अल नीनो का खतरा: कांकेर में पशुधन सुरक्षा के लिए विशेष गाइडलाइन जारी






अल नीनो का खतरा: कांकेर जिले में पशुधन की सुरक्षा के लिए विशेष गाइडलाइन जारी, उप संचालक डॉ. सत्यम मित्रा की अपील



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अल नीनो के संभावित संकट को लेकर कांकेर में अलर्ट: पशुपालकों के लिए विशेष उपाय और चारे-पानी के प्रबंधन की अपील

कांकेर, छत्तीसगढ़: वैश्विक जलवायु परिवर्तन और अल नीनो (El Nino) के संभावित प्रभावों को देखते हुए कांकेर जिले में पशुधन की सुरक्षा के लिए तैयारियां तेज कर दी गई हैं। पशुधन विकास विभाग के उप संचालक डॉ. सत्यम मित्रा ने जिले के समस्त पशुपालकों से समय रहते आवश्यक सावधानियां बरतने और पशुधन की सुरक्षा के लिए विशेष उपाय अपनाने की अपील की है।


अल नीनो: बदलते मौसम का पशुधन पर सीधा असर

उप संचालक डॉ. सत्यम मित्रा ने जानकारी देते हुए बताया कि अल नीनो एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील जलवायु घटना है, जिसके कारण मानसून के आगमन, वर्षा के पैटर्न और सामान्य तापमान में बड़े बदलाव की संभावना बनी हुई है। इस मौसमी बदलाव के चलते प्रदेश के कई जिलों में इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान मौसम विज्ञानियों द्वारा लगाया जा रहा है।

कांकेर जिले के कुछ विशेष विकासखंडों में भी पिछले वर्षों के आंकड़ों की तुलना में वर्षा का प्रतिशत काफी कम दर्ज किया गया है। इस स्थिति ने प्रशासन और विभाग की चिंता बढ़ा दी है, जिससे भविष्य में सूखे जैसी विषम परिस्थितियां उत्पन्न होने की गंभीर आशंका व्यक्त की जा रही है। ऐसी स्थिति में पशुओं को सुरक्षित रखना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

कम वर्षा और सूखे की स्थिति: चारे का गंभीर संकट

पशु चिकित्सा सेवा विभाग के अनुसार, कम वर्षा और सूखे की स्थिति में सबसे पहला और सीधा प्रहार घास और चारे के उत्पादन पर पड़ता है। चारे की कमी के कारण पशुओं के लिए भोजन का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है, जिससे उनकी सेहत और दुग्ध उत्पादन पर विपरीत असर पड़ेगा।

इस भोजन संकट से बचाव के लिए विभाग ने पशुपालकों को अभी से पर्याप्त मात्रा में चारे का भंडारण करने की सलाह दी है। इसके लिए निम्नलिखित वैज्ञानिक और पारंपरिक तरीकों को अपनाने पर जोर दिया गया है:

  • साइलेज और सूखा चारा: हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए साइलेज बनाने की तकनीक अपनाएं। इसके साथ ही सूखे चारे (पैरा/भूंसा) का अग्रिम भंडारण सुनिश्चित करें।
  • यूरिया उपचारित पैरा: धान के पुआल (पैरा) की पौष्टिकता बढ़ाने के लिए उसे यूरिया से उपचारित करके संग्रहित करें, ताकि कम चारे में भी पशुओं को सही पोषण मिल सके।
  • अजोला चारा का उपयोग: कम पानी और कम लागत में तैयार होने वाले प्रोटीन युक्त अजोला चारे का उत्पादन अपने घरों या फार्म में शुरू करें।

कृषि पैटर्न में बदलाव: सूखा प्रतिरोधी फसलों का चयन

उप संचालक डॉ. मित्रा ने पशुपालकों और किसानों से अपील की है कि वे अपनी कृषि पद्धतियों में थोड़ा बदलाव लाएं। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है, वहां अधिक पानी की आवश्यकता वाले हरे चारे जैसे सुपर नेपियर, पैरा घास, बरसीम और मक्का के चारे का उत्पादन सीमित मात्रा में ही करें।

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इसके स्थान पर कम पानी में जीवित रहने वाली और तेजी से बढ़ने वाली सूखा प्रतिरोधी चारा फसलों का उत्पादन किया जाना चाहिए, जैसे:

  1. सोरगम (ज्वार) की सूखा सहन करने वाली किस्में
  2. बाजरा और लोबिया (काऊपी)

यदि आने वाले दिनों में चारे की भारी कमी होती है, तो प्रकृति में उपलब्ध पौष्टिक पेड़ों की पत्तियों, जैसे बबूल और पीपल की पत्तियों को भी पशुओं के आहार में शामिल किया जा सकता है। यह संकट के समय पशुओं को भुखमरी से बचाने में सहायक सिद्ध होगा।

पेयजल प्रबंधन: जल संकट से निपटने की तैयारी

आने वाले समय में संभावित जल संकट को देखते हुए पशुधन विकास विभाग ने पेयजल स्रोतों की सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर कड़े निर्देश दिए हैं। पशुपालकों से कहा गया है कि वे पशुओं के पीने के पानी की टंकियों, होदों और कुंओं की नियमित रूप से साफ-सफाई और ब्लीचिंग पाउडर आदि से कीटाणुशोधन करें।

इसके साथ ही, भीषण गर्मी को देखते हुए पशुओं के पीने के पानी के बर्तनों या टंकियों को हमेशा छायादार स्थान पर रखा जाना चाहिए। सीधे धूप में रखा हुआ गर्म पानी पीने से पशुओं की पाचन क्रिया प्रभावित होती है और वे बीमार पड़ सकते हैं। पशुओं को दिन में कम से कम तीन से चार बार साफ और ठंडे पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

हीट स्ट्रेस और बीमारियों से बचाव: स्वास्थ्य प्रबंधन सर्वोपरि

अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण पशुओं में ‘हीट स्ट्रेस’ (गर्मी का तनाव) बढ़ने की संभावना बहुत अधिक हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) तेजी से घटने लगती है, जिससे वे विभिन्न मौसमी और संक्रामक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

इस खतरे को टालने के लिए डॉ. सत्यम मित्रा ने समय पर टीकाकरण और कृमिनाशक दवाओं (Deworming) के उपयोग पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने पशुपालकों को निम्नलिखित सावधानियां बरतने की सलाह दी है:

“पशुओं को तेज धूप में खुला न छोड़ें। दोपहर के समय उनसे किसी भी प्रकार का अत्यधिक या कठिन कार्य न लें। शेड के भीतर वेंटिलेशन और हवा की उचित व्यवस्था रखें।”

इसके अतिरिक्त, चारे की बर्बादी को रोकने के लिए आधुनिक कुट्टी मशीनों का उपयोग करें। यदि कोई पशु सुस्त दिखाई दे, खाना-पीना कम कर दे या उसके शरीर का तापमान बढ़ा हुआ लगे, तो तत्काल नजदीकी पशु चिकित्सालय या चिकित्सक से संपर्क कर उसका उपचार कराएं।

आर्थिक सुरक्षा के लिए पशुधन बीमा का लाभ उठाएं

सूखे या किसी भी अनहोनी की स्थिति में पशुपालकों को बड़े आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए विभाग ने पशुधन बीमा कराने की सलाह दी है। जिले के सभी पशुपालक अपने निकटतम पशु चिकित्सा संस्थाओं, कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों या विकासखंड स्तरीय पशुधन अधिकारियों से संपर्क कर शासकीय योजनाओं के तहत अपने पशुओं का बीमा अवश्य कराएं, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति में आर्थिक संबल मिल सके।

समय रहते तैयारियां ही पशुधन की रक्षा का एकमात्र विकल्प

उप संचालक पशु चिकित्सा सेवाएं ने कांकेर जिले के सभी छोटे-बड़े पशुपालकों, डेयरी संचालकों और कृषकों से भावुक अपील की है कि वे संभावित सूखे की स्थिति को हल्के में न लें। समय रहते की गई आवश्यक तैयारियां ही हमारे मूक पशुधन को किसी भी प्रकार की हानि से बचा सकती हैं। विभाग के मैदानी कर्मचारी और डॉक्टर हर ब्लॉक में मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध हैं।