सांस्कृतिक कूटनीति और आध्यात्मिक गौरव का स्वर्णिम अध्याय: भगवान बुद्ध के शिष्यों के पावन अवशेष मंगोलिया यात्रा पर रवाना
भोपाल: मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरा के इतिहास में एक और स्वर्णिम पन्ना उस समय जुड़ गया, जब भोपाल के राजाभोज विमानतल परिसर में पूर्ण धार्मिक विधि-विधान, मंत्रोच्चार और अत्यंत गरिमामयी वातावरण के बीच भगवान बुद्ध के परम शिष्यों—श्री सारिपुत्र एवं श्री महामौद्गल्यायन—के पवित्र अस्थि अवशेषों को ‘मंगोलिया विहार’ (मंगोलिया यात्रा) के लिए ससम्मान विदाई दी गई। इस विदाई समारोह में देश-विदेश के प्रख्यात बौद्ध भिक्षु, राजनयिक और वरिष्ठ राजनेता साक्षी बने। इस अवसर पर आयोजित भव्य राजकीय एवं धार्मिक समारोह में मध्य प्रदेश शासन के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
मुख्य बिंदु आध्यात्मिक कूटनीति और वैश्विक शांति का साझा संदेश
यह पवित्र विदाई केवल एक धार्मिक यात्रा मात्र नहीं है, बल्कि भारत और मध्य प्रदेश की वैचारिक तथा आध्यात्मिक कूटनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सोपान है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची के स्तूपों में सदियों से पूर्ण गरिमा और सुरक्षा के साथ संरक्षित ये चैतन्य अवशेष, मध्य एशिया के देशों में भारत की “सॉफ्ट पावर” (सांस्कृतिक प्रभाव) को सुदृढ़ करने में एक मील का पत्थर साबित होंगे।
यह केवल धरोहर नहीं, वैश्विक शांति और करुणा का जीवित प्रतीक है: मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल
समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि एवं मध्य प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल ने बेहद भावुक और विचारोत्तेजक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि आज का दिन भारत और विशेषकर मध्य प्रदेश के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के समान है। भगवान बुद्ध के महान शिष्यों के ये पवित्र अस्थि अवशेष केवल हमारी आध्यात्मिक और पुरातात्विक धरोहर ही नहीं हैं, बल्कि ये वैश्विक शांति, करुणा, अहिंसा और सर्वधर्म सौहार्द के जीते-जागते प्रतीक हैं।
मंत्री श्री पटेल ने इन अवशेषों की दुर्लभता और भारत की महानता को रेखांकित करते हुए कहा:
प्रधानमंत्री की दूरदर्शी सांस्कृतिक नीतियों की सराहना
अपने संबोधन में श्री पटेल ने देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शी सांस्कृतिक नीतियों की मुक्तकंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार भारत की खोई हुई आध्यात्मिक विरासत और प्राचीन गौरव को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने के लिए निरंतर और योजनाबद्ध तरीके से कार्य कर रही है। भारत की वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को चरितार्थ करते हुए इन पावन अवशेषों को विदेशों में प्रदर्शन और दर्शन के लिए भेजना इसी नीति का एक अटूट हिस्सा है।
सांची में श्रीलंका के श्रद्धालुओं के लिए सिंहली भाषा में साइन बोर्ड का संस्मरण
अपने पूर्व केंद्रीय संस्कृति मंत्री कार्यकाल के अनुभवों को साझा करते हुए श्री प्रहलाद सिंह पटेल ने बताया कि उनकी नीति हमेशा से ‘विरासत को सुगम बनाने’ की रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि जब वे संस्कृति मंत्री थे, तब उन्होंने सांची आने वाले अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और विशेषकर बौद्ध श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए एक नई नीति बनाई थी। इसके अंतर्गत स्थानीय और संबंधित देशों की भाषाओं में साइन बोर्ड (संकेतक) स्थापित किए गए थे।
इसी नीति के तहत, श्रीलंका से हर साल सांची आने वाले हजारों बौद्ध श्रद्धालुओं की सुविधा और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए सांची परिसर और उसके आसपास **सिंहली भाषा** में भी संकेतक लगाए गए। श्री पटेल ने कहा कि जब कोई विदेशी नागरिक भारत की भूमि पर अपनी मातृभाषा में कोई बोर्ड या निर्देश देखता है, तो उसे एक गहरा आत्मीयता और सम्मान का अनुभव होता है। यही आत्मीयता भारत को विश्वगुरु बनाती है।
सांची की वैश्विक महत्ता का मूल कारण
श्री प्रहलाद सिंह पटेल ने स्पष्ट किया कि सांची केवल अपनी वास्तुकला, भव्य पत्थरों और विशाल स्तूपों के कारण ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक आध्यात्मिक आकर्षण इन चैतन्य अस्थि अवशेषों की पावन उपस्थिति है। यह स्थल विश्वभर के बौद्ध अनुयायियों की अटूट श्रद्धा का केंद्र इन अवशेषों के कारण ही बना हुआ है। पूर्व में इन अवशेषों की सफल थाईलैंड यात्रा का संदर्भ देते हुए उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मंगोलिया के साथ भारत के आध्यात्मिक संबंध सदियों पुराने हैं और इस यात्रा से दोनों देशों के रिश्ते नई ऊंचाइयों को छुएंगे।
विकास के साथ विरासत का संरक्षण हमारा अटूट संकल्प: कलेक्टर प्रियंक मिश्रा
समारोह में विशिष्ट भूमिका निभा रहे भोपाल के जिला कलेक्टर श्री प्रियंक मिश्रा ने प्रशासनिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर इस आयोजन के महत्व को साझा किया। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध की यह विरासत पूरी मानव जाति और विश्व बंधुत्व की अमूल्य धरोहर है।
कलेक्टर श्री मिश्रा ने देश के प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए मूल मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा:
व्यक्तिगत जुड़ाव और सौभाग्य की अनुभूति
भावुक होते हुए कलेक्टर श्री प्रियंक मिश्रा ने अपने व्यक्तिगत जीवन का एक सुंदर संस्मरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ है, जो कि भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल कुशीनगर, कपिलवस्तु और लुम्बिनी जैसे अनेक पावन बौद्ध तीर्थ स्थलों के अत्यंत निकट स्थित है। ऐसे में, उत्तर प्रदेश की उस बुद्ध भूमि से आकर आज मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इस ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और वैश्विक महत्व के अवसर का प्रत्यक्ष गवाह और सारथी बनना, उनके शासकीय और व्यक्तिगत जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
उन्होंने पूर्ण विश्वास व्यक्त किया कि इस गरिमामयी आयोजन और पवित्र मंगोलिया यात्रा के माध्यम से मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान मंगोलिया सहित पूरे मध्य एशिया के देशों में और अधिक सुदृढ़ तथा व्यापक होगी।
सांची आध्यात्मिक वैभव का अनुपम और अक्षय खजाना: पूज्य बानगल उपतिस्स नायक थेरी
इस पवित्र विदाई समारोह की धार्मिक गुरुता को स्थापित करते हुए श्रीलंका महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष और प्रख्यात बौद्ध धर्मगुरु पूज्य बानगल उपतिस्स नायक थेरी ने सांची और इन अवशेषों की धार्मिक महिमा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सांची को केवल एक ऐतिहासिक या पर्यटन स्थल के चश्मे से देखना भूल होगी, वह वास्तव में आध्यात्मिक वैभव का एक अनुपम और अक्षय खजाना है।
थाईलैंड यात्रा का ऐतिहासिक संदर्भ
पूज्य थेरी ने इन अवशेषों के प्रति वैश्विक दीवानगी और श्रद्धा का एक ऐतिहासिक आंकड़ा प्रस्तुत करते हुए बताया कि पूर्व में जब ये पवित्र अस्थि अवशेष थाईलैंड की यात्रा पर ले जाए गए थे, तब वहां का दृश्य अद्भुत था। थाईलैंड में लगभग **55 लाख (5.5 मिलियन)** श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धाभाव, आंसुओं और अपार भक्ति के साथ इन अवशेषों के दर्शन, वंदन और पूजा-अर्चना की थी। इससे यह सिद्ध होता है कि इन अवशेषों में कितनी चैतन्य ऊर्जा और वैश्विक आकर्षण है।
उन्होंने आगे कहा कि संपूर्ण बौद्ध परंपरा में भगवान बुद्ध के इन दो अग्र-शिष्यों (सारिपुत्र और महामौद्गल्यायन) के पवित्र अवशेषों का स्थान सर्वोच्च और वंदनीय है। उन्होंने भावुक मन से कहा कि सांची जैसी पावन धरा और इन दिव्य अवशेषों का संरक्षक बनने का अवसर मिलना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य और ईश्वरीय आशीर्वाद है।
गरिमामयी विदाई समारोह की संक्षिप्त रूपरेखा और मुख्य उपस्थितियाँ
राजाभोज विमानतल पर आयोजित यह विदाई समारोह पूरी तरह से आध्यात्मिक तरंगों से ओतप्रोत था। हवाई अड्डे के एक विशेष विदाई पंडाल को फूलों और बौद्ध झंडों से सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया था। विदाई के ठीक पहले उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पारंपरिक ‘परित्राण पाठ’ और विशेष बौद्ध मंत्रोच्चार किया गया, जिससे पूरा परिसर अत्यंत शांत और दिव्य महसूस होने लगा।
इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विदाई वेला के अवसर पर अनेक प्रबुद्धजन और प्रशासनिक अमला उपस्थित रहा, जिनमें प्रमुख हैं:
- पूज्य बानगल विमल तिस्स थेरी (छोटे गुरु) – जिन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों का नेतृत्व किया।
- कर्नल श्री यश सक्सेना – संचालक, इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कॉन्फेडरेशन (IBC), जो इस पूरी अंतरराष्ट्रीय यात्रा के नोडल विंग के रूप में समन्वय कर रहे हैं।
- श्री राजेश कुमार गुप्ता – डिप्टी सेक्रेटरी, संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश शासन।
- संस्कृति विभाग, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और विमानतल प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारी।
समारोह के अंतिम चरण में, सभी गणमान्य नागरिकों, मंत्रियों, भिक्षुओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने पूर्ण श्रद्धा, नत मस्तक होकर और आंखों में सम्मान के भाव लिए भगवान बुद्ध के परम शिष्यों के पवित्र अस्थि अवशेषों को मंजूषा (विशेष पेटी) सहित मंगोलिया की उड़ान के लिए भावभीनी विदाई दी।
यात्रा का महत्व: भारत-मंगोलिया संबंधों में नई ऊर्जा
विशेषज्ञों और राजनयिकों के अनुसार, इन अवशेषों की मंगोलिया यात्रा से दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को एक नई गति मिलेगी। मंगोलिया एक ऐसा देश है जहां की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध धर्म को मानती है और सांची के इन अवशेषों के प्रति वहां के नागरिकों में अगाध श्रद्धा है। इस यात्रा के माध्यम से भारत न केवल अपनी सांस्कृतिक धरोहर को साझा कर रहा है, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (पूरा विश्व एक परिवार है) के अपने शाश्वत सिद्धांत को वैश्विक पटल पर और अधिक मजबूती से स्थापित कर रहा है।
यह ऐतिहासिक विदाई समारोह मध्य प्रदेश के सांस्कृतिक इतिहास में एक मील का पत्थर है, जो आने वाले समय में प्रदेश को वैश्विक बौद्ध सर्किट के सबसे बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करेगा।














