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मोहन भागवत बोले—भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं

असम में बोले मोहन भागवत: “भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं, इसकी सभ्यता खुद बताती है”—जनसांख्यिकीय बदलावों पर भी जताई चिंता

गुवाहाटी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने असम में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारत को आधिकारिक रूप से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसकी सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान स्वयं इस तथ्य को स्पष्ट करती है। उन्होंने कहा कि—
“हिंदू कोई धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा और सभ्यतागत पहचान है।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत पर गर्व करने वाला हर व्यक्ति हिंदू है, और “भारत और हिंदू एक-दूसरे के पर्यायवाची” हैं।


असम में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर चिंता

मोहन भागवत ने असम में बदलते जनसांख्यिकीय स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए समाज को आत्मविश्वास, सतर्कता और अपनी भूमि व पहचान के प्रति मजबूत लगाव बनाए रखना होगा।

उन्होंने तीन प्रमुख मुद्दों का उल्लेख किया—

  • अवैध घुसपैठ पर रोक

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  • हिंदुओं के लिए तीन बच्चों के मानदंड सहित संतुलित जनसंख्या नीति

  • विभाजनकारी धर्मांतरण का विरोध

भागवत ने कहा कि समाज के सभी वर्गों को “निस्वार्थ भाव से एकजुट होकर कार्य करना चाहिए।”


“आरएसएस किसी का विरोध करने के लिए नहीं बना”

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ की स्थापना किसी का विरोध करने, नुकसान पहुँचाने या संघर्ष पैदा करने के लिए नहीं हुई।
उनके मुताबिक—
“आरएसएस की स्थापना चरित्र निर्माण के लिए हुई। हमारा लक्ष्य भारत को वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाना है।”

भागवत ने कहा कि संघ की पद्धति विविधता के बीच भारत को जोड़ने का काम करती है।


भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की आवश्यकता नहीं

गुवाहाटी में दिए गए संबोधन के दौरान उन्होंने साफ कहा—
“भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई जरूरत नहीं है। यह इसकी सभ्यता में पहले से ही स्पष्ट है।”

उन्होंने कहा कि “भारत और हिंदू” दो अलग-अलग अवधारणाएँ नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं।

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