खैरागढ़ में दोहरा मापदंड? आम जनता का कनेक्शन कटता है, सरकारी विभागों पर 20 करोड़ का बिजली बकाया

खैरागढ़ में दोहरा मापदंड? आम जनता का कनेक्शन कटता है, सरकारी विभागों पर 20 करोड़ का बिजली बकाया

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खैरागढ़ संभाग में 50 से अधिक सरकारी विभागों पर 20 करोड़ से ज्यादा का बिजली बिल बकाया है, जबकि आम उपभोक्ताओं पर सख्ती। क्या नियम सिर्फ जनता के लिए हैं?

खैरागढ़। जिले में बिजली का मीटर हर जगह एक जैसी रफ्तार से घूम रहा है, लेकिन बिजली बिल चुकाने की जिम्मेदारी सबके लिए समान नहीं दिखती। आम जनता से बिजली विभाग समय पर भुगतान की अपेक्षा ही नहीं करता, बल्कि एक-दो माह का बिल बकाया रहने पर सीधे कनेक्शन काट दिया जाता है। वहीं, सरकारी विभागों के मामले में हालात बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं।

क्या नियम केवल आम जनता के लिए हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक आम उपभोक्ता का बिजली कनेक्शन कट सकता है, तो करोड़ों रुपये का बकाया रखने वाले सरकारी विभागों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? यह स्थिति अब बिजली विभाग और खैरागढ़ प्रशासन—दोनों के लिए विश्वसनीयता और न्याय की बड़ी चुनौती बन चुकी है।

सरकारी विभाग खुद भुगतान में पीछे

हैरानी की बात यह है कि वही सरकारी व्यवस्था, जो आम जनता को समय पर बिजली बिल भरने की नसीहत देती है, खुद भुगतान के मामले में पिछड़ती नजर आ रही है
बिजली विभाग का दावा है कि संबंधित विभागों से लगातार संपर्क किया जा रहा है, नोटिस भेजे जा रहे हैं और वसूली के प्रयास जारी हैं, लेकिन बीते एक साल में सरकारी विभागों के बकाया में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है

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किस विभाग पर कितना बकाया?

विभागवार आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं—

  • नगरीय निकायों पर: लगभग ₹8.33 करोड़
  • पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग पर: करीब ₹10.50 करोड़
  • अन्य विभाग (शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल कल्याण, आदिम जाति कल्याण, वन, जल संसाधन आदि):
    👉 कुल मिलाकर ₹20 करोड़ से अधिक का बकाया

आम उपभोक्ता बनाम सरकारी विभाग

आंकड़े बताते हैं कि खैरागढ़ संभाग के लगभग 50 सरकारी विभागों पर जहां 20 करोड़ रुपये से अधिक का बिजली बिल लंबित है, वहीं क्षेत्र के लगभग 33 हजार निजी उपभोक्ताओं पर केवल 4 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बकाया है।
फर्क सिर्फ इतना है कि दबाव और कार्रवाई आम जनता पर होती है, जबकि सरकारी विभागों को लगातार मोहलत मिलती रही है।

समानता और न्याय की मांग

यह मामला अब सिर्फ बकाया वसूली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समानता और न्याय से जुड़ा सवाल बन चुका है। यदि नियम सबके लिए समान हैं, तो कार्रवाई भी बिना भेदभाव होनी चाहिए—चाहे उपभोक्ता आम नागरिक हो या सरकारी विभाग।