स्वामी विवेकानंद निर्वाण दिवस: पीएम नरेंद्र मोदी ने दी श्रद्धांजलि, कहा- राष्ट्र-चेतना को वैश्विक पहचान दिलाने में योगदान अतुलनीय






स्वामी विवेकानंद निर्वाण दिवस: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी श्रद्धांजलि, कहा- राष्ट्र-चेतना को वैश्विक पहचान दिलाने में उनका योगदान अतुलनीय

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स्वामी विवेकानंद निर्वाण दिवस: राष्ट्र-चेतना को वैश्विक पहचान दिलाने में विवेकानंद का योगदान अतुलनीय – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली | अपडेटेड: 4 जुलाई 2026, 10:15 AM

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को महान दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु और युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि (निर्वाण दिवस) पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री ने देश और दुनिया में भारतीय संस्कृति, सनातन अध्यात्म और राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करने में विवेकानंद के योगदान को अद्वितीय और अतुलनीय बताया। उन्होंने कहा कि विवेकानंद की बौद्धिकता और ओजस्वी विचार आज भी देश के करोड़ों युवाओं को सही राह दिखा रहे हैं और ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने में नई ऊर्जा का संचार कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक्स’ पर साझा किया संदेश

शनिवार सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर हिंदी में पोस्ट कर स्वामी विवेकानंद को नमन किया। उन्होंने अपने संदेश में लिखा:

“स्वामी विवेकानंद जी के निर्वाण दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्र-चेतना को वैश्विक पहचान दिलाने में उनका योगदान अतुलनीय है। उनकी बौद्धिकता और प्रेरणादायी विचार आज भी करोड़ों युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं। उनके आध्यात्मिक संदेश विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में देश को नई ऊर्जा और दिशा देते रहेंगे।”

प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने के लिए विवेकानंद का विजन ही मुख्य आधार है। आज जब देश आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तब विवेकानंद के बताए सिद्धांत और राष्ट्रवाद की भावना देशवासियों के लिए सबसे बड़ा संबल हैं।

अल्पायु में देश को बदलने वाला महानायक: एक नजर जीवन सफर पर

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक संभ्रांत परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम नरेद्रनाथ दत्त था। वे शुरुआत से ही तीव्र बुद्धि, खोजी प्रवृत्ति और गहरे आध्यात्मिक रुझान वाले व्यक्ति थे। सत्य की खोज में उनकी मुलाकात महान संत रामकृष्ण परमहंस से हुई, जिन्होंने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में आकर वे सन्यासी बने और स्वामी विवेकानंद के रूप में विख्यात हुए।

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विवेकानंद का जीवन बेहद संक्षिप्त लेकिन बेहद प्रभावशाली रहा। उन्होंने मात्र 39 वर्ष की आयु में 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में महासमाधि (निर्वाण) ले ली थी। इतने कम समय में उन्होंने भारतीय दर्शन, विशेष रूप से वेदांत और योग को दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाया। उन्होंने देश में जातिवाद, अंधविश्वास और कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया और मानव सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म बताया।

1893 का शिकागो भाषण: जब गूंज उठा भारतीय अध्यात्म का डंका

स्वामी विवेकानंद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान तब मिली, जब उन्होंने सितंबर 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ (World’s Parliament of Religions) में भारत और सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया। जब वे मंच पर आए और उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत “अमेरिका के भाइयों और बहनों” के साथ की, तो पूरा सभागार कई मिनटों तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।

उस ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने दुनिया को सहिष्णुता, सार्वभौमिक स्वीकार्यता और मानवता का संदेश दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि जिस तरह सारी नदियां अंततः समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार दुनिया के सभी धर्म एक ही ईश्वर की ओर ले जाते हैं। उनके इस व्याख्यान ने पश्चिमी जगत की भारतीय संस्कृति के प्रति संकीर्ण सोच को पूरी तरह से बदल दिया और भारत को वैश्विक पटल पर ‘विश्वगुरु’ के रूप में स्थापित किया।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना: समाज सेवा और अध्यात्म का अद्भुत संगम

अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के महासमाधि लेने के बाद, स्वामी विवेकानंद ने उनके संदेशों और व्यावहारिक वेदांत को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य केवल पूजा-पाठ या धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि दरिद्र नारायण (गरीबों और असहायों) की सेवा करना था।

विवेकानंद का मानना था कि जब तक देश से भुखमरी, अज्ञानता और अशिक्षा दूर नहीं होती, तब तक सच्ची प्रगति संभव नहीं है। आज भी रामकृष्ण मिशन दुनिया भर में सैकड़ों अस्पतालों, स्कूलों, अनाथालयों और आपदा राहत केंद्रों के माध्यम से निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा कर रहा है।

‘विकसित भारत @ 2047’ और युवाओं के लिए विवेकानंद के विचार

वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए ‘विकसित भारत’ के संकल्प में युवा शक्ति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। स्वामी विवेकानंद हमेशा युवाओं को राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव मानते थे। उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी हर युवा की रगों में जोश भर देता है:

“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन और संदेशों में कई बार इस बात का उल्लेख किया है कि भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है। विवेकानंद का मानना था कि निडर, साहसी और महत्वाकांक्षी युवा ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। आज का युवा वर्ग शिक्षा, तकनीक, खेल और स्टार्टअप्स के माध्यम से वैश्विक स्तर पर भारत का नाम रोशन कर रहा है, जो स्वामी विवेकानंद के सपनों के भारत की जीवंत तस्वीर है।

युगों-युगों तक मार्गदर्शक रहेंगे विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद भले ही आज भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षाएं, उनके ग्रंथ और उनके विचार अमर हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि आत्म-विश्वास और राष्ट्र-प्रेम के बल पर किसी भी विपरीत परिस्थिति को बदला जा सकता है। उनका निर्वाण दिवस हमें उनके दिखाए गए सेवा, त्याग और राष्ट्रीय एकता के मार्ग पर चलने की याद दिलाता है। भारत को समृद्ध, सशक्त और विश्वगुरु बनाने के लिए उनके संदेश आने वाली कई पीढ़ियों तक प्रकाश स्तंभ की तरह काम करते रहेंगे।