संघ के 100 साल: विडम्बना और विवादों का शतक

संघ के 100 साल: आहिस्ता आहिस्ता विडम्बनाओं का शतक

रायपुर, 03अक्टूबर 2025| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी 100वीं वर्षगांठ दशहरा के दिन मनाई। यह दिन विडम्बना से भरा है, क्योंकि गांधी जयंती और संघ की स्थापना का यह शतक एक ही दिन आता है। गांधी जी के अहिंसा और सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत संघ के विचारों और गतिविधियों से अक्सर विपरीत रहे हैं।

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लेखक बादल सरोज ने अपने आलेख में संघ की इतिहास और वर्तमान गतिविधियों की समीक्षा करते हुए कहा कि संगठन का दावा “मानव जाति की एकता और सभी धार्मिक परंपराओं की अंतर्निहित एकता” पर आधारित है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत रही है। लेख में उल्लेख किया गया कि संघ ने स्वतंत्रता संग्राम का विरोध किया, संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के खिलाफ आंदोलनों में भाग लिया और विभिन्न समुदायों और धर्मों के प्रति वैमनस्य फैलाया।

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संघ के संस्थापक और सरसंघचालक के व्यक्तित्व और उनके विचारों पर भी आलेख में विस्तार किया गया। लेखक ने बताया कि संगठन ने सत्ता में आने के बाद शैक्षणिक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और महिलाओं के अधिकारों पर नियंत्रण की नीति अपनाई, और आर्थिक-सामाजिक मामलों में व्यापक हस्तक्षेप किया।

लेख में यह भी बताया गया कि संघ के प्रयासों और गतिविधियों की आलोचना हमेशा सार्वजनिक रही है, चाहे वह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन, राजनीतिक उन्मुखता, या सामाजिक असमानताओं को बढ़ावा देना हो। इसके बावजूद संगठन अपनी छवि को देशभक्ति और चरित्र निर्माण के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।

लेखक ने निष्कर्ष में लिखा कि संघ के सौ साल के इतिहास में वास्तविकता और दावे के बीच गहरी खाई रही है, और इसे पहचानना और उसके प्रभाव का आंकलन करना आवश्यक है।