छत्तीसगढ़ के राजनीतिक पुरोधा विद्याचरण शुक्ल को भावभीनी श्रद्धांजलि
रायपुर, 11 जून 2026
एक युग का अवसान और स्मृतियों का कारवां
छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा नाम, जो आज भी अपने ओजस्वी व्यक्तित्व और रणनीतिक कुशलता के लिए जाना जाता है, वह है विद्याचरण शुक्ल। आज 11 जून को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर पूरा प्रदेश उन्हें याद कर नमन कर रहा है। टी.एस. सिंहदेव ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से उन्हें याद करते हुए उनके द्वारा किए गए योगदान को रेखांकित किया है।
झीरम घाटी: वह काला अध्याय
25 मई 2013 की उस घटना को भुला पाना छत्तीसगढ़ के जनमानस के लिए असंभव है। झीरम घाटी में नक्सलियों ने जिस कायरता का परिचय दिया, उसने न केवल राज्य के वरिष्ठ नेतृत्व को हमसे छीन लिया, बल्कि प्रदेश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी एक गहरा आघात किया। विद्याचरण शुक्ल इस हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे और कई दिनों के संघर्ष के बाद 11 जून 2013 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी शहादत आज भी हमें सुरक्षा व्यवस्था की खामियों और लोकतंत्र के प्रति अपने दायित्वों की याद दिलाती है।
राजनीतिक जीवन का सफर
विद्याचरण शुक्ल का राजनीतिक जीवन किसी किताबी कहानी से कम नहीं है। पंडित रविशंकर शुक्ल के सुपुत्र के रूप में जन्में ‘विद्या भैया’ ने अपनी मेहनत और बुद्धिमत्ता से राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वे कई बार लोकसभा के लिए चुने गए और केंद्र में सूचना एवं प्रसारण, गृह, विदेश और संसदीय कार्य जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभाला। उनकी कार्यशैली और विवादों से निपटने की क्षमता उन्हें एक अद्वितीय नेता बनाती थी।
लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रहरी
सिंहदेव ने अपने संबोधन में सही कहा है कि उनका समर्पण हमेशा स्मरणीय रहेगा। उन्होंने राजनीति को कभी सत्ता के खेल के रूप में नहीं देखा, बल्कि समाज सेवा के एक सशक्त मंच के रूप में स्वीकार किया। उनके विचार, उनकी नीतियां और उनका जनसंपर्क आज भी कई युवा राजनेताओं के लिए एक स्कूल की तरह है।
भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा
विद्याचरण शुक्ल का जीवन हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है। उनके बलिदान के बाद प्रदेश में जो शून्य पैदा हुआ, उसे भर पाना तो असंभव है, लेकिन उनके बताए गए रास्ते पर चलकर ही हम एक बेहतर छत्तीसगढ़ का निर्माण कर सकते हैं। आज के दिन श्रद्धांजलि सभाओं में न केवल उन्हें याद किया जा रहा है, बल्कि उनके सिद्धांतों को दोहराने का संकल्प भी लिया जा रहा है।
यह लेख विद्याचरण शुक्ल जी के राजनीतिक योगदान और उनके प्रति टी.एस. सिंहदेव जी की संवेदनाओं पर आधारित है।

















