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तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की जंग तेज: बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के सामने ठोका ‘असली TMC’ पर दावा, ममता खेमे ने खड़े किए सवाल






तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की जंग तेज: बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के सामने ठोका ‘असली TMC’ पर दावा, ममता खेमे ने खड़े किए सवाल


तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण की लड़ाई तेज: बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के समक्ष किया ‘असली TMC’ का दावा, ममता खेमे ने उठाए सवाल

प्रदेश खबर नेटवर्क | अपडेटेड: 03 जुलाई 2026, 09:55 AM IST

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहा अंदरूनी सत्ता संघर्ष अब देश की राजधानी दिल्ली की चौखट तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण को लेकर जारी खींचतान बृहस्पतिवार को उस समय अपने चरम पर पहुंच गई, जब पार्टी से निष्कासित और बागी गुट के प्रमुख नेता ऋतब्रत बनर्जी ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के समक्ष पहुंचकर पूरी पार्टी और उसके आधिकारिक चुनाव चिन्ह ‘जोड़ा घास फूल’ (ट्विन-फ्लेवर सिंबल) पर अपना दावा ठोक दिया।

बागी गुट के इस बड़े रणनीतिक कदम के बाद निर्वाचन आयोग ने भी तुरंत सक्रियता दिखाई है। आयोग ने दोनों विरोधी गुटों को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि वे पार्टी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं (Authorised Signatories) और हाल ही में हुए संगठनात्मक चुनावों को लेकर अपने-अपने दावे और जवाबी दावे आधिकारिक तौर पर पेश करें। आयोग ने इस पूरी कानूनी व प्रशासनिक लड़ाई के लिए दोनों पक्षों को 6 जुलाई की शाम 5:30 बजे तक का समय दिया है, ताकि दोनों गुट अपने दस्तावेजी साक्ष्य सौंप सकें।

“निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों प्रतिद्वंद्वी धड़ों—एक जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरा जिसका नेतृत्व बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं—को औपचारिक नोटिस जारी कर संगठनात्मक नियंत्रण और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं पर 6 जुलाई तक विस्तृत जवाब मांगा है।”

बागी गुट का दावा: हमारे पास है दो-तिहाई बहुमत

पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में नजर आ रहे ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एक 10 सदस्यीय उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल बृहस्पतिवार को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों की पूर्ण पीठ से मिला। मुलाकात के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनके पास पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों का व्यापक और स्पष्ट बहुमत है।

उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायकों में से 58 से अधिक विधायक उनके साथ मजबूती से खड़े हैं। इसके अलावा, नगर निगमों के पार्षदों, नगरपालिकाओं के अध्यक्षों और जिला परिषदों के सदस्यों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को नकार कर उनके गुट में शामिल हो चुका है। बागी गुट का तर्क है कि लोकतंत्र में संख्या बल ही सर्वोपरि होता है, और चूंकि विधायी और संगठनात्मक स्तर पर बहुमत उनके पास है, इसलिए वही ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ हैं।

ममता बनर्जी के वफादारों का पलटवार: निर्वाचन आयोग की भूमिका पर उठाए सवाल

दूसरी तरफ, इस पूरे घटनाक्रम और निर्वाचन आयोग द्वारा बागी गुट को दिए गए ‘धैर्यपूर्ण अवसर’ को लेकर ममता बनर्जी के प्रति वफादार रहने वाले वरिष्ठ नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय और नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने निर्वाचन आयोग के इस रुख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और आयोग की कार्यप्रणाली की आलोचना की है।

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वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने आयोग के फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पहले ही तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका है। ऐसे में एक निष्कासित नेता या उसके समूह को पार्टी का प्रतिनिधित्व करने या आयोग के सामने दावा पेश करने का कोई वैधानिक अधिकार (Locus Standi) नहीं बनता है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किस नियम के तहत आयोग ने आधिकारिक हस्ताक्षरकर्ताओं की अनुपस्थिति में एक बागी धड़े को मिलने का समय दिया और उनके दावों को एंटरटेन किया?

इसी सुर में सुर मिलाते हुए सांसद सागरिका घोष ने भी इस बागी समूह को पूरी तरह से अनधिकृत बताया। उन्होंने सोशल मीडिया और बयानों के जरिए स्पष्ट किया कि तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व ममता बनर्जी के बिना अकल्पनीय है। कोई भी बाहरी या निष्कासित व्यक्ति रातों-रात खुद को पार्टी का मालिक घोषित नहीं कर सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग का यह कदम पूरी तरह से पूर्वाग्रह से प्रेरित नजर आता है और इसके पीछे विपक्षी राजनीतिक ताकतों का हाथ हो सकता है।

विवाद की जड़: विधानसभा चुनाव में हार और बड़ी बगावत

तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह अप्रत्याशित विभाजन हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद शुरू हुआ। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। इस करारी शिकस्त के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और सांगठनिक बदलाव को लेकर असंतोष की चिंगारी भड़क उठी, जिसने देखते ही देखते एक बड़ी बगावत का रूप ले लिया।

यह संकट केवल राज्य विधानसभा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर संसद में भी देखने को मिला। कुछ समय पहले ही तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की घोषणा करते हुए नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी (NCPI) में अपना विलय कर लिया था। इसके बाद से ही सांगठनिक ढांचे को हथियाने की यह कानूनी जंग शुरू हुई है।

इस बगावत को तब और हवा मिली जब 22 जून को बागी गुट ने कोलकाता में एक विशेष संगठनात्मक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में एक समानांतर राष्ट्रीय कार्यकारिणी (National Working Committee) का गठन किया गया, जिसमें वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी का नया चेयरमैन चुन लिया गया और संस्थापक ममता बनर्जी को पद से हटाने का विवादित प्रस्ताव पारित किया गया।

TMC के दोनों गुटों की वर्तमान स्थिति और दावों का गणित

निर्वाचन आयोग अब ‘सिंबल ऑर्डर, 1968’ के पैरा 15 के तहत इस मामले की जांच कर रहा है। आयोग दोनों पक्षों द्वारा सौंपे जाने वाले पार्टी संविधान, सदस्यता रजिस्टर, बैठक के मिनट्स और जनप्रतियनिधियों के हलफनामों की स्क्रूटनी करेगा। वर्तमान सांगठनिक और विधायी समीकरण कुछ इस प्रकार हैं:

सदन/संगठन का हिस्सा ममता बनर्जी खेमा (मूल गुट) ऋतब्रत बनर्जी खेमा (बागी गुट) कुल संख्या / स्थिति
पश्चिम बंगाल विधानसभा (MLAs) लगभग 20 से 22 विधायक 58 से 60 विधायक (दावे के मुताबिक) कुल 80 विधायक
लोकसभा सांसद (MPs) 08 सांसद शेष 20 सांसद (NCPI में विलय का दावा) कुल 28 सांसद थे
राष्ट्रीय नेतृत्व पद (दावा) ममता बनर्जी (संस्थापक व सुप्रीम लीडर) अरूप रॉय (बागी गुट द्वारा घोषित चेयरमैन) विवादित
मुख्य कानूनी आधार पार्टी का मूल सांगठनिक ढांचा और स्थापना इतिहास विधायकों और स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का बहुमत आयोग के समक्ष विचाराधीन

आगे क्या होगा? 6 जुलाई की समयसीमा बेहद अहम

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, अब गेंद पूरी तरह से निर्वाचन आयोग के पाले में है। 6 जुलाई को दोनों पक्षों की ओर से आने वाले जवाबों और दस्तावेजी सबूतों के बाद आयोग यह तय करेगा कि क्या इस मामले में आगे और लंबी व्यक्तिगत सुनवाइयों की आवश्यकता है या नहीं। यदि आयोग को लगता है कि बागी गुट का दावा प्रथम दृष्टया मजबूत है, तो वह पार्टी के नाम और सिंबल के इस्तेमाल पर अंतिम फैसला आने तक अंतरिम रोक (Freeze) भी लगा सकता है, जैसा कि अतीत में शिवसेना और लोक जनशक्ति पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के मामलों में देखा गया है।

फिलहाल, इस सांगठनिक लड़ाई ने पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। जहां एक तरफ ममता बनर्जी का खेमा अपने कानूनी और नैतिक अधिकारों को लेकर आश्वस्त है और इसे कोर्ट में चुनौती देने की बात कर रहा है, वहीं ऋतब्रत बनर्जी का बागी गुट खुद को नई और लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस के रूप में स्थापित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है।


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