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गरियाबंद : बिना सड़क ‘पहाड़‘ बनी पहाड़ी पर बसने वाले ग्रामीणों की जिंदगी में परेशानियां ही परेशानियां

गरियाबंद : बिना सड़क ‘पहाड़‘ बनी पहाड़ी पर बसने वाले ग्रामीणों की जिंदगी में परेशानियां ही परेशानियां

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केशरी साहू /न्यूज रिपोर्टर/गरियाबंद/मैनपुर/छत्तीसगढ राज्य निर्माण के 23 वर्ष बाद भी देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वः राजीव गांधी के गोद ग्राम कुल्हाडीघाट के आश्रित ग्रामों जो पहाडी के उपर बसा है, भालूडिग्गी, ताराझर, कुर्वापानी, मटाल, इन ग्रामों में पहुचने के लिए सडक निर्माण नही होेने के कारण आज भी यहा के विशेष पिछडी कमार जनजाति के लोगो को राशन सामग्री चांवल,दाल, शक्कर, मिटटी तेल लेने के लिए महिना में एक दिन लगभग 24 -26 किलोमीटर पैदल दुरी तय कर पहाडी के नीचे बसे पंचायत मुख्यालय कुल्हाडीघाट ग्राम आना पड़ता है तब कही जाकर इन ग्रामों के लोगो को राशन सामग्री उपलब्ध हो पाती है। सड़क नहीं होने के कारण सायकल, मोटर सायकल, तो दुर पैदल बमुश्किल पेडों गढ्ढों खाई नदी नालो को पार कर आना जाना करना पड़ता है।

एक तरफ हमारे बडे शहर विकास के नये सौपान तय कर रहा है जंहा जिंदगी काफी तेज रफ्तारो में चल रही है, और देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वप्न देखा था जब गांव विकास करेगा तब देश विकास करेगा लेकिन गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखण्ड के पहाडि़यों के उपर बसे इन ग्रामों में विकास तो काफी दुर इन्हे दो वक्त की भोजन के जुगांड के लिए काफी मशक्कत करना पडता है, क्योंकि पहाडी ईलाका पथरीला होना के कारण यहा खेती किसानी भी सही नही हो पाती और जंगल से मिलने वाले कंद मूल आज भी इनके भोजन के अहम हिस्सा है। यहा के ग्रामीण लखमुराम कमार, मोहन कमार, ईतवारूराम, बिसाहिन बाई, यशोदा बाई, सुन्तीबाई, शोभनाबाई, सपुरो बाई, हेमादी बाई , भानुमति, कौशिल्या, गोमती बाई, कांतीबाई, बेलमोती, रूखमणी ने शनिवार को राशन लेने कुल्हाड़ीघाट पहुंचे थे उन्होंने बताया कि प्रतिमाह उन्हे राशन लेने पैदल 25 कि.मी. दूर कुल्हाड़ीघाट पैदल जाना पड़ता है और पैदल वापस आना पड़ता है।

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पहाड़ी के ऊपर इन ग्रामों में निवास करने वाले लोग राशन सामग्री ले जाने के लिए बकायदा घोडा पाले हुए हैं और महिना में एक दिन पुरा गांव के ग्रामीण एक साथ राशन सामग्री लेने घोडा के साथ कुल्हाडीघाट पहुंचते हैं। घोडा में राशन सामग्री को लाद कर वापस अपने ग्राम जाते है राशन सामग्री लाने ले जाने में ही पूरा एक दिन का समय लग जाता है। सबसे तकलीफ तब होती है जब इन ग्रामों में अचानक किसी की तबियत बिगड जाए या कोई घटना दुर्घटना हो जाए तो कांवर और खाट लाद कर मरीज को मिलों पैदल पहाडी रास्तों को तय कर अस्पताल तक पहुचाना पड़ता है, यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। अब तक इन ग्रामों में निवास करने वाले लोगों के लिए टीवी, फी्रज कुलर इलेक्ट्रानिक सुविधाओं की समान किसी सवप्न से कम नहीं है।

21वीं सदी में भी पहाड़ी ग्रामो में सड़क नही बनने के कारण यहां निवास करने वाले ग्रामीणों की जिंदगी भी पहाड़ सी बन गई है। लोगों के लिए सड़क अब सपना बनकर रह गई है। आज भी पहाड़ी के ऊपर बसे अधिकांश ग्रामीणों के लिए टेलीफोन, बस, रेल कोतुहल का विषय है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी सन् 1985 में कुल्हाड़ीघाट ग्राम पंचायत पहुंचे थे उसके बाद से यह गांव देश दुनिया के नक्शे में आ गया और तो और हमेशा बड़े नेताओं और अफसरो के चर्चाओं में नजदीक रहने वाला यह गांव के आश्रित ग्रामो सुविधाओं से कोसो दूर है। आज भी यहां के ग्रामीणों को प्रत्येक माह चांवल, दाल, नमक, मिट्टी तेल के लिए 26 किमी पहाड़ी रास्ते पैदल कुल्हाड़ीघाट आना पड़ता है तब कही जाकर उन्हे राशन नसीब हो पाता है। एक एक कर आजादी के 75 वर्ष बीत गए लेकिन गरियाबंद जिला के आदिवासी विकासखण्ड मैनपुर क्षेत्र के पहाडी ईलाकों के गांवो की बदहाल स्थिति में सुधार नहीं आ पाया।

ग्राम पंचायत कुल्हाड़ीघाट के पूर्व सरपंच बनसिंह सोरी ने बताया कि ताराझर,कुरूवापानी,मटाल,ग्रामो में पहुचने के लिए अब तक सड़क का निर्माण नही किया गया है यहां सभी मूलभूत समस्या से लोग जुझ रहे है कई बार प्रस्ताव बनाकर शासन स्तर पर भेजा जा चूका है सरंपच ने बातया 25 -30 कि.मी. पैदल आने जाने के बाद इन ग्रामो के लोगो को राशन समाग्री सहकारी दुकानो से उपलब्ध होती है। शासकीय राशन दुकान कुल्हाड़ीघाट के सेल्समेन मनधर नागेश ने बताया कुरूवापानी,ताराझर,मटाल भालूडिग्गी, जो पहाड़ी के उपर बसा ग्राम है वहां के ग्रामीण पैदल राशन लेने पहुचते है और उन्हे दो माह का राशन एक साथ दिया जाता है। पहाड़ी के ऊपर लगभग 115 कमार परिवार राशन लेने कुल्हाड़ीघाट आते है।

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