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खेती पर युद्ध की मार: यूरिया की वैश्विक कीमतों में भारी उछाल ($684/टन), क्या बढ़ेगी खाद की किल्लत?

पश्चिम एशिया संकट से वैश्विक यूरिया बाजार में हड़कंप। कीमतें $684 प्रति टन तक पहुँचीं। बुवाई सीजन से पहले किसानों की बढ़ी चिंता। जानिए सरकार का क्या है प्लान।






Urea Price Crisis Report | Pradesh Khabar

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युद्ध की आग में झुलसी खेती: वैश्विक स्तर पर $684 पहुँचा यूरिया का भाव, बुवाई सीजन से पहले अन्नदाताओं की बढ़ी टेंशन

कृषि ब्यूरो: आशीष सिन्हा | प्रदेश खबर न्यूज़ नेटवर्क
28 मार्च, 2026 | सरगुजा / रायपुर

नई दिल्ली/रायपुर: पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों का सीधा असर अब भारतीय किसानों की रसोई और खेतों तक पहुँचता दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में **यूरिया की कीमतों में जबरदस्त उछाल** आया है। सप्लाई चेन बाधित होने के कारण यूरिया का भाव **$684 प्रति टन** के पार पहुँच गया है, जिससे आगामी बुवाई सीजन को लेकर देशभर के किसानों और सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं।

वैश्विक यूरिया कीमत (International Urea Rate):

$684 Per Ton

पिछले 6 महीनों का यह सबसे उच्चतम स्तर है!

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क्यों बढ़ रहे हैं दाम?

भारत अपनी यूरिया और फर्टिलाइजर जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात (Import) करता है। पश्चिम एशिया के देशों से होने वाली सप्लाई युद्ध की वजह से रुक-रुक कर आ रही है। साथ ही, कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस (Natural Gas) की बढ़ती कीमतों ने फर्टिलाइजर उत्पादन की लागत को भी बढ़ा दिया है।

छत्तीसगढ़ के किसानों पर असर

**Pradesh Khabar News Network** के विशेष विश्लेषण के अनुसार, छत्तीसगढ़ के सरगुजा, बस्तर और मैदानी इलाकों में खरीफ की तैयारी कर रहे किसानों को डर है कि कहीं ऐन वक्त पर खाद की किल्लत न हो जाए। हालांकि, केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि वह सब्सिडी बढ़ाकर किसानों पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ने देगी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते दाम सरकारी खजाने पर भारी पड़ेंगे।

मुख्य चुनौतियां:

  • सब्सिडी का बोझ: सरकार को यूरिया पर सब्सिडी का बजट बढ़ाना पड़ सकता है।
  • स्टॉक की कमी: आयात में देरी से स्थानीय सहकारी समितियों में खाद की कमी हो सकती है।
  • लागत में वृद्धि: अगर दाम बढ़े, तो खेती की कुल लागत बढ़ना तय है।

सरकार की रणनीति

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार वैकल्पिक देशों जैसे रूस और अफ्रीकी देशों से खाद आयात के लिए बातचीत तेज कर रही है। साथ ही, नैनो यूरिया (Nano Urea) के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है ताकि पारंपरिक यूरिया पर निर्भरता कम की जा सके।


Ashish Sinha

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