बालिका सुरक्षा और सशक्तिकरण है नैतिक व संवैधानिक कर्तव्य: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा

बालिका सुरक्षा केवल कानून नहीं, नैतिक व संवैधानिक कर्तव्य: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा

रायपुर, 24 अगस्त 2025/ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने कहा कि बालिका की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना केवल विधिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि हर संस्था और समाज का नैतिक व संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि सुरक्षित वातावरण का अर्थ केवल अपराध से बचाना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और समान अवसर उपलब्ध कराना भी है।

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कार्यक्रम का आयोजन

वे आज विशेष सेल फॉर पॉक्सो समिति एवं किशोर न्याय समिति द्वारा, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी और छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सहयोग से आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। विषय था – ‘बालिका संरक्षण: भारत में उसके लिए एक सुरक्षित एवं सक्षम वातावरण की ओर’
इस अवसर पर उन्होंने ‘यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act)’ के तहत हितधारकों की भूमिका पर आधारित लीफलेट का विमोचन भी किया।

सामूहिक जिम्मेदारी पर बल

मुख्य न्यायाधीश ने कहा –

  • स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपचार के लिए, पुलिस सुरक्षा के लिए, समुदाय पोषण के लिए और विधिक संस्थान अधिकारों की रक्षा के लिए जिम्मेदार हैं।

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  • सबसे बड़ा दायित्व समाज का है कि वह अपनी सोच बदले और बालिका को सपने देखने, निडर होकर आगे बढ़ने और अपनी क्षमता प्राप्त करने का अवसर दे।
    उन्होंने कहा कि शासन की हर संस्था को बच्चों के अधिकारों की संरक्षक बनकर कार्य करना चाहिए।

तकनीकी सत्रों की चर्चा

कार्यक्रम में हुए सत्रों में –

  • बालिकाओं के विरुद्ध हिंसा के राष्ट्रीय व वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  • ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की समीक्षा

  • सुरक्षित विद्यालयीन व घरेलू वातावरण

  • गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका

  • बाल संरक्षण सेवाओं की चुनौतियाँ

  • यूनिसेफ जैसी संस्थाओं का सहयोग
    पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।

विशिष्ट उपस्थिति

कार्यक्रम में न्यायमूर्ति श्रीमती रजनी दुबे, श्री संजय के. अग्रवाल सहित उच्च न्यायालय के कई न्यायाधीश, विधि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग, यूनिसेफ प्रतिनिधि, जिला प्रशासन, समाजसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि और विधिक सेवा प्राधिकरण से जुड़े अधिकारी मौजूद रहे। आभार प्रदर्शन न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने किया।

यह कार्यक्रम केवल कानूनी विमर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सुरक्षित शिक्षा, स्वास्थ्य, समुदाय की सोच और डिजिटल जागरूकता को बालिका संरक्षण के केंद्र में रखने का संकल्प भी लिया गया। यह पहल छत्तीसगढ़ को बाल-अधिकारों की सुरक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में नए मुकाम पर पहुंचा सकती है।