
राज्यसभा में निजी स्कूलों की फीस पर उठी आवाज: कांग्रेस ने कहा- शिक्षा का व्यवसायीकरण रोके सरकार
"राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रजनी पाटिल ने निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और शिक्षा के व्यवसायीकरण पर सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की।"
राज्यसभा में निजी स्कूलों की फीस पर उठी आवाज: कांग्रेस ने कहा- शिक्षा का व्यवसायीकरण रोके सरकार
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
देशभर में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस को लेकर एक बार फिर संसद में बहस तेज हो गई है। राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रजनी पाटिल ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि निजी स्कूलों की अनियंत्रित और लगातार बढ़ती फीस संरचना ने लाखों मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई विलासिता (Luxury) नहीं, बल्कि हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। बावजूद इसके, आज अच्छी शिक्षा प्राप्त करना आम परिवारों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनता जा रहा है।
हर साल बढ़ती फीस, अभिभावक परेशान
रजनी पाटिल ने राज्यसभा में कहा कि देशभर में निजी स्कूल हर साल मनमाने तरीके से फीस बढ़ा देते हैं। इस प्रक्रिया में न तो कोई पारदर्शिता होती है और न ही इसका कोई स्पष्ट औचित्य बताया जाता है।
अभिभावकों को केवल ट्यूशन फीस ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्रकार के शुल्क भी देने पड़ते हैं:
- डेवलपमेंट फीस
- एक्टिविटी फीस
- स्मार्ट क्लास फीस
- अनिवार्य किताबें और यूनिफॉर्म
अक्सर स्कूल अभिभावकों को विशेष दुकानों से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, जहां कीमतें बाजार से काफी अधिक होती हैं।
शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण
कांग्रेस सांसद ने कहा कि यह स्थिति शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को दर्शाती है, जो भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। शिक्षा का उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना होना चाहिए, न कि इसे मुनाफे का साधन बनाया जाए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति जारी रही, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल अमीर वर्ग तक सीमित होकर रह जाएगी।
RTE एक्ट की याद दिलाई
रजनी पाटिल ने अपने भाषण में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सरकार के दौरान लागू किए गए शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित की गई थीं।
इस प्रावधान का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान करना था, लेकिन वर्तमान में इसकी भावना कमजोर होती नजर आ रही है।
75% अभिभावकों पर बढ़ता बोझ
उन्होंने कहा कि जहां एक ओर 25% सीटों पर मुफ्त शिक्षा दी जाती है, वहीं बाकी 75% अभिभावकों पर फीस का पूरा बोझ डाल दिया जाता है। इससे मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है।
इस स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा कर दिया है।
फीस रेगुलेशन कानूनों की स्थिति
कांग्रेस सांसद ने यह भी कहा कि कुछ राज्यों ने फीस नियंत्रण के लिए कानून बनाए हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कमजोर और असंगत है।
कई मामलों में स्कूल इन नियमों का पालन नहीं करते और अभिभावकों को मजबूरी में बढ़ी हुई फीस चुकानी पड़ती है।
सरकार से की गई प्रमुख मांगें
रजनी पाटिल ने सरकार से कई महत्वपूर्ण मांगें रखीं:
- निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर सख्त नियंत्रण
- स्कूलों की वित्तीय व्यवस्था में पूर्ण पारदर्शिता
- छिपे हुए और अनिवार्य शुल्कों पर रोक
- अभिभावकों और छात्रों के अधिकारों की सुरक्षा
अभिभावकों की बढ़ती चिंता
देशभर में अभिभावक लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चों की शिक्षा के लिए उन्हें अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे अन्य जरूरी जरूरतों पर असर पड़ रहा है।
कई परिवारों को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए कर्ज तक लेना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों की राय
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की नीति बनाना जरूरी है। इससे सभी राज्यों में एक समान व्यवस्था लागू की जा सकेगी।
इसके अलावा, अभिभावकों की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी तंत्र भी विकसित किया जाना चाहिए।
राज्यसभा में उठाया गया यह मुद्दा देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को दर्शाता है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगा।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है और क्या अभिभावकों को इस आर्थिक दबाव से राहत मिल पाती है।












