भारत में भीषण गर्मी: एक व्यापक जन-स्वास्थ्य और शहरी संकट
दिनांक: 29 मई, 2026
1. प्रस्तावना: बदलता मौसम, बढ़ता खतरा
भारत में गर्मियाँ अब केवल ऋतुचक्र का हिस्सा नहीं रही हैं। यह एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि ने भारतीय जनजीवन को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ शहरी नियोजन, स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली और दैनिक जीवन शैली के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है…
2. गर्म रातों का बढ़ता खतरा (Night-time Warming)
आईएमडी (IMD) और जलवायु वैज्ञानिकों ने एक नई प्रवृत्ति को चिह्नित किया है: ‘गर्म रातें’। दिन की गर्मी से शरीर प्रभावित होता है, लेकिन रात का तापमान यदि उच्च बना रहे, तो शरीर अपनी प्राकृतिक ‘कूलिंग’ प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाता…
3. शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island – UHI) प्रभाव
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसे शहरों में कंक्रीट के घनत्व के कारण ऊष्मा फंस रही है। डामर की सड़कें और ऊंची इमारतें सौर विकिरण को सोख लेती हैं और रात भर उसे छोड़ती हैं, जिससे शहर के केंद्र अपने बाहरी ग्रामीण इलाकों की तुलना में कहीं अधिक गर्म हो जाते हैं…
4. स्वास्थ्य प्रभाव: शरीर की शीतलन प्रणाली का पतन
चिकित्सकीय दृष्टि से, जब वातावरण का तापमान शरीर के सामान्य तापमान (37°C) से काफी ऊपर जाता है, तो शरीर पसीना बहाकर ठंडा होने का प्रयास करता है। लेकिन नमी (humidity) अधिक होने पर पसीना सूखता नहीं है, जिससे हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है…
5. ताप-कार्य योजना (Heat Action Plan) की आवश्यकता
केवल ‘लू’ की चेतावनी पर्याप्त नहीं है। शहरों को ‘ताप-अनुकूल’ बुनियादी ढांचे की जरूरत है। इसमें शामिल हैं:
- शहरी वनीकरण (Urban Forestry) को बढ़ावा देना।
- इमारतों के लिए ‘कूल रूफ’ (Cool Roof) तकनीक को अनिवार्य करना।
- सार्वजनिक स्थानों पर जल निकासी और शीतलन केंद्र बनाना।
भारत के सामने चुनौती बड़ी है, लेकिन समाधान भी उपलब्ध हैं। ‘तापमान साक्षरता’ (Temperature Literacy) को नागरिक शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। नीति निर्माताओं को अब केवल विकास नहीं, बल्कि ‘सतत और जलवायु-लचीला विकास’ (Climate-Resilient Development) को प्राथमिकता देनी होगी…











