कोल मजदूरों को जिस तरह से छठनी सरकार कर रही है उसका घोर विरोध करते हैं स्वामी नाथ जायसवाल।

नई दिल्ली प्रेस वार्ता में भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने बताया एततद्वारा आपको सूचित किया जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस [Indian National Trades Union Congress (INTUC)] से कुछ अधिक रूप से सूत्रों एवं समाचार पत्रों में छपी खबरों के आधार पर यह पता चला है कि कोल इंडिया प्रबंधन ने हर साल 5 फीसदी कर्मचारियों की छंटनी का प्रस्ताव तारीफ किया है, जिसका भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस [Indian National Trades Union Congress (INTUC)] द्वारा पुरजोर विरोध किया जाता है। सरकार के स्वामित्व वाली कोल इंडिया लिमिटेड ने सोमवार को वित्त वर्ष 2020-21 की मार्च तिमाही के नतीजों का एलान किया। इस दौरान कंपनी का कंसॉलिडेटेड प्रॉफिट 1.1 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 4,586.78 करोड़ रुपये रहा। लाभ में कमी का कारण कम बिक्री रही। कोल इंडिया ने बीते मंगलवार को बयान जारी कर बताया कि कंपनी की लागत में कमी लाने के लिए हर साल 5 फीसदी कर्मचारियों की संख्या कम की जाएगी और यह प्रक्रिया 5 से 10 साल तक जारी रहेगी। वर्तमान में खनन कंपनी कोल इंडिया में 2,72,445 कर्मचारी कार्यरत हैं। और यदि यह प्रक्रिया 5 से 10 साल तक जारी रही तो अगले 10 सालों में कोल इंडिया में कर्मचारियों की संख्या 1,40,000 तक रह जाएगी। मैं आपको बता देना चाहता हूं कि यह सरकार की मजदूर विरोधी नीति है जिसका भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस [Indian National Trades Union Congress (INTUC)] द्वारा पुरजोर विरोध किया जाता है।

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हमारी लड़ाई किसी सरकार विशेष से नहीं बल्कि मजदूर विरोधी नीतियों और कानून से है। केंद्र सरकार लगातार कोयला उद्योग में कार्यरत कामगारों हितों के खिलाफ कदम उठा रही है। श्रमिक अधिकारों में कटौती, सुविधाओं में कटौती, मजदूरों की छंटनी, कोयला खदानों का निजीकरण, कोल इंडिया में विनिवेश आदि सारे कार्य केंद्र सरकार की मजदूर विरोधी नीति के पुख्ता सबूत हैं। इतना ही नहीं राष्ट्रीयकरण के पूर्व जो स्थिति कोयला मजदूरों के समक्ष थी वही आउटसोर्स कंपनी में कार्यरत मजदूरों के साथ लागू है। मजदूरों से आठ घंटे के बदले 12 घंटे काम लिए जा रहे हैं, जबकि वेतन समझौते के अनुसार उन्हें भी स्थाई मजदूरों जैसी सारी सुविधाएं मिलनी थी। आउटसोर्स कंपनियों में मजदूरों का शोषण हो ही रहा है। शोषण का चाबुक सभी स्थाई मजदूरों पर भी चलने लगा है। केन्द्र सरकार अब अनुकंपा के आधार पर श्रमिकों के आश्रितों को नौकरी देने के बजाय अलग-अलग नियम बनाने पर आमादा है। यह तो जैसे कोयला कर्मियों के जीवन का काला अध्याय प्रारंभ हो चुका है। अगर अभी भी हम चुप रहे तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।
इसके पहले भी कोल इंडिया ने एसईसीएल के अलावा अन्य कोयला कंपनियों में काम करने वाले अधिकारियों के लिए एग्जीक्यूटिव रिटायरमेंट बिफोर सुपर सुपरन्यूएशन स्कीम लागू की थी। जिसमें नियमों के तहत अधिकारी सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर सकते थे। कोल इंडिया कंपनी लागत में कमी लाना चाहती है, ऐसे में खराब परफॉर्मेंस वाले या बीमार अधिकारियों को बाहर करने की योजना है। क्योंकि ऐसे अफसरों को वेतन रूप में मोटी रकम कंपनी को हर माह देना पड़ रहा है। यही कारण कर्मचारियों के मामले में भी है, इसलिए कंपनी में वीआर स्कीम की तैयारी है। इससे एसईसीएल में वीआरएस से 3 हजार से ज्यादा कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं। सरकार के इस फैसले से कोल इंडिया के निजीकरण का रास्ता साफ हो गया है। विदेशी निवेशक अपनी पूंजी कोयला उद्योग में लगाएंगे। श्रम सस्ता होने से उनका कोयला बाजार में कोल इंडिया के कोयले की तुलना में सस्ता होगा। उनके कोयले की मांग बढ़ेगी। कोल इंडिया को कोयला बेचने के लिए संर्घष करना होगा। कंपनी से मंहगे दर पर कोई कोयला नहीं खरीदेगा। इसका सीधा असर कोल इंडिया पर पड़ेगा। कंपनी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। धीरे-धीरे कोयला उद्योग निजी हाथों में चला जाएगा। सरकार के इस फैसले से कोयला उद्योग राष्ट्रीयकरण के पूर्व की स्थिति में पहुंच जाएगा। कोयला में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूदरी से भारत में ऊर्जा सुरक्षा का खतरा बढ़ जाएगा। मल्टी नेशलन कंपनियों को कोयले के लूट की छूट मिल जाएगी। सरकारी कोयला खदानें धीरे-धीरे बंद या निजी हाथों में चली जाएंगी। विदेशी कंपनियों को खुश करने के लिए केन्द्र सरकार ने यह कदम उठाया है। इससे उद्योग बर्बाद हो जाएगा। मजदूर सड़क पर आ जाएंगे। सरकार के फैसले का असर अफसर और मजदूर दोनों पर पड़ेगा। सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार और मजदूरों की छंटनी पर रोक लगाने की मांग करता है।
कोयला कंपनियों में कर्मचारियों की छंटनी के लिए कोल इंडिया ने वर्ष 1991 में सबसे पहले गोल्ड हैंडशेक के नाम से वीआर स्कीम लेकर आई थी। हमने उस समय भी इसका पुरजोर ढंग से विरोध किया था। अब फिर से इसकी तैयारी चल रही है। कई खदानों के बंद होने से इनके श्रमिकों का समायोजन अन्य खदानों में किया गया है। इसके बाद भी कुछ कंपनियों में कोयलाकर्मियों की संख्या सरप्लस हो रही है। ऐसी स्थिति में प्रबंधन वीआरएस को बेहतर विकल्प मान रही है। वीआरएस के नाम प्रबंधन कर्मचारियों की छंटनी की तैयारी कर रही है। इसका पुरजोर विरोध किया जाएगा।