ताजा ख़बरेंब्रेकिंग न्यूज़

DNA टेस्ट पर हाई कोर्ट का फैसला, कहा – तलाक की कानूनी लड़ाई में बच्चे को मोहरा नहीं बना सकते

राजस्थान। राजस्थान हाई कोर्ट ने बच्चे के डीएनए टेस्ट पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पति-पत्नी तलाक की कानूनी लड़ाई में बच्चे को मोहरा नहीं बना सकते। हाई कोर्ट ने कहा है कि इससे बच्चे के संपत्ति के अधिकार, सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार, निजता के अधिकार और विश्वास के अधिकार यानी भरोसा करने के अधिकार का अतिक्रमण होता है।

WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.27.06 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 8.56.40 PM (1)
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.09.46 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.06.54 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.17.22 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.12.09 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.19.42 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.04.25 PM
WhatsApp Image 2026-01-25 at 9.31.09 PM
WhatsApp-Image-2026-01-04-at-3.52.07-PM-1-207x300 (1)
53037c58-1c56-477e-9d46-e1b17e179e86

हाई कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा बच्चे को माता पिता का प्यार दुलार पाने की खुशी का अधिकार भी प्रभावित होता है। हाई कोर्ट ने कहा है कि डीएनए टेस्ट की मांग पर विचार करते समय अदालत के लिए बच्चे के हित सर्वोपरि होने चाहिए। तलाक के मुकदमे में बच्चे के डीएनए टेस्ट की मांग पर यह अहम फैसला न्यायमूर्ति डाक्टर पुष्पेन्द्र सिह भाटी ने मई के आखिरी सप्ताह में दिया।

हाई कोर्ट ने नया आधार और दलील जोड़ने की मांग की खारिज

mantr
66071dc5-2d9e-4236-bea3-b3073018714b

इस मामले में हाई कोर्ट ने तलाक के मुकदमे में पति की ओर से बच्चे के डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए तलाक की अर्जी में नया आधार और दलील जोड़ने की मांग खारिज कर दी है। पति की ओर से बच्चे की डीएनए रिपोर्ट का हवाला देकर बच्चे का पिता होने से इनकार किया गया था और मांग की गई थी कि उसे तलाक की लंबित अर्जी में इसे भी एक आधार के रूप में जोड़ने की इजाजत दी जाए। तलाक अर्जी में संशोधन की इजाजत दी जाए।

2010 में हुई थी शादी

हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में दोनों की शादी 2010 में हुई थी और अप्रैल 2018 को बच्चे का जन्म हुआ। पांच जनवरी 2019 को पति का घर छोड़कर पत्नी चली गई। रिकार्ड देखने से साफ होता है कि बच्चे के जन्म के समय दोनों (पति-पत्नी) साथ रह रहे थे, इसका मतलब है कि पति को पत्नी से संबंध कायम करने की पहुंच थी यानी वह संबंध स्थापित कर सकता था। इसलिए इस मामले में साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 में दी गई धारणा पर किसी तरह का सवाल नहीं उठता।

इस मामले में पति ने पत्नी और बच्चे को भरोसे में लिए बगैर बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया था और उसकी रिपोर्ट को आधार बना कर दलील दे रहा था कि उसमें वह बच्चे का पिता नहीं है। हालांकि तलाक के दाखिल मुकदमे में उसने सिर्फ क्रूरता को आधार बनाया था। पत्नी पर व्याभिचार का आरोप नहीं लगाया था।

Pradesh Khabar

e6e82d19-dc48-4c76-bed1-b869be56b2ea (2)
WhatsApp Image 2026-01-04 at 4.02.37 PM
WhatsApp Image 2026-01-04 at 3.36.04 PM
WhatsApp Image 2026-01-04 at 3.39.12 PM
WhatsApp Image 2026-01-04 at 3.44.45 PM (1)

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!