‘माटी’ फिल्म से चमका असली बस्तर: प्रेम, संघर्ष और उम्मीद की अनकही कहानी

छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘माटी’ रिलीज: बस्तर ने खुद अपनी कहानी कही, 1000 से अधिक स्थानीय कलाकार बने फिल्म की आत्मा

जगदलपुर। बस्तर की मिट्टी से जन्मी कहानियाँ अक्सर रिपोर्टों, दंतकथाओं और भय की छाया में दब जाती थीं, लेकिन इस बार बस्तर ने खुद अपनी कहानी दुनिया के सामने रखने का फैसला किया है। छत्तीसगढ़ी फीचर फिल्म ‘माटी’ शुक्रवार को प्रदेशभर में रिलीज होते ही चर्चा का केंद्र बन गई है। यह फिल्म बस्तर को संघर्ष और हिंसा की एकतरफा छवि से निकालकर उसके असली चरित्र—लोगों, संस्कृति, संवेदनाओं और उम्मीदों के साथ प्रस्तुत करती है।

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लोगों ने खुद जी अपनी भूमिका — 1000 से अधिक स्थानीय कलाकारों की भागीदारी

निर्माता-कथाकार सम्पत झा के अनुसार ‘माटी’ कोई फिल्म नहीं, बल्कि बस्तर की सामूहिक आवाज़ है।
नक्सलवाद के भय के चलते शुरुआत में लोग हिचके जरूर, लेकिन बाद में 1000 से अधिक ग्रामीणों ने अपने वास्तविक अनुभवों के साथ स्क्रीन पर उतरकर इसे जीवंत बना दिया।
यह लोग अभिनय नहीं कर रहे थे, वे अपने जीवन को जी रहे थे, और यही ‘माटी’ की सबसे बड़ी ताकत है।


प्रेम, भरोसा और उम्मीद—नक्सलवाद की छाया में जन्मी संवेदनाओं की कहानी

फिल्म की पृष्ठभूमि हिंसा, डर और संघर्ष से प्रभावित है, लेकिन कहानी इन पर आधारित नहीं।
‘माटी’ बस्तर की उस जिद्द, प्रेम, भरोसे और इंसानियत की कहानी है, जिसे लोग निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं
निर्देशक अविनाश प्रसाद ने वर्षों की जमीनी समझ के आधार पर दृश्य इतने वास्तविक बनाए कि कई फ्रेम डॉक्यूमेंट्री जैसे प्रतीत होते हैं, मगर भावनाओं की गहराई पूरी तरह सिनेमाई है।

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असली बस्तर बड़े पर्दे पर — नहीं कोई सेट, नहीं स्क्रीन-ग्रीन

फिल्म की शूटिंग बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, घने जंगलों, घाटियों, नदियों, ऊँचे पहाड़ों और दूरस्थ गाँवों में की गई है।
जो प्राकृतिक सौंदर्य अक्सर लोगों की पहुँच से दूर रहता है, वह इस फिल्म में बस्तर के गौरव की तरह चमकता दिखाई देता है।


स्थानीय कलाकारों की मजबूत उपस्थिति

मुख्य भूमिकाओं में —
महेन्द्र ठाकुर (भीमा), भूमिका साहा (उर्मिला), भूमिका निषाद, राजेश मोहंती, आशुतोष तिवारी, दीपक नाथन, संतोष दानी, निर्मल सिंह राजपूत, जितेन्द्र ठाकुर, नीलिमा, लावण्या मानिकपुरी, पूर्णिमा सरोज, श्रीधर राव, बादशाह खान, शिव शंकर पिल्ले — ने मिलकर बस्तर की आत्मा को पर्दे पर उतार दिया।


‘माटी’ बन गई बस्तर की दस्तावेज़ी पहचान

फिल्म देखने वाले पत्रकारों ने कहा कि ‘माटी’ बस्तर को देखने का नजरिया बदल देती है।
यह साबित करती है कि किसी क्षेत्र की कहानी वही लोग सबसे बेहतर कह सकते हैं, जो उसकी धूल, दर्द और उम्मीद को रोज़ जीते हैं।

प्रदेशभर में रिलीज हुई ‘माटी’ का पहला शो जगदलपुर में पत्रकारों के लिए रखा गया।
पत्रकारों के अनुसार—

“हम बस्तर को रोज़ कवर तो करते हैं, लेकिन पहली बार उसे इतने जीवंत रूप में महसूस किया।”

‘माटी’ मनोरंजन से आगे बढ़कर एक दस्तावेज़ी सिनेमाई अनुभव बन गई है—
घने जंगलों की सांसें, घाटियों की खामोशी, गाँवों की सरलता, और नक्सलवाद की छाया के बीच भी जीवन की जिद्द।