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अखिलेश यादव का योगी सरकार पर तंज: उप्र में बिजली कटौती पर मचा सियासी घमासान





यूपी में बिजली संकट पर सियासत तेज: अखिलेश यादव का योगी सरकार पर तीखा प्रहार



यूपी में बिजली संकट पर सियासत तेज: अखिलेश यादव का योगी सरकार पर तीखा प्रहार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों बिजली आपूर्ति को लेकर घमासान मचा हुआ है। भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान के बीच, प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही बिजली कटौती की शिकायतों ने विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा दे दिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं।

अखिलेश यादव का कटाक्ष: ‘क्या ट्रांसफॉर्मर उड़ गया है?’

हाल ही में अखिलेश यादव ने एक तीखे ट्वीट में सरकार के ’24 घंटे बिजली’ देने के दावों पर सवालिया निशान लगा दिया। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, “उप्र के मुख्यमंत्री जी का ‘24 घंटे बिजली आने के दावों’ का ट्रांसफॉर्मर उड़ गया है क्या?”

उन्होंने आगे तंज कसते हुए लिखा, “महीने भर से बिजली न आने का रिकॉर्ड बनाने का होर्डिंग सरकार लगवाएगी या जनता? भाजपा सरकार मतलब भ्रष्टाचार का अंधकार!” अखिलेश यादव का यह बयान प्रदेश में बढ़ते बिजली संकट और उससे उपजे जन आक्रोश को दर्शाता है।

सरकार के दावे बनाम जनता की मुश्किलें

जहाँ एक ओर विपक्ष बिजली आपूर्ति को लेकर हमलावर है, वहीं दूसरी ओर योगी सरकार ने अपनी उपलब्धियों का गुणगान करते हुए रिकॉर्ड बिजली आपूर्ति के आंकड़े पेश किए हैं।

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  • रिकॉर्ड बिजली मांग: सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में उत्तर प्रदेश ने 31,824 मेगावाट की अब तक की सबसे अधिक पीक बिजली मांग को सफलतापूर्वक पूरा किया है।
  • वितरण का दावा: ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा ने दावा किया है कि राज्य सरकार जिला मुख्यालयों और मेट्रो शहरों में लगभग निर्बाध बिजली दे रही है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 22 से 22.5 घंटे तक बिजली पहुंचाई जा रही है।
  • बुनियादी ढांचे में सुधार: सरकार का तर्क है कि 2014 की तुलना में राज्य की विद्युत उत्पादन क्षमता लगभग दोगुनी हो गई है (9,120 मेगावाट), जिससे बढ़ती मांग को पूरा करना संभव हुआ है।

10% बिजली बिल की बढ़ोत्तरी ने बढ़ाई जनता की परेशानी

बिजली कटौती की शिकायतों के बीच, जून 2026 से लागू हुई 10% बिजली बिल की बढ़ोत्तरी ने जनता के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCPL) ने इसे ‘ईंधन और बिजली खरीद समायोजन अधिभार’ (FPPAS) बताया है। सरकार का तर्क है कि बढ़ते वैश्विक ऊर्जा संकट और ईंधन की कीमतों के कारण यह कदम उठाना अनिवार्य था, लेकिन आम जनता पर इसका सीधा वित्तीय बोझ पड़ रहा है।

राजनीतिक बहस का केंद्र

अखिलेश यादव ने न केवल बिजली कटौती को मुद्दा बनाया है, बल्कि उन्होंने सीएम योगी आदित्यनाथ और ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा के बीच समन्वय की कमी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि बिजली सब-स्टेशनों पर पीएसी (PAC) की तैनाती यह साबित करती है कि सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए डर का सहारा ले रही है।

दूसरी ओर, भाजपा के नेताओं का कहना है कि विपक्ष तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा है। उनका तर्क है कि भीषण गर्मी के बावजूद उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है जिसने इतनी भारी मांग को पूरा किया है, और अस्थायी तकनीकी दिक्कतों (जैसे ट्रांसफॉर्मर पर दबाव) को दूर करने के लिए मेंटेनेंस का काम तेजी से चल रहा है।

उत्तर प्रदेश का बिजली क्षेत्र फिलहाल एक दोराहे पर खड़ा है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक विकास के साथ बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) की रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले महीनों में भी बिजली की मांग काफी अधिक रहने की संभावना है। चुनौती यह है कि सरकार न केवल रिकॉर्ड आपूर्ति के दावों को धरातल पर सार्थक करे, बल्कि आम उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले बढ़ते आर्थिक बोझ को भी नियंत्रित करे।

फिलहाल, #असफल_मुख्यमंत्री_उप्र जैसे हैशटैग के साथ छिड़ी यह बहस राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता की चौपालों तक चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि सरकार इस बढ़ते असंतोष को कैसे शांत करती है।



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