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संयुक्त संसदीय समिति बनाने से क्यों डर रही है मोदी सरकार : भक्त चरणदास

रायपुर । अडानी ग्रुप पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को पूर्व केंद्रीय मंत्री भक्त चरण दास ने देश में इस वक्त का सबसे बड़ा मुद्दा करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह अब तक सबसे बड़ा वित्तीय फ्रॉड है। दुनिया हमारी छवि इससे क्या बन रही है? यह सभी बड़ा सवाल है। ‘हम अडानी के हैं कौन’ पर शुक्रवार को देशभर में कांग्रेस की ओर से पत्रवार्ता की जा रही है। इस कड़ी में पूर्व केंद्रीय मंत्री भक्त चरण दास महंत पीसीसी चीफ मोहन मरकाम के साथ रायपुर में मीडिया से रू-ब-रू हुए। भक्त चरण दास ने कहा कि देश में जब से मोदी सरकार आई है, देश में मानव संसाधन में कमी आई है। नोटबन्दी, कोरोना, महंगाई ने देश की आर्थिक स्थिति बदतर कर दी। आज देश में महंगाई कई गुना बढ़ गई है. देश में बेरोजगारी है. विश्व भर से 4 गुना अधिक है. देश में बेरोजगारी दर 9 फीसदी तक पहुँच गई है. 20 करोड़ रोजगार खत्म हुआ है।

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भक्त चरणदास ने कहा कि सरकार ने राहुल गांधी के सवालों और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण के अंशों को बेशक संसदीय कार्यवाही से हटा दिया हो लेकिन भारत के लोग सब देख रहे हैं कि संसद में क्या हो रहा है। लोग जानना चाहते हैं कि सरकार संसदीय भाषणों का स्तर गिराने की कोशिश क्यों कर रही है और प्रधानमंत्री संसद में प्रासंगिक सवालों के जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं।

देशवासी जानना चाहते हैं कि कैसे एक संदिग्ध साख वाला समूह, जिस पर टैक्स हेवन देशों से संचालित विदेशी शेल कंपनियों से संबंधों का आरोप है, भारत की संपत्तियों पर एकाधिपत्य स्थापित कर रहा है और इस सब पर सरकारी एजेंसियां या तो कोई कार्यवाही नहीं कर रही हैं या इन सब संदिग्ध गतिविधियों को ही सुगम बनाने में जुटी हैं। भारत के लोग बहुत बुद्धिमान हैं और वे प्रधानमंत्री मोदी और उनके मित्र पूंजीपतियों के बीच संपूर्ण पारस्परिक तालमेल को समझ सकते हैं। वे जानना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री ने एक मित्र पूंजीपति को विश्व के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बनाने में मदद क्यों की और वे इस गंभीर अंतर्राष्ट्रीय ख़ुलासे पर चुप क्यों हैं?

हम जानना चाहते हैं कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर जाँच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति बनाने से क्यों डर रही है जबकि संसद के दोनों सदनों में उसका अच्छा बहुमत है।

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क्या हुआ तेरा वादा…
हम जानना चाहते हैं कि टैक्स हेवन देशों से संचालित होने वाली विदेशी शेल कंपनियों से भारत आने वाले काले धन का असली मालिक कौन है? क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम वो इरादा? काले धन पर प्रधानमंत्री के वादे का क्या हुआ? प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने से पहले काला धन भारत वापस लाने और हर नागरिक के बैंक खाते में 15-20 लाख रुपए डालने का वादा किया था लेकिन आज की कड़वी सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। स्विट्ज़रलैंड के केंद्रीय बैंक के पिछले वार्षिक डेटा के मुताबिक 2021 में स्विस बैंकों में जमा भारतीय व्यक्तियों और कंपनियों का पैसा 14 वर्षों के उच्चतम स्तर 3.83 बिलियन स्विस फ़्रैक्स (30,500 करोड़ रु. से अधिक) पर पहुँच गया है।

वर्षों से प्रधानमंत्री मोदी ने ईडी, सीबीआई और (खुफ़िया राजस्व निदेशालय) जैसी एजेंसियों का दुरुपयोग अपने राजनीतिक या सैद्धांतिक प्रतिद्वंदियों को डराने-धमकाने के लिए किया है, साथ ही उन व्यापारिक घरानों को दंडित करने के लिए भी किया है जो उनके पूंजीपति मित्रों के वित्तीय हितों के अनुरूप नहीं हैं।1992 में हर्षद मेहता मामले की जाँच के लिए एक जेपीसी का गठन हुआ था जबकि 2001 में एक जेपीसी ने केतन पारेख मामले की जाँच की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, दोनों को करोड़ों भारतीय निवेशकों को प्रभावित करने वाले घोटालों की जाँच के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों पर विश्वास और भरोसा था। प्रधानमंत्री मोदी को किस बात का डर है? क्या उनके अधीन एक न्यायपूर्ण और निष्पक्ष जाँच की कोई उम्मीद है? जब यह धोखाधड़ी हो रही थी तो सेबी क्या कर रहा था?

जेपीसी जांच से केन्द्र क्यों डर रहा है : मरकाम
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि हिंडनबर्ग रिर्पोट और अडानी समूह की धोखाधड़ी पर केन्द्र सरकार श्वेत पत्र जारी करें। अडानी समूह की कंपनियों में देश की सबसे सरक्षित मानी जाने वाली निवेश कंपनिया एलआईसी और एसबीआई ने भी पैसा लगाया है। एलआईसी के 27 करोड़ पालिसी होल्डर तथा एसबीआई के 45 करोड़ खाता धारकों के विश्वास और हितों का सवाल है। यह भारत सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल है। मोदी सरकार अपनी समूह के इस घपलेबाजी की ईडी और सेबी से जांच कराये। जेपीसी जांच से केन्द्र क्यों डर रहा है?

Pradesh Khabar

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