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सरगुजा राजपरिवार की परंपरा अनुसार श्रीराम मंदिर में प्रथम पूजा | टी.एस. सिंहदेव ने खोला गर्भगृह का पट

रामनवमी पर सरगुजा राजपरिवार की प्रथम पूजा से हुआ श्रीराम प्रकटोत्सव का शुभारंभ

अम्बिकापुर के 95 वर्षीय प्राचीन राममंदिर में परंपरा अनुसार मनाया गया भव्य पर्व, टी.एस. सिंहदेव ने दिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों पर चलने का संदेश

 

अम्बिकापुर, 6 अप्रैल।छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर स्थित ऐतिहासिक और 95 वर्षों पुराने श्रीराम मंदिर में आज रामनवमी का पर्व पारंपरिक आस्था और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। मंदिर में वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार सरगुजा राजपरिवार के मानद महाराज एवं प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने इस वर्ष भी रामनवमी के अवसर पर प्रथम पूजा कर मंदिर के गर्भगृह का पट खोला, जिसके साथ ही श्रीराम प्रकटोत्सव की शुरुआत हुई।

इस विशेष अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना का सिलसिला चल रहा था। दोपहर 12 बजे जैसे ही सिंहदेव ने गर्भगृह का पट खोला, मंदिर परिसर “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा।


इतिहास से जुड़ी भक्ति की परंपरा

श्रीराम मंदिर का यह इतिहास रियासतकालीन है। मंदिर का निर्माण वर्ष 1930 में उस समय के सरगुजा नरेश स्वर्गीय रामानुज शरण सिंहदेव द्वारा अपने पुत्र स्वर्गीय मदनेश्वर शरण सिंहदेव के जन्म के उपलक्ष्य में कराया गया था। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि सरगुजा की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक बन चुका है।

1990 के दशक में, अमरकंटक के प्रसिद्ध संत कल्याण बाबा के आग्रह पर तत्कालीन महाराज श्री मदनेश्वर शरण सिंहदेव एवं उनकी धर्मपत्नी महारानी देवेन्द्र कुमारी सिंहदेव ने इस मंदिर को कल्याण आश्रम को दान में दे दिया था। इसके पश्चात भी मंदिर की गरिमा और पारंपरिक व्यवस्था यथावत बनी रही। महारानी देवेन्द्र कुमारी सिंहदेव मंदिर ट्रस्ट की आजीवन ट्रस्टी रहीं और उन्होंने इसके धार्मिक संचालन में गहरा योगदान दिया।


राजपरिवार निभा रहा परंपरा, आस्था और सामाजिक सद्भाव की मिसाल

रामनवमी के अवसर पर मंदिर में होने वाली प्रथम पूजा और गर्भगृह का पट खोलने की परंपरा सरगुजा राजपरिवार द्वारा आज भी निभाई जा रही है। इस बार टी.एस. सिंहदेव ने पूजा अर्पित की और प्रकटोत्सव के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रभु श्रीराम के साक्षात दर्शन कराए।

पूजा के उपरांत सिंहदेव ने सभी नागरिकों को रामनवमी की शुभकामनाएं दी और कहा,

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प्रभु श्रीराम केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि मर्यादा और नैतिक मूल्यों के प्रतीक हैं। आज के समय में श्रीराम के आदर्शों को अपनाना हमारी सामाजिक और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है।”

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरगुजा राजपरिवार की धार्मिक आस्था सनातन परंपरा से जुड़ी हुई है, लेकिन विचार और नीति के रूप में परिवार हमेशा से सर्वधर्म समभाव का समर्थन करता आया है।

सिंहदेव ने कहा,

“हमारी पूजा-पद्धति में सरगुजा की आदिवासी संस्कृति और लोक परंपराएं भी समाहित हैं। चाहे श्रीराम मंदिर की प्रथम पूजा हो या नवरात्रि में महामाया मंदिर की संधि पूजा, हम अपनी इन परंपराओं के पालन में कृत संकल्पित हैं।”


भंडारे का आयोजन और सामाजिक सहभागिता

प्रथम पूजा और प्रकटोत्सव के बाद राममंदिर परिसर में भंडारे का आयोजन भी किया गया, जिसका शुभारंभ टी.एस. सिंहदेव ने ही किया। उन्होंने स्वयं श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया। भक्तों के बीच यह आयोजन अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायक रहा।
सैकड़ों श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में आयोजित भंडारे में भाग लिया और प्रभु श्रीराम की भक्ति में सराबोर हो गए।


श्रद्धा, संस्कृति और समरसता का संगम

यह अवसर न केवल धार्मिक श्रद्धा का रहा, बल्कि यह सरगुजा की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का भी प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर में आमजन, आदिवासी समाज, विभिन्न धर्मों के लोग एकत्र हुए और बिना किसी भेदभाव के एक साथ आराधना में शामिल हुए।

यह दृश्य इस बात की मिसाल था कि सरगुजा राजपरिवार की परंपराएं किसी जाति या वर्ग विशेष तक सीमित नहीं, बल्कि सभी समुदायों को जोड़ने वाली हैं।


मंदिर का महत्व आज भी बरकरार

श्रीराम मंदिर आज भी अंबिकापुर शहर के धार्मिक जीवन का केंद्र है। यहाँ हर वर्ष रामनवमी, श्रीराम जन्मोत्सव, नवरात्रि और अन्य पर्वों पर भव्य आयोजन होते हैं। मंदिर की व्यवस्था में कल्याण आश्रम और स्थानीय श्रद्धालुओं की सहभागिता उल्लेखनीय है।

राजपरिवार की सक्रियता और सामाजिक भावना के कारण यह मंदिर न केवल धार्मिक केंद्र के रूप में, बल्कि एक संस्कृतिक प्रतीक स्थल के रूप में भी पहचाना जाता है।


रामनवमी के इस पावन पर्व पर अंबिकापुर के श्रीराम मंदिर में सम्पन्न हुआ यह आयोजन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं था, बल्कि सरगुजा की सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत उदाहरण भी था।
 टी.एस. सिंहदेव द्वारा निभाई गई परंपरा ने यह संदेश दिया कि विरासत को निभाना केवल गौरव की बात नहीं, बल्कि सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है।

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