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मनरेगा, सत्तर साल की असफलता का शोकेस यह कहने वाले थूक कर चाटने का काम करते हैं स्वामीनाथ जायसवाल

मनरेगा, सत्तर साल की असफलता का शोकेस यह कहने वाले थूक कर चाटने का काम करते हैं स्वामीनाथ जायसवाल

नई दिल्ली प्रेस वार्ता मैं भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा जिसको असफलताओं का इतिहास बताने वाले खुद इतने भ्रम में हैं कि उसी मने रहेगा करोना काल का सबसे बड़ा हथियार बना और जो यह बोलकर ढोल पीटते रहे थे कि आधार कार्ड एक जीता जागता असफलता यूपीए का कारण है “आजादी के सत्तर सालों के बाद भी देश के गरीब को देने के लिए हमारे पास मिट्टी का ढेर है। यह सत्तर साल की असफलता की दास्तां है, इसे खत्म नही करूँगा, इसे तो सजाकर रखूंगा”

खान्ग्रेस पर कड़े वार के रूप में प्रशंसित यह भाषण, असल मे मौजूदा प्रधानसेवक की आर्थिक नासमझी का बेशर्म उद्घोष था। इसलिए उस फुटेज को जरूर सम्हालकर रखा जाना चाहिए।

मनरेगा पर पोस्ट है। शहराती और राजनीतिक पोस्ट पसन्द करने वाले धैर्य रखें। आपको इकॉनमिक्स और गवरनेंस के बेसिक्स बता रहा हूं।

तो मनरेगा का इतिहास पुराना है। साठ के दशक में सामुदायिक विकास कार्यक्रम चलते थे। ग्रामीण विकास के छोटे छोटे काम जिसमे मजदूर को काम मिले, निश्चित वेतन मिले, और कुछ उपयोगी संसाधन बन जाएं। मिट्टी की सड़क, तालाब, पौधरोपण, मेड़बन्दी, कुआं

देश मे कम आय का कारण छिपी बेरोजगारी है। 6 माह तो फसल से कमा लेते है, बाकी के 6 माह… तो इतनी देर वे सॉफ्टवेयर कोडिंग तो कर नही सकते। दो हाथ है, मजदूरी कर सकते हैं। पर कहाँ करें?? 400 घरों के गांव में 350 घरों को काम चाहिए। काम कौन देगा – सेठजी!!

लेकिन सेठजी के पास तो गांव भर के 350 मजदूर हैं। तो जब श्रम बहुत हो, कीमत कम ही देंगे। उसके बावजूद सबको काम न मिलेगा, तो पलायन होगा।

तो मिट्टी खोद योजनाएं इसलिए बनती हैं। लोग सेठजी के गुलाम न रहें, उन्हें गांव में ही काम मिले, काम की न्यूनतम मजदूरी मिले। ग्रामीण जनता की वार्षिक आय बढ़े।

तो मनरेगा, 2006 में मजदूर को काम के अधिकार के रूप में रूप मिला। NFFW, सुनिश्चित रोजगार, जवाहर रोजगार, सूखा राहत जैसी अलग अलग रेट की स्कीम को एकजाई कर दिया गया। गांव में पैसा बहने लगा।

अब आय बढ़े तो क्या होगा?? गरीब संचय नही करता, खर्च करता है। पढाई पर, मकान पर, खाने पीने पर, मोटरसाइकिल पर, मोबाइल पर, कपड़े लत्ते पर। ये सब कहाँ मिलता है- अजी सेठजी की शॉप पर

तो सारा पैसा सेठजी की गांव या कस्बे की दुकान पर आता है। वहां से व्होलसेलर को मिलता है। व्होलसेलर से स्टाकिस्ट को, उससे डिस्ट्रीब्यूटर को, उससे फैक्ट्री को, और फिर उससे अम्बानी , अडानी साहब को जिनकी वो फैक्ट्री है।

वही अम्बानी अडानी जिसने आपको रोजगार दिया है, फैक्ट्री लगाकर ( मने ऐसा कमेंट आप ही करते है मेरी पोस्ट पर)

तो गांव में चार सौ परिवारों की दैनिक इनकम साठ रुपये थी। एकदम से डेढ़ सौ हो गयी। ये मनरेगा का कमाल था। अब गांव की इकॉनमी को सालाना, और ऐसे लाखों गांव की इकॉनमी में घुसे पैसे का हिसाब लगाइये। आपको समझ आएगा कि मनमोहन सरकार के दौर में बाजार पैसे से तरबतर क्यों था।

क्यो धांय धांय ग्रोथ हो रही थी। क्यो गांव के लोग मोबाइल, और शहर के व्यापारी फार्च्यूनर ले रहे थे। क्यो टूरिज्म में बूम था। क्यो सारे लोग जमीन और मकान खरीद रहे थे।

और एक दिन सब खटाक से गायब हो गया।

तो पहले बताया गया कि मनरेगा में भ्रस्टाचार है। और कहा कि जनता को मिट्टी खोदने का काम देना, शर्म की बात है। अब करप्शन, गर्व, शर्म का कॉकटेल तो हमे खूब भाता है।

तो हम धारा के साथ बहे। हमे बताया गया कि निजी कम्पनियां फैक्ट्री लगाएगी, व्यापार बढ़ाएगी, रोजगार देगी, ग्रोथ देगी, प्रोडक्शन देगी। हमने मान लिया। उन पर राष्ट्रीय संसाधन वार दिये। उन्होंने किया भी, कारें, कपड़े , मॉल्स बनाये। माल से भर दिया।

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अरे च्युतियों। खरीदेगा कौन???

अर्थव्यवस्था की जड़ की बजाय पत्तों को सींचने की शुरआत हुई। अब तक चल रही है। शुरआत में मुझे भी लगता था, की गड्ढे खोदने में हजारों करोड़ बरबाद करने का क्या तुक?? टैक्सपेयर के पैसे की बर्बादी है।

नही!!

पैसा एक नोशन है, अवधारणा है। खर्च होकर उड़ता नही, वहीं अर्थव्यवस्था में हाथ बदलता रहता है। इकॉनमिस्टो की सरकार देखती है कि पैसा “किसी बहाने” हर हाथ से होकर गुजरे। वो आदिवासी हो, अनपढ़ हो, अकुशल हो, लेकिन उसके हाथ मे पैसा आये। उसे सेठ की गुलामी न करनी पड़े। उसे चोरी, डकैती के लिए मजबूर न होना पड़े।

इसलिए यहां टैलेंट का गीत न गाइये, पैसे बर्बादी के नोशन में न फंसिए। बेमतलब शर्म और गर्व मत कीजिए। सबई इंडिया- बाबू,आईएएस इंजीनियर,वकील, सीए नही बन सकते।

आप सरकार है, तो यह समंझना पड़ेगा कि अकुशल को जीने का हक है। और उसके हाथ मे पैसा देना कम रिस्की है। क्योकि उसको दिया पैसा खत्म नही होता, यही घूमता है,।

हाँ, पूनावाला के पैसे जरूर चुपके से निकालकर लन्दन छुपाये जा सकते हैं।

पोस्ट एक बार मे समझ नही आएगी। दोबारा पढिये, जितना लिखा उससे ज्यादा समझ जाएंगे। लेकिन यह बात हमारे परिधानसेवक और उनकी जाहिल जमात को समझ नही आई है।

मनरेगा जिंदा है, मगर मुर्दा है, शो पीस है। पलायन और ग्रामीण आय में गिरावट वापस है। नीचे से ऊपर पैसे का प्रवाह बन्द है। बाजार में माल है, खरीदार नही है। ग्रोथ नेगेटिव है। विकास बन्द है।

यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी कोई स्कीम ही देश को बचा सकती है। क्योकि अब गड्ढे खुदवाने का भी वक्त नही। आप न्याय योजना पर राहुल जैसो का मजाक उड़ा लीजिये। पर पप्पू की वही स्कीम, आधे अधूरे मन के साथ लागू की गई, जो आपकी “किसान कल्याण निधि” है, “डीबीटी” है।

यह आपने समझा क्या.. ??

नही समझेंगे। जाहिल आप भी तो कम नही। बहरहाल, मूर्खों का मूर्खों द्वारा मूर्खों के लिए दिया गया वो भाषण याद कीजिए। वो मौजूदा प्रधानसेवक की इकॉनमिक जाहिलियत का बेशर्म उद्घोष था।

उस फुटेज को सम्हालकर रखा जाना चाहिए। और जिस तरह से संसद भवन के पटल पर झूठ का भरमार भारतीय जनता पार्टी और मोदी द्वारा किया गया वह देश का एक भी नागरिक अब बुद्धू नहीं बन सकता जो एक बार नही दूसरे बार भी सत्ता में लयागया जो झूठ देश को परोसा गया और यूपीए के किए कामों को जिस तरह से उछाल उछाल कर बदनाम करने की कोशिश की गई आज 3:30 ₹ का सिलेंडर 1000 में बिक रहा है एक सौ से ऊपर डीजल और पेट्रोल 110 करीबन पहुंच गया उसके बाद यह सरकार ढोल पीट रही है विकास की बात करती है जहां विकास कोसों दूर हो गया युवा बेरोजगार हो गए और नमक से रोटी गायब हो गया रोटी से तेल गायब हो गया देश में महंगाई इतने चरम सीमा पर पहुंच गई कि आज एक आम नागरिक को जीने और खाने के लिए सोचना पड़ रहा है यह सरकार निकमों और ढकोसला बाजो का है यह भ्रम फैलाकर जिस तरह से जनता को और किसान को मजदूर को भ्रमित कर कर जिस तरह से काले कानून लाया गया किसानों के लिए और मजदूरों के लिए जिस तरह से कानून लाया गया यह देश सब को धोखा दे रही है भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी नाथ जायसवाल ने कहा सत्ता के अहंकार में मोदी सरकार जिस तरह से आम आदमी को जीने पर उनके रोजी-रोटी पर तबाही मचा दिया है और देश की संपत्ति धड़ल्ले से बेचने का काम और देश में बेरोजगारी आर्थिक तंगी जिस तरह सरकार में बड़ी है जिस तरह से लोग तबाह हुए हैं यह करोना काल का बहाना बनाकर जिस तरह से लोगों को भ्रमित किया गया है बीजेपी मोदी सरकार का घोर निंदा करते हुए देश के जागरूक 135 करोड़ जनता को आगाह करना चाह रहा हूं कि आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी के कुशासन को अगर इसी तरह हम लोग आगे बढ़ाते है तो धोखा खाना परेगाऔर आप सतर्क हो जाइए क्योंकि लड़ाई लड़ने के लिए हम कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस सड़क से संसद तक जनता का आवाज मजदूर का आवाज बन उनको न्याय दिलाने और गरीबों की आवाज बनने का काम करें स्वामीनाथ जायसवाल

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