
यहा के नया धान का चावल का जगन्नााथपुरी में महाप्रभु को लगता है भोग, इसलिए पड़ा नाम देवभोग
हर वर्ष जगन्नाथ पुरी से भोग लेने गुमस्ता पहुचते है देवभोग, चार दिन पहले ही जगन्नाथ पुरी भेजा गया महाप्रभु के लिए भोग
120 वर्षो से 84 गांव के लोगो के द्वारा किया जाता है पुजा अर्चना और पुरे देश मे एकल मूति वाला एक मात्र मंदिर देवभोग में शेख हसन खान

गरियाबंद – करीब 120 साल पहले अंचल के 84 गांवों के लोगों ने शपथ ली थी कि हर हाल में एक साल का पूरा भोग 84 गांवों के लोगों के माध्यम से मंदिर को पहुंचेगा। आज भी लोग इस शपथ को पिछले 120 साल से पूरा करते आ रहे है। मंदिर का पूरा भोग इन्हीं 84 गांवों के लोगों से ही भगवान जगन्नााथ को चढ़ाया जाता है। इसी कारण देवभोग का नाम देवभोग पड़ा, इतना ही नहीं ये पूरे 84 गांवों के लोगों ने मंदिर बनने में भी अपना श्रमदान किया है। सन 1854 को जब मंदिर की आधारशिला तात्कालिक मालगुजार बलभद्र बेहरा द्वारा रखी गई, तो पूरे 84 गावों के लोगों ने श्रमदान करने के साथ ही बेल का गुदा, चिवड़ा, मुर्रा और रेगटा (एक विशेष प्रकार के पत्थर) का चूर्ण पिसकर मंदिर का निर्माण शुरू किया, जो 46 वर्षों की अथक मेहनत के बाद जाकर पूर्ण हुआ। इसके बाद 1901 में पहली बार नेत्रोत्सव के साथ ही भगवान की रथयात्रा देवभोग में निकाली गई। जो कि आज भी विधि-विधान के साथ लगातार जारी है।मंदिर का निर्माण बेल, चीवडा,बबूल और देशी सामग्रियों के इस्तेमाल से किया गया।इस देवभोग की खासियत भी कुछ अलग है. अक्सर घर या मंदिरों के निर्माण में रेत, ईट, पत्थर से तैयार किया जाता है, लेकिन इस मंदिर को बेल, चिवडा, बबूल और अन्य देशी समानों का इस्तेमाल कर बनाया गया है. इसी वजह से मंदिर को बनाने में 46 साल का समय लगा. इतना ही नहीं यह लगान देने की परंपरा 120 साल से चली आ रही है. आज भी देश में कई ऐसे मंदिर है जिनमें लोगों का विश्वास और श्रद्धा बना हुआ है। जय जगन्नाथ सेवा समिति के अध्यक्ष देवेंद्र बेहरा ने बताया। जय जगन्नााथ सेवा समिति के अध्यक्ष देवेन्द्र बेहरा ने बताया कि देवभोग का जगन्नााथ मंदिर काफी पुराना तो है ही, इसके साथ ही यह पूरी के बाद पूरे भारतवर्ष में दूसरी शक्ति के नाम से भी जाना जाता है। देवेन्द्र ने बताया कि पूरी में जिस तरह कई तरह के अनुष्ठान किए जाते हैं, वैसे देवभोग के जगन्नााथ मंदिर में भी देवस्नान, पूर्णिमा, जन्माष्टमी, फगुजात्रा, नेत्रोत्सव, देवउठनी और रथनिर्माण भी किया जाता है।एकल मूर्ति देश में केवल यहीं जय जगन्नााथ सेवा समिति के अध्यक्ष श्री बेहरा के मुताबिक भगवान जगन्नााथ की एकलमूर्ति पूरे भारतवर्ष में सिर्फ यहां पर ही स्थापित की गई है। जिसके चलते यहां के भगवान की एकलमूर्ति होने के कारण दधीबामन के रूप में भी जाना जाता है। नया धान का चावल पूरी जाता है और प्रतिदिन महाप्रभु को लगता है भोग समिति के अध्यक्ष देवेंद्र बेहरा ने बताया कि नया धान का चावल बनाया जाता है और बकायदा जगन्नाथपुरी से गुमास्ता देवभोग पहुंचकर हर वर्ष यहां से चावल लेकर जाते हैं यहां से जो चावल जगन्नाथपुरी जाता है उसे महाप्रभु को साल भर प्रतिदिन भोग चढ़ाया जाता है अभी चार दिन पहले ही पूरी से गुमास्ता देवभोग पहुंचा था जिन्हें विधिवत पूजा-अर्चना के साथ नया चावल दिया गया है उन्होंने बताया देवभोग के पुराने थाना के रिकॉर्ड में बड़े बड़े अक्षरों में यह लिखा हुआ है कि यहां से जगन्नाथपुरी में भगवान महा प्रभु को भोग चढ़ाने के नाम से इसका नाम देवभोग पड़ा है।












