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मोदी सरकार गरीब व मजदूर श्रमिको को आर्थिक संकट में डालने का कार्य कर रही : स्वामीनाथ जायसवाल

मोदी सरकार गरीब व मजदूर श्रमिको को आर्थिक संकट में डालने का कार्य कर रही : स्वामीनाथ जायसवाल

नई दिल्ली भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा की मोदी सरकार को सत्ता में 7 साल हो गए लेकिन हमारे मजदूर वर्ग और श्रमिको के लिए कुछ नही किया परन्तु उनको रोजगार से भी मुक्त किया जा रहा है , उनको रोजगार का कोई साधन नहीं बचा ऐसे में रोजी रोटी पर ही संकट आ गया है यहां तक कि उनके बच्चों का भविष्य भी अंधकार में लेकिन सत्ता की लोभी सरकार को कुछ नही दिखता सत्ता के अलावा में मोदी सरकार से कहना चाहता हूं कि अच्छे दिन का सपना दिखाकर लोगों में भ्रम फैलाकर जो श्रमिक मजदूर किसानों के साथ सरकार द्वारा किया जा रहा है इससे खराब कुछ हो नहीं सकता वही पुराना दिन लौटा दे सरकार मजदूर और मालिक का रिश्ता, यह एक ऐसा रिश्ता है कि इन दोनों में से कोई भी अगर किसी का साथ छोड़ दे तो इस रिश्ते की व्याख्या करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । बगैर एक-दुसरे के कोई एक कदम भी नहीं चल सकता। लेकिन मजदूर और मालिक की तुलना की जाये तो मालिक मालामाल होते चले जा रहे है और मजदूर जस का तस फटेहाल मुफलिसी की जिंदगी जीने को विवश है। मजदूरों की वही स्थिति है जो आजादी के पूर्व थी। इतने सालों बाद भी अगर मजदूरों में कोई बदलाव नहीं आया तो इसके लिए
जिम्मेदार कौन है? प्रधानमंत्री, नीतियां और कानून ! या फिर राजनीतिक उपेक्षा! हो जो भी सच तो यह है कि इसके लिए कहीं न कहीं देश में गंदी राजनीति ही मजदूरों को हासिए पर ला खड़ा किया है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है, फिर किस आधार पर राजनेता देश को औद्योगिक राष्ट्र बनाने का सब्जबाग दिखाते हैं, जबकि करोड़ों मजदूर
कष्ट में हैं? मजदूरों की बड़ी आबादी इन दिनों काम की
तलाश में भटक रही है। मगर इन्ही दिनों में मिल मालिक और बुद्धिजीवी वर्ग के लोग अपने-अपने भिन्न-भिन्न व्यक्तव्यों से तथा विभिन्न तरीकों से मजदूरों को अपने उपयोग का साहित्य बनायेंगे।

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राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामीनाथ जयसवाल ने कहा कि जबकि मजदूर चिलचिलाती धूप में मिट्टी और सीमेंट में सन कर भूखे-प्यासे किसी निर्माण कार्य में लगे रहेंगे। 94 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र के उद्धार का दावा करने वाले श्रमिक संगठनों की संख्या भी हजार से ऊपर है, लेकिन मजदूरों की जिंदगी ‘राम की गंगा’ से भी बदतर है। आज असंगठित क्षेत्र का मजदूर 12 से 14 घंटे तक काम करने को मजबूर है। उसकी कोई मजदूरी तय नहीं है। ठेकेदार (काँट्रैक्टर) मजदूर की मजबूरी का फयदा शीतल छाया में बैठकर उठाते हैं। बैंक जाकर पेंशन उठाना मजदूर के सपने में भी नहीं आता। उसके लिए सातों दिन भगवान के हैं। जिस दिन काम पर नहीं निकलेगा उस दिन बीवी-बच्चों के साथ उसका भूखा सोना तय है। सामाजिक सुरक्षा किस चिड़िया का नाम है, उसे नहीं पता। अशिक्षित होने के चलते उसे हर दम असुरक्षा सताती रहती है।

स्वामीनाथ जयसवाल ने बताया कि यह भारत की 94 प्रतिशत असंगठित लेबरफर्स का हाल है। बाकी बचे 6 प्रतिशत संगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी हूरों के सपने नहीं आते। वे सरकार द्वारा चलाए जा रहे निजीकरण के बुल्डोजर से हर पल भयभीत रहते हैं। वीआरएस के हथियार से उन्हें किसी भी वक्त कत्ल किया जा सकता है। काम के बोझ से उनकी कमर कमान बनी रहती है लेकिन कम तनख्वाह की महाभारत खत्म होने का नाम नहीं लेती। ऊपर से उन्हें छोटे-छोटे लाभों से वंचित रखने की साजिशें लगातार चलती रहती हैं। उसपर से मोदीजी के आत्मनिर्भर भारत के नये श्रम कानून दुनिया के सर्वाधिक अवरोधी कानून हैं।

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