संस्कृति और स्वावलंबन का अनूठा संगम: बस्तर के गोंचा पर्व में ‘महतारी वंदन योजना’ से आत्मनिर्भर बन रहीं ग्रामीण महिलाएं
जगदलपुर। बस्तर अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों और मौसमी उत्सवों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां के मूल निवासियों की आजीविका, आर्थिक आत्मनिर्भरता और लोक-कौशल से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। इन दिनों पूरे बस्तर संभाग में पारंपरिक गोंचा पर्व (रथयात्रा उत्सव) की तैयारियां पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ चल रही हैं। इसी बीच, जगदलपुर विकासखंड के ग्रामीण क्षेत्र से महिला सशक्तिकरण और सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का एक बेहद प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है।
ग्राम मांझीगुडा की निवासी श्रीमती चंदा देवी ने राज्य शासन की महत्वाकांक्षी ‘महतारी वंदन योजना’ से प्राप्त होने वाली वित्तीय सहायता राशि का ऐसा सदुपयोग किया है, जिसने न केवल उनके परिवार को आर्थिक संबल प्रदान किया है, बल्कि बस्तर की एक लुप्तप्राय लोक कला को भी नया जीवन दे दिया है। चंदा ने योजना से मिली किस्तों को संचित कर, गोंचा पर्व के मुख्य आकर्षण—पारंपरिक ‘तुपकी’ (बांस से निर्मित ध्वनि यंत्र) के निर्माण कार्य में निवेश किया है।
बस्तर का गोंचा पर्व और 600 साल पुरानी ‘तुपकी’ की परंपरा
आदिवासी बहुल बस्तर अंचल में मनाया जाने वाला गोंचा महापर्व देश भर में अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। जब जगदलपुर में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है, तो यहां के श्रद्धालु और विशेष रूप से जनजातीय समुदाय के लोग एक अनोखे तरीके से भगवान को अपनी अगाध श्रद्धा अर्पित करते हैं। यह तरीका है—तुपकी की सलामी (गार्ड ऑफ ऑनर)।
तुपकी मूल रूप से खोखले बांस की नली से बनाया जाने वाला एक पारंपरिक, हस्तनिर्मित ध्वनि उत्पन्न करने वाला यंत्र है, जो देखने में एक छोटी देशी बंदूक की तरह प्रतीत होता है। इसमें बस्तर के जंगलों में पाए जाने वाले ‘मलाग्नी’ पेड़ के बीजों, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘पेंगू’ कहा जाता है, का उपयोग बुलेट या छर्रों के रूप में किया जाता है। जब बांस की नली के भीतर पेंगू को डालकर पीछे से बांस की ही तीली से तेजी से दबाया जाता है, तो हवा के दबाव से एक तीव्र ध्वनि (पटाखे या बंदूक के चलने जैसी आवाज) उत्पन्न होती है। गोंचा पर्व के दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु रथ की परिक्रमा करते हुए इसी तुपकी से ध्वनि निकालकर भगवान जगन्नाथ को पारंपरिक सलामी देते हैं।
महतारी वंदन योजना: वित्तीय सहायता से सांस्कृतिक उद्यमिता तक का सफर
मांझीगुडा की श्रीमती चंदा देवी पिछले कई वर्षों से अपने पति श्री चिगडू और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर मौसमी तौर पर तुपकी बनाने का काम करती आ रही थीं। लेकिन हर वर्ष त्योहार के समय कच्ची सामग्री, जैसे—विशेष किस्म का बांस, मलाग्नी के बीज और सजावटी सामान खरीदने के लिए उन्हें स्थानीय साहूकारों या कर्ज पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे होने वाला मुनाफा बेहद कम हो जाता था।
चंदा बताती हैं कि यह योजना केवल महिलाओं के बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने और अपनी पारंपरिक कलात्मक विधाओं को एक सफल व्यवसाय (सांस्कृतिक उद्यमिता) में बदलने का बेहतरीन अवसर प्रदान कर रही है।
एक नजर में: परंपरा, तकनीक और आर्थिक प्रभाव
बस्तर की इस पारंपरिक कला और शासन की कल्याणकारी योजना के अंतर्संबंधों को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:
| घटक / विवरण | मुख्य विशेषता / प्रभाव |
|---|---|
| पारंपरिक उत्पाद | तुपकी (बांस से निर्मित पारंपरिक ध्वनि यंत्र/बंदूक) |
| प्राकृतिक सामग्री | विशेष बांस की खोखली नली एवं मलाग्नी वृक्ष के बीज (पेंगू) |
| सांस्कृतिक महत्व | गोंचा रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देना |
| शासकीय संबल | महतारी वंदन योजना (विवाहित महिलाओं को ₹1,000/माह की सहायता) |
| आर्थिक परिणाम | कर्ज से मुक्ति, कार्यशील पूंजी की उपलब्धता, अतिरिक्त पारिवारिक आय |
संस्कृति का संरक्षण और नई पीढ़ी को हस्तांतरण
चंदा और उनके पति चिगडू की यह अनूठी पहल इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब शासन की जनकल्याणकारी नीतियां और आर्थिक योजनाएं स्थानीय लोक परंपराओं तथा ग्रामीण कौशल के साथ जुड़ती हैं, तो उनके परिणाम बेहद दूरगामी होते हैं। इससे न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सशक्तिकरण की नई राह खुलती है, बल्कि बस्तर की वह अनमोल सांस्कृतिक विरासत भी नई पीढ़ी तक पूरी शुद्धता और जीवंतता के साथ सुरक्षित पहुंच रही है, जो आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो रही थी।
मांझीगुडा गांव में आज चंदा को देखकर अन्य ग्रामीण महिलाएं भी अपनी स्थानीय कलाओं—जैसे बेलमेटल क्राफ्ट, टेराकोटा और बांस शिल्प को पुनर्जीवित करने के लिए छोटी-छोटी पूंजी जमा करने की प्रेरणा ले रही हैं। बस्तर का यह गोंचा पर्व इस बार न केवल धार्मिक आस्था का गवाह बनेगा, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता की एक नई गूंज भी पूरे अंचल में फैलाएगा।













