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दिव्यांग बच्चों के समावेशी विकास के लिए बैठक आयोजित

रायपुर : दिव्यांग बच्चों के समावेशी विकास के लिए बैठक आयोजित

समाज कल्याण विभाग की अध्यक्षता में विभिन्न विभागों के समन्वय के लिए हुई चर्चा

समाज कल्याण विभाग की अध्यक्षता में विभिन्न विभागों के समन्वय के लिए हुई चर्चाछत्तीसगढ़ में मानसिक रूप से अक्षम और दिव्यांग बच्चों की समुचित प्रारंभिक देख-रेख, शिक्षा, चिकित्सा और उनके पालकों में जागरूकता के लिए समाज कल्याण विभाग की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। बैठक में दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ तालमेल बैठाते हुए समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ाने पर विचार विमर्श किया गया। बैठक में समाज कल्याण विभाग के उपसचिव श्री राजेश तिवारी, चिल्ड्रन इन इंडिया संस्था के फाउंडर ट्रस्टी डॉ. संतोष जॉर्ज सहित महिला एवं बाल विकास, स्कूल शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी मौजूद थे।

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चिल्ड्रन इन इंडिया संस्था के फाउंडर ट्रस्टी डॉ. संतोष जॉर्ज ने बताया कि भारत में हर साल जन्मे 15 लाख बच्चे जन्मजात विसंगति और लगभग 25 लाख बच्चे विकासात्मक विलम्ब से पीड़ित होते हैं। ऐसे बच्चों की समय पर पहचान और चिकित्सा होने से उन्हें सामान्य जीवन दिया जा सकता हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी के कारण ऐसे बच्चों को आंगनबाड़ी या स्कूल नहीं भेजा जाता हैं। इससे भी उनका सामान्य विकास बाधित होता है। इस दिशा में आगे बढ़कर काम करने की जरूरत है। संस्था की डिस्ट्रिक्ट कोऑडिनेटर सुश्री सरिता ने प्रेजेंटेशन के माध्यम से बताया कि सेरीब्रल पाल्सी, दृष्टि दोष, क्लब फुट, बहरापन, डाउनसिंड्रोम, डेव्हलपमेंटल डिसप्लेसिया ऑफ हिप, ऑटिज्म जैसी कई विकृतियों से ग्रसित बच्चों के स्वतंत्र और स्वावलंबी जीवन के लिए जागरूकता की जरूरत है।
समाज कल्याण विभाग के उपसचिव तिवारी ने कहा कि हर बच्चों को विकास का समान अधिकार है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और लगातार प्रयास कर रही है। राज्य सरकार विभिन्न विभागों के समन्वय से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान कर उनके समग्र विकास का निरंतर प्रयास कर रही है। इस दिशा में बच्चों के समावेशी विकास की दिशा में पहल की जा रही है।
बैठक में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मितानिनों के सहयोग के लिए उनके प्रशिक्षण पर चर्चा की गई जिससे उन्हें विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति अधिक संवेदी और दक्ष बनाया जा सके। इसके साथ ही बच्चों के डाटा कलेक्शन, स्क्रीनिंग, थैरेपी और सोशल काउंसलिंग पर चर्चा की गई।

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