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सुखना झील पर संकट: 68 साल में 56% क्षेत्र खत्म, लोकसभा में मनीष तिवारी ने उठाया बड़ा मुद्दा

लोकसभा में सुखना झील का मुद्दा गूंजा: 68 साल में 56% क्षेत्र घटा, 20 साल में खत्म होने की आशंका

लोकसभा में सुखना झील का मुद्दा गूंजा: 68 साल में 56% क्षेत्र घटा, 20 साल में खत्म होने की आशंका

नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

लोकसभा में पर्यावरण और जल संसाधनों से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा उस समय चर्चा में आ गया जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने चंडीगढ़ की प्रसिद्ध सुखना झील की बिगड़ती स्थिति को लेकर चिंता जताई। उन्होंने सदन में कहा कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक झील पूरी तरह समाप्त हो सकती है।

मनीष तिवारी ने अपने वक्तव्य में बताया कि वर्ष 1958 में सुखना चो पर बांध बनाकर इस झील की स्थापना की गई थी। यह झील न केवल चंडीगढ़ की पहचान है, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

68 वर्षों में झील का बड़ा हिस्सा खत्म

लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले 68 वर्षों में सुखना झील का लगभग 56 प्रतिशत क्षेत्रफल समाप्त हो चुका है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है बल्कि यह दर्शाता है कि झील लगातार सिकुड़ती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि झील में लगातार गाद जमा होने, जल स्रोतों के बाधित होने और उचित रखरखाव की कमी के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है।

फीडर चैनल भी हो चुके हैं चोक

मनीष तिवारी ने यह भी बताया कि सुखना झील के सभी फीडर चैनल, जिनसे झील में पानी आता है, अब लगभग चोक हो चुके हैं। इसके चलते झील में पानी का प्रवाह कम हो गया है, जिससे जल स्तर लगातार गिर रहा है।

फीडर चैनलों का बंद होना झील के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है।

20 साल में खत्म होने की आशंका

सांसद ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो अगले 20 वर्षों में सुखना झील पूरी तरह समाप्त हो सकती है। यह न केवल पर्यावरणीय संकट होगा, बल्कि चंडीगढ़ शहर के लिए भी एक बड़ा झटका होगा।

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झील के खत्म होने से स्थानीय जलवायु, जैव विविधता और पर्यटन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

सरकार से की अपील

मनीष तिवारी ने लोकसभा में मंत्री और केंद्र सरकार से इस विषय को गंभीरता से लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह केवल एक झील का मामला नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधनों के प्रबंधन का प्रश्न है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि झील के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं।

सुखना झील का महत्व

सुखना झील चंडीगढ़ की प्रमुख पहचान है और यहां हर साल हजारों पर्यटक आते हैं। यह झील शहर के पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसके अलावा, यह झील पक्षियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण आवास स्थल है, जहां कई प्रवासी पक्षी भी आते हैं।

पर्यावरणीय प्रभाव

झील के सिकुड़ने से क्षेत्र में तापमान बढ़ सकता है और हरियाली पर भी असर पड़ सकता है। जल स्तर गिरने से आसपास के क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

इसके अलावा, जैव विविधता पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों की राय

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि झील के संरक्षण के लिए फीडर चैनलों को साफ करना, गाद हटाना और जल प्रबंधन प्रणाली को सुधारना आवश्यक है।

इसके अलावा, आसपास के क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण और हरित क्षेत्र को बढ़ाने की भी जरूरत है।

सरकार की जिम्मेदारी

यह मामला केंद्र और स्थानीय प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी को दर्शाता है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।

सरकार को चाहिए कि वह इस दिशा में ठोस योजना बनाकर उसे लागू करे।

लोकसभा में उठाया गया यह मुद्दा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है। सुखना झील का अस्तित्व बचाना केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है और क्या इस ऐतिहासिक झील को बचाया जा सकेगा।

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