शोधकर्ता डॉ. उमेश पाण्डेय को राष्ट्रीय पेटेंट: डिजिटल अपराध नियंत्रण हेतु अभिनव पोर्टल को मिला कानूनी संरक्षण

शोधकर्ता डॉ. उमेश पाण्डेय को राष्ट्रीय पेटेंट: डिजिटल अपराध नियंत्रण हेतु अभिनव पोर्टल को मिला कानूनी संरक्षण

अंबिकापुर | संवाददाता|राजधानी रायपुर से प्रकाशित और अब राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत तकनीकी शोध ने प्रदेश को गौरवान्वित कर दिया है। राजीव गांधी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज अंबिकापुर में कार्यरत और वर्तमान में संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, अंबिकापुर में अतिथि व्याख्याता के रूप में सेवा दे रहे डॉ. उमेश पाण्डेय द्वारा तैयार किए गए एक महत्वपूर्ण शोध पत्र को भारत सरकार के शासकीय पेटेंट कार्यालय द्वारा पेटेंट एक्ट 202521009297 के अंतर्गत विधिवत रूप से पंजीकृत किया गया है।

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इस पेटेंट को प्राप्त करने के साथ ही यह शोध अब देश के साइबर सिक्योरिटी, डिजिटल गवर्नेंस और अपराध नियंत्रण प्रणाली में संभावित क्रांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इस अभिनव शोध में एक समानिकृत डिजिटल पोर्टल विकसित करने का प्रस्ताव है, जो एक व्यक्ति की न्यूनतम जानकारी (जैसे कि फोटो, मोबाइल नंबर या पारिवारिक विवरण) के आधार पर उसके संदर्भ में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने में सक्षम होगा।


शोध का सार: टेक्नोलॉजी से अपराध पर लगाम

डॉ. पाण्डेय के इस शोध में एक कंबाइंड एल्गोरिथ्म विकसित किया गया है, जिसकी मदद से यदि किसी व्यक्ति के बारे में केवल एक ही सूचना (तीन में से कोई – फोटो, परिवार का नाम या फोन नंबर) भी उपलब्ध हो, तो वह एल्गोरिथ्म उस व्यक्ति की समग्र पहचान और गतिविधियों की जानकारी डिजिटल पोर्टल पर खोज सकता है। यह तकनीक विशेष रूप से संदिग्धों की पहचान, मिसिंग पर्सन्स ट्रेसिंग, तथा साइबर अपराध की रोकथाम में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है।

डॉ. पाण्डेय बताते हैं, “हमारा लक्ष्य एक ऐसा पोर्टल बनाना है, जिसमें प्रत्येक नागरिक का आधार-आधारित एक यूनिक आईडी होगा। जब भी किसी संदिग्ध व्यक्ति से जुड़ी कोई सूचना ऑनलाइन दर्ज की जाती है, तो वह स्वतः सिस्टम द्वारा विभिन्न स्त्रोतों से जानकारी एकत्र कर देगा और संबंधित एजेंसी को सूचित करेगा।”


शोध को मिली विशेषज्ञों की सराहना

इस शोधपत्र को पेटेंट कराने में डॉ. स्नेहलता बर्डे का महत्वपूर्ण तकनीकी योगदान रहा, जबकि डॉ. एस.के. श्रीवास्तव के मार्गदर्शन और आशीर्वाद ने इस कार्य को बौद्धिक दिशा प्रदान की। इसके अतिरिक्त, सह-शोधकर्ता डॉ. मनीषा देवांगन ने भी इस कार्य में सहयोग प्रदान किया और उनका नाम भी पेटेंट में शामिल है।

डॉ. पाण्डेय इस उपलब्धि का श्रेय अपने गुरुओं, परिवार विशेषतः माता-पिता और पत्नी श्रीमती आशा पाण्डेय को देते हैं, जिन्होंने उन्हें हर कदम पर संबल प्रदान किया।

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राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान

डॉ. उमेश पाण्डेय द्वारा विकसित यह तकनीक केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं रही, बल्कि इसे देशभर के मंचों पर भी पहचान मिली है। मैट्स विश्वविद्यालय रायपुर से प्राप्त पीएच.डी. की उपाधि के साथ उन्होंने विभिन्न नेशनल और इंटरनेशनल सेमिनार्स में भाग लिया।

विशेष रूप से संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, अंबिकापुर में आयोजित एक संगोष्ठी में इस शोध के प्रस्तुतीकरण पर उन्हें “बेस्ट रिसर्च पेपर अवार्ड” से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, कई प्रतिष्ठित संस्थानों ने उनके शोध को सम्मानित और सराहा है।


शोध का भविष्य और सामाजिक उपयोगिता

डॉ. पाण्डेय का यह शोध आने वाले समय में डिजिटल गवर्नेंस, स्मार्ट सिटी मिशन, पुलिसिंग सिस्टम, और नागरिक डेटा ट्रैकिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि इस तकनीक को व्यावहारिक रूप से विकसित किया जाता है, तो यह अपराध नियंत्रण, लापता व्यक्तियों की तलाश, तथा फर्जी दस्तावेजों की पहचान जैसे मामलों में बड़ी सफलता दिला सकता है।

डॉ. पाण्डेय ने इस बात पर जोर दिया कि हर शोध की तरह इस शोध की भी सीमाएं हैं, लेकिन उचित दिशा-निर्देशों और नीतियों के तहत यदि इसका कार्यान्वयन किया जाए, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक सुविधा दोनों ही क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।


विश्वविद्यालय और समाज को गौरव

यह सफलता संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय और राजीव गांधी पीजी कॉलेज, अंबिकापुर दोनों के लिए अत्यंत गौरव की बात है। विभागाध्यक्ष श्री एच.एस. टोन्डे का विशेष योगदान इस कार्य को दिशा देने में रहा है।

डॉ. पाण्डेय पिछले दस वर्षों से शिक्षण और शोध के क्षेत्र में सक्रिय हैं और अब इस पेटेंट के माध्यम से उन्होंने न केवल एक नवाचार प्रस्तुत किया है, बल्कि युवा शोधकर्ताओं के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बने हैं।


सफलता की मिसाल बने डॉ. पाण्डेय

डॉ. उमेश पाण्डेय की यह उपलब्धि यह दर्शाती है कि यदि शोध समर्पण, तकनीकी ज्ञान और सामाजिक उपयोगिता के भाव से किया जाए, तो वह न केवल शोधकर्ता के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए उत्कृष्ट परिणाम ला सकता है।

उनकी यह उपलब्धि यह संकेत देती है कि छत्तीसगढ़ जैसे अपेक्षाकृत शांत क्षेत्रों से भी वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाली तकनीकें और विचार सामने आ सकते हैं।

राज्य और देश को ऐसे होनहार शोधकर्ताओं पर गर्व है।