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कटघोरा : डीएफओ, सीसीएफ व रेंजर के विरुद्ध हाईकोर्ट में याचिका….पढ़े क्या है पूरा मामला

कोरबा/कटघोरा :- कटघोरा वन मंडल गुणवत्ताहीन निर्माण कार्यों और जिले से बाहर के ठेकेदारों पर खास मेहरबानी के लिए ही सुर्खियां नहीं बटोर रहा बल्कि स्थानीय सप्लायर का भी लाखों रुपए भुगतान बेवजह रोक कर रखा गया है। “मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं जनाब….” की तर्ज पर कटघोरा वनमंडल के जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी और रेंजर मिलकर उनके साथ काम करने वाले सप्लायरों को न जाने क्यों परेशान किए हुए हैं? ऐसे ही एक स्थानीय सप्लायर ने विभाग को पत्र लिख-लिख कर थक जाने के बाद हाईकोर्ट की शरण ली है। उसने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी है जो सुनवाई के लिए स्वीकार हो गई है। इसकी प्रथम तिथि 21 जून नियत की गई है। इस याचिका में सप्लायर ने सीसीएफ, वनमंडल अधिकारी और रेंजर को प्रतिवादी बनाया है।

मामला कुछ ऐसा है कि कटघोरा में संचालित महामाया सेल्स के प्रोपराइटर मुकेश गोयल ने वर्ष 2018-2019 में रोपण के लिए पाली, पसान, कोरबी आदि विभिन्न रेंजों में वाहनों के जरिए पौधों की पहुंच सुनिश्चित की थी। इसके एवज में लगभग 40 लाख रुपये का भुगतान आज पर्यंत नहीं हो सका है। इस पूरे काम को हुए करीब 3 वर्ष बीत जाने के बाद भी सप्लायर को अपने ही पैसे के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है जबकि उसने अपने कार्य को पूरी तरह से अंजाम दे दिया है। विभागीय तौर पर भी इसकी पुष्टि हो चुकी है। यह कार्य तत्कालीन डीएफओ एस जगदीशन के कार्यकाल में हुआ था। उनके जाने के बाद श्री चंदेले कुछ समय के लिए डीएफओ बने तो इस ओर उनका ज्यादा ध्यान नहीं गया। डीडी संत काफी समय से यहां डीएफओ के प्रभार पर रहे लेकिन सप्लायर के मुताबिक उन्होंने भी पत्र लिखने के बावजूद फण्ड नहीं होने का रटा-रटाया जवाब दे दिया। डीडी संत के जाने के बाद वर्तमान डीएफओ शमा फारूकी से भी कई बार गुहार लगा चुका है लेकिन बकाया रकम देने का नाम नहीं ले रहे हैं। बार-बार घुमाने के साथ-साथ तकलीफ इस बात की भी देते हैं कि प्रेषित पत्रों का जवाब देने की जरूरत अधिकारी नहीं समझते।

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आखिर स्थानीय सप्लायर ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया कि वन विभाग उसका पैसा देने से गुरेज कर रहा है? वहीं दूसरी ओर कोरबा जिले के बाहर के ठेकेदारों द्वारा बिना सामानों की आपूर्ति किए ही उनका भुगतान करोड़ों में चंद दिनों के भीतर ही फाइल चलाकर कर दिया जाता है। काफी प्रयासों के बाद भी जब महामाया सेल्स के प्रोपराइटर को जिले से लेकर संभागीय और राजधानी स्तर तक के वन अधिकारियों से राहत नहीं मिली तो उसने न्यायालय की शरण लेना उचित समझा है। महामाया सेल्स ने अपने अधिवक्ता द्वय के माध्यम से बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। न्यायालय ने सुनवाई के लिए 21 फरवरी की तिथि नियत की है।

हाल-फिलहाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो कटघोरा वन मंडल अपने अधिकारी,कर्मियों, बाबू की कार्यशैली, विधानसभा में गलत जानकारी देने, स्टाप डेमों का घटिया निर्माण, मानक के विपरीत गुणवत्ताहीन और नॉन ट्रेड सीमेंट की आपूर्ति व जंगल के पत्थर, रेत से निर्माण के कारण कुछ ज्यादा ही सुर्खियों में रहा है। अधिकारियों, बाबू की कार्यशैली के कारण सरकार की भी खासी किरकिरी हो रही है। अब अपना काम करने के बाद रुपये के लिए हाईकोर्ट की शरण लेना जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीन, लापरवाह और भ्र्ष्ट कार्यशैली को बताने के लिए काफी है।

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