
उर्दू: मुसलमानों की नहीं, हिंदुस्तान की भाषा : सांसद एस. टी. हसन
उर्दू: मुसलमानों की नहीं, हिंदुस्तान की भाषा : सांसद एस. टी. हसन
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह एक पूरी सभ्यता, संस्कृति और इतिहास की पहचान भी होती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषाओं का विशेष महत्व है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांसद एस. टी. हसन ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया कि “उर्दू मुसलमानों की नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की भाषा है।” यह बयान ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में गहरी चर्चा की मांग करता है।
उर्दू की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उर्दू भाषा का विकास मध्यकालीन भारत में हुआ और इसे ‘रेख्ता’ के नाम से भी जाना जाता था। यह फ़ारसी, अरबी, तुर्की और भारतीय भाषाओं के मेल से विकसित हुई। मुग़ल काल के दौरान उर्दू ने राजदरबारों में अपनी विशेष जगह बनाई और धीरे-धीरे यह आम जनता की भाषा बन गई।
हिंदुस्तानी तहज़ीब में उर्दू का योगदान
भारत में उर्दू केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है। यह भाषा न केवल साहित्य और शायरी में समृद्ध रही है, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
साहित्य एवं कविता: मीर, ग़ालिब, इक़बाल, फैज़ अहमद फैज़ जैसे महान शायरों ने उर्दू में अद्भुत काव्य रचनाएँ कीं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: उर्दू ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीयों को एकजुट करने में मदद की। ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ जैसा नारा इसी भाषा से निकला था।
फ़िल्म और मीडिया: भारतीय फ़िल्मों के संवाद और गीतों में उर्दू का व्यापक उपयोग हुआ है।
उर्दू: केवल मुसलमानों की नहीं, सभी भारतीयों की भाषा
उर्दू को अक्सर मुस्लिम समाज से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हकीकत इससे अलग है। यह भाषा हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य समुदायों द्वारा भी बोली और समझी जाती है। भारत में अनेक हिंदू साहित्यकारों और कवियों ने उर्दू में उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी हैं।
हिंदू साहित्यकारों का योगदान: फ़िराक गोरखपुरी, गुलज़ार, कृष्ण चंदर, प्रेमचंद जैसी हस्तियों ने उर्दू साहित्य को समृद्ध बनाया।
सिख धर्म और उर्दू: गुरु नानक देव जी और अन्य सिख गुरुओं की वाणी में उर्दू के शब्द देखने को मिलते हैं।
उर्दू पर राजनीति का प्रभाव
भाषा को धर्म से जोड़ना एक गंभीर मुद्दा है। पिछले कुछ दशकों में उर्दू को केवल मुस्लिम समुदाय से जोड़कर देखा जाने लगा, जिससे इस भाषा को राजनीतिक विवादों में घसीटा गया। जबकि संविधान में उर्दू को भारतीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई है।
निष्कर्ष
एस. टी. हसन का यह बयान इस धारणा को तोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है कि उर्दू केवल मुसलमानों की भाषा है। दरअसल, यह भाषा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है और इसे संकीर्ण धार्मिक नजरिए से देखने के बजाय राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।
भाषा की पहचान किसी धर्म से नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक और सामाजिक जड़ों से होती है। इस संदर्भ में, उर्दू हिंदुस्तान की आत्मा में रची-बसी भाषा है, जो हर भारतीय की धरोहर है।
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