादेश के राष्ट्रगान बने। वे मूलतः अद्वैतवादी थे। उन पर स्वामी विवेकानंद के चिंतन का प्रभाव रहा। उन्होंने ही गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की थी। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर ने कहा कि उन्होंने इंसानियत को हमेशा राष्ट्रवाद से ऊपर रखा तथा साहित्य, देश व समाज की अनन्य सेवा की।

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सामाजिक कार्यकर्ता वंदना दत्ता का कहना था कि गुरुदेव ने रवींद्र-संगीत का सृजन कर उसे स्वरबद्ध भी किया। वे भले ही ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे परन्तु उनका ज्ञान व अनुभव विलक्षण था। उनकी रचनाओं में प्रकृति के प्रति अपार प्रेम और मनुष्य-ईश्वर के बीच शाश्वत सम्पर्क का भाव परिलक्षित होता है। उन्होंने विनम्रता से महानता की प्राप्ति का भी संदेश दिया, जिससे जीवन को आनंदमय बनाया जा सके। सन् 1911 में कांग्रेस के 27वें अधिवेशन में उन्होंने जन-गण-मन राष्ट्रगान का स्वयं गान किया तथा एकला चलो रे गीत के माध्यम से लक्ष्य प्राप्ति का उद्घोष किया। फ़िल्मकार आनंद सिंह यादव ने उनके अनेक कहानियों व उपन्यासों की चर्चा करते हुए उनके सम्पूर्ण साहित्य को विश्व-साहित्य की अनमोल धरोहर बताया तथा उनके महान व्यक्तित्व-कृतित्व से प्रेरणा लेकर जीवन को सफल बनाने का आव्हान किया। एसपी जायसवाल ने गुरुदेव द्वारा रचित गीतांजलि, महुआ, वनवाणी, परिशेष, चोखेरबाली, कणिका, क्षणिका आदि कृतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने 2230 गीतों की रचना की, जो हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रुवपद शैली से प्रभावित हैं। इनमें मानवीय भावनाओं के विविध रंगों का चित्रण हुआ है। नवोदित कवि निर्मल कुमार गुप्ता ने गुरुदेव के संबंध में तो यहां तक कह दिया कि- मेरे शब्द और कलम अधूरे पड़ जाएंगे बताने में उनकी जीवनी। ऐसे महान साहित्यकार पर भारत को है अभिमान। शब्द कम पड़ गए कैसे करूं इनके व्यक्तित्व का गुणगान!

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काव्यगोष्ठी में कवयित्री माधुरी जायसवाल ने नारी-शक्ति के सम्मान की वकालत की- नारी ने तुमको जनम दिया उस नारी को पहचानो रे, नारी तो है जग की शक्ति-उस शक्ति को जानो रे। लोकगायिका कवयित्री पूर्णिमा पटेल ने मादक सरगुजिहा गीत से समां बांध दिया-महुआ कर रस बड़ा भारी रे संगी मोर। झिन जाबे फेड़ो तरी फूल हर मतवाही संगवारी। गीतकार कृष्णकांत पाठक की स्वीकारोक्ति सबको भा गई- लोग कहते हैं वे समझदार हो गए हैं। मैं तो अवगुणों का भंडार हो गया हूं! कवि प्रताप पाण्डेय की सलाह भी सबको रास आई- गीत प्यार के गाते रहिए। मिले अगर प्यार से कोई, गले उसे लगाते रहिए, फूलों की तरह हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहिए। कविवर श्यामबिहारी पाण्डेय ने अपनी उत्कृष्ट कविता में मानवीय जीवन में दुख-सुख को आवश्यक बताया- रंग जीवन में हो ज़रूरी है वर्ना यह ज़िदगी अधूरी है। वक़्त सबका हिसाब रखता है, थोड़ा ग़म और खु़शी ज़रूरी है। प्रसिद्ध लोककवि रंजीत सारथी ने जब मधुर स्वरों में गीत- छलक गए नैना पथरीले- का गायन किया तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।

गोष्ठी में कवि उमाकांत पाण्डेय यादों में खोए-से जान पड़े। उन्होंने मार्मिक स्मृति-गीत की प्रस्तुति देकर सबको भावविभोर कर दिया- हो गई फिर आज आंखें नम किसी की याद में, हो चला फिर मन मेरा उन्मन किसी की याद में। युवा कवि अम्बरीष कश्यप ने घमण्ड में चूर किसी सहेली का ज़िक्र किया- वो बचपन की इक सहेली है, गांव से दूर जो हवेली है। वो कभी अना को मार सकती नहीं इसीलिए आज भी अकेली है। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर ने कविता में किसी दिलकश कहानी का चित्रांकन किया- टूटा मूद्र्धा, जाग गई तब उसने कहा था- आप मेरी आजीविका हैं हूजूर और मैं आपकी सेविका सरकार। दिलों में बढ़ती दूरियों को मिटाने का पुरज़ोर आव्हान करते हुए वरिष्ठ कवि डॉ0 सपन सिन्हा ने बेमिसाल रचना प्रस्तुत की- मिलजुल आजकल ऐसा हल ढूंढ़ना है दिलों बीच दूरियों को पल में मिटा दे जी। अमीर हो, ग़रीब हो चाहे धीर-वीर हो, संग-संग जीने का सलीका जो सिखा दे जी।

शायर-ए-शहर यादव विकास शायरी की दुनिया की नायाब हस्ती हैं। उनकी ग़ज़लें व क़ताएं मानवता का मार्गदर्शन करती हैं। उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव, भाईचारा बढ़ाने का संदेश अपनी उम्दा ग़ज़ल में दिया- हादसों का पता नहीं होता, वक़्त का चेहरा नहीं होता। तुम्हें इतना याद रखना है, कोई मज़हब जुदा नहीं होता। जो अपने-आप भटक जाए, फिर कोई रास्ता नहीं होता। वरिष्ठ कवि सुरेश प्रसाद जायसवाल ‘निश्छल’ ने हाल ही में दरिमा हवाई पट्टी में नौ सीटर हवाई जहाज के निरीक्षण हेतु उतरने तथा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा हवाई पट्टी के सफल निर्माण पर खु़शी ज़ाहिर करने पर अपनी यह कविता प्रस्तुत की- नाचा-गावा-झूमा रे बाबा, अब तो खु़शी मनावा गा। दरिमा में हवाई चलिस, अधरे-अधर उड़ावा गा। कार्यक्रम में अजय श्रीवास्तव की कविता- ये अमृत-सुधा से गीत मेरे अब भजन से आगे जाएंगे-ने भी काफ़ी तारीफ़ बटोरी। अंत में, संस्था के ऊर्जावान अध्यक्ष कवि मुकुंदलाल साहू ने प्रेरणादायी दोहे सुनाकर कार्यक्रम का यादगार समापन किया- चलना तुझको किस तरह, पांव न आए मोच, मैंने पा लीं मंज़िलें, तू अपना अब सोच। पत्थर, कांटों से भरी, नहीं पेड़ की छांव। जीवन की इस राह पर, रखो सोचकर पांव। इस अवसर पर केके त्रिपाठी, हामिद अंसारी, हरिशंकर सिंह, अनिल श्रीवास सहित कई काव्यप्रेमी भी उपस्थित रहे।

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