आदिवासियों के अधिकारों पर कांग्रेस का भाजपा पर बड़ा हमला: के. राजू का बयान






आदिवासियों के खिलाफ युद्ध छेड़ रही है भाजपा सरकार: नई दिल्ली में कांग्रेस नेता के. राजू का तीखा हमला

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राष्ट्रीय राजनीति | आदिवासी अधिकार

“कॉरपोरेट मित्रों के लिए आदिवासियों के अधिकारों की बलि दे रही भाजपा सरकार” – नई दिल्ली से कांग्रेस का बड़ा हमला

नई दिल्ली: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केंद्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर देश के आदिवासी समुदायों के खिलाफ एक सुनियोजित और संस्थागत युद्ध छेड़ने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित एक उच्च स्तरीय पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के झारखंड प्रभारी और अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं आदिवासी विभागों के राष्ट्रीय समन्वयक के. राजू ने कहा कि विकास के छद्म नाम पर देश के मूल निवासियों को उनकी ही जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया जा रहा है।

कांग्रेस पार्टी ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा के पिछले 12 वर्षों के शासनकाल में आदिवासी समुदायों की सुरक्षा करने वाले संवैधानिक और कानूनी ढांचे को पूरी तरह से पंगु बना दिया गया है। कांग्रेस नेतृत्व के अनुसार, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के समय ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के लिए बनाए गए ‘वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006’ का वर्तमान सरकार द्वारा कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए सरेआम उल्लंघन किया जा रहा है।

“भाजपा शासन के पिछले 12 वर्षों में हमने तथाकथित विकास के नाम पर आदिवासी समुदायों के खिलाफ सरकार द्वारा छेड़े गए युद्ध की भयावह हकीकत को देखा है। जब आदिवासी शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करते हैं, तो भाजपा सरकार उनकी आवाज को दबाने के लिए पुलिस और प्रशासन का दुरुपयोग करती है। भाजपा ने आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों के ऊपर अपने कॉरपोरेट मित्रों के साथ खड़े होने का रास्ता चुना है।”

— के. राजू, राष्ट्रीय समन्वयक, कांग्रेस

कानूनी प्रावधानों की अवहेलना: वन अधिकार कानून को कमजोर करने की साजिश

पार्टी की ओर से जारी आधिकारिक वक्तव्य में सीधे तौर पर वन अधिकार अधिनियम (FRA) की तीन महत्वपूर्ण धाराओं का उल्लेख किया गया, जिन्हें वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा दरकिनार किया जा रहा है। कांग्रेस ने इस कानूनी सबवर्जन को आदिवासियों के अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा बताया है।

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अधिनियम की धारा संवैधानिक प्रावधान सरकार पर आरोप (वर्तमान स्थिति)
धारा 3 आदिवासी समुदायों को सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण का पूर्ण अधिकार देती है। सामुदायिक दावों का निपटारा किए बिना ही कॉरपोरेट कंपनियों को खनन और व्यावसायिक उपयोग के लिए जंगल सौंपे जा रहे हैं।
धारा 4(5) यह स्पष्ट करती है कि जब तक वन अधिकारों की मान्यता और दावों के निपटारे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी आदिवासी को जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता। अधिकारों का निर्धारण किए बिना ही प्रशासनिक बल का उपयोग करके आदिवासियों को उनके पारंपरिक आवासों से समय से पहले और जबरन निकाला जा रहा है।
धारा 5 ग्राम सभा और आदिवासी समुदायों को जंगलों, वन्यजीवों और जैव विविधता की रक्षा करने तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को रोकने की शक्ति देती है। खनन परियोजनाओं को मंजूरी देते समय ग्राम सभाओं के लिखित प्रस्तावों, आपत्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है।

बिना पुनर्वास और मुआवजे के जबरन विस्थापन

धारा 4(5) का विशेष हवाला देते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि कानूनन दावों की पेंडेंसी के दौरान किसी भी प्रकार का विस्थापन पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद, देश के विभिन्न हिस्सों से आदिवासियों को रातों-रात बेदखल किया जा रहा है। विस्थापित हो रहे परिवारों के लिए न तो उचित वित्तीय मुआवजे की व्यवस्था है और न ही सम्मानजनक और टिकाऊ पुनर्वास (Rehabilitation) की कोई ठोस नीति। जमीन छिन जाने के कारण यह कमजोर आबादी गंभीर सामाजिक-आर्थिक संकट में घिर गई है और ग्रामीण अंचलों से शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर है।

खनन के नाम पर विनाश की बलि चढ़ते जंगल

धारा 5 के तहत ग्राम सभाओं को जो वीटो पावर मिली हुई थी, उसे पूरी तरह कुचलने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने कहा कि विशाल वन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन ऑपरेशनों को हरी झंडी दे दी गई है। स्थानीय आदिवासी समुदायों के कड़े विरोध के बावजूद पर्यावरण और वन स्वीकृतियां जारी की जा रही हैं। इससे न केवल प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि आदिवासियों की आजीविका का मुख्य साधन—लघु वन उपज (Minor Forest Produce)—भी हमेशा के लिए नष्ट हो रहा है।

झारखंड और केंद्रीय आदिवासी क्षेत्रों पर विशेष नजर

झारखंड के अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रभारी के रूप में के. राजू का यह बयान क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा महत्व रखता है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों में आदिवासी आबादी का एक बड़ा हिस्सा निवास करता है। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह इन क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर जाकर पारंपरिक ग्राम सभाओं और ग्राम प्रधानों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाएगी।

पार्टी की योजना ब्लॉक और जिला स्तर पर ‘वन अधिकार सहायता प्रकोष्ठ’ स्थापित करने की है, ताकि प्रशासनिक ज्यादतियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी जा सके। कांग्रेस ने मांग की है कि पिछले एक दशक में अनुसूचित क्षेत्रों में दी गई तमाम वन स्वीकृतियों और भूमि अधिग्रहणों का एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराया जाए।

पार्टी ने चेतावनी देते हुए कहा कि संसद के आगामी सत्रों से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे पर सरकार को घेरा जाएगा। देश का वास्तविक विकास अपने ही नागरिकों को बेघर करके नहीं किया जा सकता। कांग्रेस आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और कॉरपोरेट घरानों के हितों के सामने घुटने नहीं टेकेगी।