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Ambikapur : गुरु नानक जयंती व संविधान-दिवस पर तुलसी साहित्य समिति की सरस काव्यगोष्ठी……………….

'सद्गुरु नानक देव हैं, दिव्य गुणों के धाम, चरणों में गुरुदेव के, बारम्बार प्रणाम’

गुरु नानक जयंती व संविधान-दिवस पर तुलसी साहित्य समिति की सरस काव्यगोष्ठी……………….

पी0एस0यादव/ब्यूरो चीफ/सरगुजा// गुरु नानक जयंती और संविधान-दिवस पर तुलसी साहित्य समिति की ओर से शायर-ए-शहर यादव विकास की अध्यक्षता में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गीता मर्मज्ञ पं. रामनारायण शर्मा, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रह्माशंकर सिंह व डॉ. उमेश पाण्डेय थे। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के सामूहिक पूजन व कवयित्री आशा पाण्डेय के द्वारा प्रस्तुत सुंदर भक्ति वंदना से हुआ। पं. रामनारायण शर्मा ने कहा कि श्री गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक थे। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को मानवता, भाईचारा, एकता, अखंडता और समानता का संदेश दिया।

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उन्होंने समाज में फैली गलत धारणाओं, रूढ़ियों, अंधविश्वासों, पाखंड, अत्याचारों, छुआछूत व ऊंच-नीच की भावना का खुलकर विरोध किया, स्त्री-पुरुष की समानता पर बल दिया। समाज को सच्चे आचरण, परिश्रम, नेक कमाई और मिल-बांट कर खाने की सलाह दी। उन्होंने तत्कालीन मुगल शासकों की कट्टरताओं का विरोध करते हुए पीड़ित जनता का उद्धार किया। उनके उपदेश सार्वकालिक, सार्वभौमिक व सम्पूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी हैं। विद्वान ब्रह्माशंकर सिंह ने संविधान-दिवस पर कहा कि भारत का संविधान एक महान दस्तावेज है। इसी के अनुसार हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, देश की संसद, राज्यों के विधान मण्डल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री सहित तमाम संस्थाएं काम करती हैं। इससे हमें वह सब अधिकार मिलते हैं, जिनसे हम आधुनिक एवं स्वाधीनता मूलक ज़िंदगी जीने का सपना देखते हैं। कवि अजय श्रीवास्तव, कवयित्री आशा व उमेश पाण्डेय ने भारतीय संविधान को लोकतंत्र की आत्मा, विश्व की सर्वोत्तम न्याय प्रणाली व लोगों का महान् संरक्षक बताया। लोकगायिका पूर्णिमा पटेल ने भी भारतीय संविधान की प्रशंसा की और उसी के अनुसार सबको जीवन जीने का आव्हान किया।

काव्यगोष्ठी में संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष कवयित्री माधुरी जायसवाल ने भारतीय संविधान की महिमा पर शानदार रचना प्रस्तुत की- यही हमारी शान है, एकता जिसकी पहचान है। हमें रखना इसका मान है, जिसमें न तो कोई भेदभाव और न ही कोई जातिवाद है- ऐसा ही हमारा संविधान है। कवयित्री व अभिनेत्री अर्चना पाठक ने खेद व्यक्त किया कि सशक्त संविधान के बावजूद भारतीय नारियों को आजपर्यन्त वह सम्मान नहीं मिल पाया है, जिनकी असल में वह हक़दार है- आज तक नारी को सशक्त संविधान नहीं मिला। आज तक नारी को मूल आत्मसम्मान नहीं मिला। कवयित्री मंशा शुक्ला ने संविधान की रक्षा व उसके संपालन पर ज़ोर दिया- आत्मा है यह देश की, है यह मूल सम्मान। मन, कर्म और वचन से, इसका रखिए ध्यान। कविवर श्यामबिहारी पाण्डेय ने अपने काव्य में संविधान की नई परिभाषा गढ़ी- चलता धर्म जिससे उसको विधि-विधान कहते हैं। हरे दुख-दर्द को मेरे उसे निदान कहते हैं। झुकाते शीश हैं जिस पर, तिरंगे की क़सम उसको। अरे हम देशवासी उसको संविधान कहते हैं। युवाकवि निर्मल गुप्ता ने संविधान पर गर्व करने की बात कही- भारत का संविधान, भारतवासी का है अभिमान। हमें जाति-धर्म से ऊपर उठकर भी सोचना होगा, संविधान की भाषा को हमें समझना होगा।

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कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि उमाकांत पाण्डेय ने अपने गीत द्वारा दुखी-निराश हृदयों में आशा और उत्साह का संचार किया- ग़म न कर फिर मिलेंगे सहारे बहुत, है अभी ज़िंदगी के इशारे बहुत। खौफ़ क्यूं है भंवर का, अरी कश्तियों! इस नदी में अभी हंै किनारे बहुत! वीर रस के सशक्त हस्ताक्षर अम्बरीष कश्यप ने जयचंदों से सावधान रहने की सलाह दी- हमको क्या हरा पाता, युद्धों से या छल-छंदों से। हम तो हारे अपने ही घर मानसिंह, जयचंदों से! वरिष्ठ कवि राजेश पाण्डेय की ग़ज़ल- कम या ज़्यादा हम होते हैं, कुछ-कुछ सबको ग़म होते हैं, डॉ. उमेश पाण्डेय की कविता- ज़िंदगी की राहों में मिलते दोस्त हज़ारों हैं, सादगी से जी के देखो, चाहनेवाले हज़ारों हैं, कवयित्री गीता द्विवेदी का गीत- तुम्हारे बिन कन्हैया कौन है अपना बताओ ना, नहीं रहना तेरे बिन, पास तुम अपने बुलाओ ना, कवि चंद्रभूषण ‘मृगांक’ की- मुझे कुछ नहीं चाहिए साहस का एक संयम ही दे दो, मधुर गीतकार पूनम दुबे ‘वीणा’ का गीत- प्रतिदिन गुरुवर हमें ज्ञान देते हैं, मुश्किलें जो भी हों, उन्हें जान लेते हैं, कविवर रंजीत सारथी की सरगुजिहा गीत रचना- कहत रथें सबकर सुंदर मोर गुइयां है और कवि पवन पाण्डेय का भोजपुरी गीत- तहरो जुदाई हमसे माई अब ना सहाई रे, दुनों आंख आंसू आई जियलो ना जाई रे- की प्रशंसा श्रोताओं ने जा़ेरदार तालियां  बजाकर कीं।

कवयित्री आशा पाण्डेय ने प्रकाश पर्व पर उम्दां दोहे सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया- सभी मनाते प्रेम से, यह गुरु पर्व प्रकाश। द्वेष-दंभ मिटते सभी, होता दुख का नाश। रखते गुरुद्वारे जहां, लंगर सारे लोग। गुरु प्रसाद का प्रेम से, करते मानव भोग। संस्था के अध्यक्ष कवि मुकुंदलाल साहू ने गुरुनानक देव की महिमा में अनेक दोहे सुनाए- सदगुरु नानक देव हैं, दिव्य गुणों के धाम। चरणों में गुरुदेव के, बारम्बार प्रणाम। गुरुबानी की जब हुई , आज वहां बरसात। भीग गए अंतस सभी, भीग गए सब गात। अंत में, महान शायर यादव विकास की इस अनमोल ग़ज़ल से काव्यगोष्ठी का यादगार समापन हुआ-नयन हुए बेचैन पिया बिन, मचले तन-मन आधी रात। दीप जलाए साहिल पर है, एक मछेरन आधी रात। घटाएं बहकीं, हवाएं बहकीं, फ़ज़ाएं बहकीं देख विकास। कौन गुलिस्तां में आया है, महका चंदन आधी रात! कार्यक्रम का काव्यमय संचालन संस्था की उपाध्यक्ष आशा पाण्डेय व आभार कवयित्री माधुरी जायसवाल ने जताया। इस अवसर पर लीला यादव, केके त्रिपाठी, शुभम पाण्डेय सहित कई काव्यप्रेमी उपस्थित थे।

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