जल क्रांति के प्रणेता मुख्यमंत्री मोहन यादव: 22 वर्षों का भागीरथ संकल्प बना रहा मध्यप्रदेश को जल-आत्मनिर्भर
भोपाल / उज्जैन: भारतीय संस्कृति में जल को केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का साक्षात स्वरूप और चेतना का प्रतीक माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में ‘अपः पुरुषरूपेण’ कहकर जल की वंदना की गई है, जिसका सीधा अर्थ है कि जल में ही साक्षात ईश्वर का वास है। इसी पावन और दूरदर्शी सोच को आत्मसात करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जल संरक्षण को एक राष्ट्रीय जन आंदोलन का रूप दिया है। उन्होंने जल को विकास का प्रमुख पैमाना बनाते हुए ‘हर घर जल’ के संकल्प को साकार किया। उनके मार्गदर्शन में जल शक्ति मंत्रालय का गठन, जल जीवन मिशन, नमामि गंगे, अमृत सरोवर मिशन और जल शक्ति अभियान जैसी ऐतिहासिक पहलें हुईं, जिन्होंने देश को जल संरक्षण की एक नई दिशा दी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इसी वैश्विक और दूरदर्शी दृष्टिकोण को धरातल पर उतारते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य में जल क्रांति का सूत्रपात किया है। उन्होंने जल संरक्षण को एक सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ाते हुए संस्कृति, आदत और राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बना दिया है। यही कारण है कि आज उन्हें संपूर्ण प्रदेश में एक जनप्रिय ‘जल नायक’ के रूप में देखा जा रहा है।
उज्जैन विकास प्राधिकरण से मुख्यमंत्री पद तक: 22 वर्षों से अधिक का भागीरथ संकल्प
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की जल संपदा को सहेजने और पर्यावरण संरक्षण की यह यात्रा कोई तात्कालिक प्रयास नहीं है, बल्कि इसके पीछे 22 वर्षों से अधिक का अथक परिश्रम, संवेदनशीलता और दूरगामी सोच है। इस यात्रा की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली थी। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने उज्जैन की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लिया।
महान सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन, उनके नवरत्नों की गौरवशाली परंपरा तथा मालवा की जीवनदायिनी माँ शिप्रा के संरक्षण और जल संवर्धन के प्रति उनकी गहरी आस्था ने एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना को जन्म दिया। उनके द्वारा आरंभ की गयी शिप्रा तीर्थ परिक्रमा धार्मिक आस्था को सशक्त करने के साथ-साथ उज्जैन और शिप्रा नदी से जुड़े सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं पर्यटन महत्व को पुनर्स्थापित कर रही है। इस पहल के माध्यम से शिप्रा के घाटों, तीर्थ स्थलों और प्राचीन परंपराओं को जनभागीदारी से जोड़ते हुए नदी संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है।
एक युवा जननेता के रूप में उन्होंने तत्कालीन समय में ही यह समझ लिया था कि बिना जल स्रोतों के संरक्षण के किसी भी सभ्यता या नगर का विकास दीर्घकालिक नहीं हो सकता। उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री पद तक की अपनी यात्रा में डॉ. मोहन यादव ने हमेशा जल संवर्धन के मुद्दों को शीर्ष प्राथमिकता पर रखा। वर्षों से उनके मन में नदियों और पर्यावरण के प्रति जो संवेदनशीलता रही, वही आज मध्यप्रदेश में ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ जैसे विराट जनआंदोलन के रूप में साकार हो रही है।
आस्था की जीवनदायिनी माँ शिप्रा का पुनरुद्धार और अविरल प्रवाह
मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है और इसी मायके की सबसे पवित्र और पूजनीय नदियों में से एक है माँ शिप्रा। मालवा की गंगा कही जाने वाली और प्राचीन नगरी अवंती को अपने आंचल में समेटने वाली शिप्रा नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र है। इसी पावन तट पर विश्व प्रसिद्ध ‘सिंहस्थ’ महापर्व का आयोजन होता है। परंतु, समय के साथ बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण इंदौर से आने वाली खान नदी और सीवरेज का गंदा पानी इसमें मिलने से इसकी पवित्रता प्रभावित हो रही थी।
जब आस्था की इस जीवनदायिनी पर संकट आया, तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे अपनी व्यक्तिगत और शासकीय प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा। इंदौर जिले के निकट काकरी बर्डी पहाड़ी से निकलने वाली 195 किलोमीटर लंबी इस पवित्र नदी को प्रदूषण मुक्त और अविरल बनाना उनका सबसे बड़ा संकल्प बन गया।
समीक्षा बैठकों से धरातल तक कड़े फैसले
साल 2024 की शुरुआत से ही मुख्यमंत्री ने शिप्रा नदी के जीर्णोद्धार के लिए स्वयं कमान संभाली और एक के बाद एक कई उच्च स्तरीय बैठकें कर कड़े निर्णय लिए:
- 7 जनवरी 2024 (उज्जैन): पहली बैठक में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि सीवरेज का गंदा पानी शिप्रा में मिलना तुरंत रोका जाए। इसके लिए सांवेर, रामवासा, पंथपिपलई और राघौपिपल्या में स्टॉपडैम और वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की व्यापक कार्ययोजना तैयार करवाई गई।
- 13 फरवरी 2024: दूसरी उच्च स्तरीय बैठक में जल संसाधन विभाग को निर्देशित किया गया कि कान्ह नदी के गंदे पानी का ट्रीटमेंट धर्मपुरी से ही शुरू किया जाए और उस साफ किए गए पानी को डायवर्ट कर किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराया जाए।
- 2 जुलाई 2024: तीसरी बैठक में कार्यों की प्रगति की गहन समीक्षा की गई और समयसीमा में कार्य पूर्ण करने की गति बढ़ाई गई।
इस प्रतिबद्धता का परिणाम था कि 1 दिसंबर 2024 को उज्जैन में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की उपस्थिति में मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि आगामी सिंहस्थ-2028 में श्रद्धालु किसी अन्य बाहरी नदी के पानी से नहीं, बल्कि माँ शिप्रा के ही शुद्ध और पावन जल से स्नान करेंगे। इसके लिए उन्होंने स्वयं रामघाट पर हाथों में झाड़ू थामकर स्वच्छता गतिविधियों में हिस्सा लिया और श्रमदान की अलख जगाई। इसी संकल्प के तहत 26 मई 2026 को माँ शिप्रा तीर्थ परिक्रमा में सहभागिता कर नदी को 351 फीट लंबी चुनरी अर्पित की गई।
सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी परियोजना: सिंहस्थ 2028 का दिव्य संकल्प
उज्जैन संभाग और मालवा अंचल के लिए 614.53 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत वाली ‘सेवरखेड़ी–सिलारखेड़ी मध्यम सिंचाई परियोजना’ पर इस समय युद्ध स्तर पर काम चल रहा है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत उज्जैन के ग्राम सेवरखेड़ी में शिप्रा नदी पर एक विशाल बैराज का निर्माण किया जा रहा है। आधुनिक पंपिंग सिस्टम के ज़रिये सिलारखेड़ी जलाशय में पानी इकट्ठा किया जाएगा और आवश्यकतानुसार उसे शिप्रा नदी में छोड़ा जाएगा, जिससे नदी में जल का स्तर हमेशा बना रहेगा।
इस भगीरथ प्रयास का लगभग 50 प्रतिशत कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका है। इससे न केवल उज्जैन शहर की पेयजल व्यवस्था सुदृढ़ होगी, बल्कि सिंहस्थ 2028 के लिए देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को एक अलौकिक अनुभव मिलेगा। इसके साथ ही, उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे 30 किलोमीटर लंबे आधुनिक और सुविधायुक्त घाटों का निर्माण कार्य अत्यंत तीव्र गति से जारी है, ताकि महापर्व के दौरान 24 घंटे में 5 करोड़ श्रद्धालु सुगमता से पवित्र स्नान कर सकें।
‘जल गंगा संवर्धन अभियान’: जन आंदोलन से राज्यव्यापी कायाकल्प
नदियों के प्रवाह को दूषित करना या उनमें मानवीय अवरोध उत्पन्न करना, वास्तव में मानव जीवन की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करने के समान है। इसी वैज्ञानिक दृष्टि को आत्मसात करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर 5 जून 2024 को रायसेन जिले के झिरी बहेडा स्थित बेतवा नदी के पावन उद्गम स्थल पर ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ का भव्य शुभारंभ किया।
हाल ही में जारी हुई यूनिसेफ की क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के करीब 180 करोड़ बच्चे जल संकट और सूखे के सीधे खतरे में हैं। ऐसे चिंताजनक वैश्विक परिदृश्य में मध्यप्रदेश की स्थिति आज काफी सुदृढ़ है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के पारंपरिक जल स्रोतों जैसे नदियों, तालाबों, कुओं, बावड़ियों और चेकडैम का गहरीकरण और जीर्णोद्धार करना है। अभियान के तहत कुल 3,61,001 कार्यों का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से अब तक 2,40,386 कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किए जा चुके हैं।
जल संचय जन भागीदारी (JSJB) 2.0: राष्ट्रीय पटल पर मध्यप्रदेश का दबदबा
जल शक्ति मंत्रालय के ‘जल संचय जन भागीदारी (JSJB) 2.0’ डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, जल संरक्षण के क्षेत्र में मध्यप्रदेश ने देश भर में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। पानी बचाने और जल स्रोतों को सहेजने के पूरे हो चुके कार्यों के आधार पर मध्यप्रदेश पूरे देश में तीसरे स्थान पर है।
| परियोजना / श्रेणी | राष्ट्रीय रैंकिंग / कुल कार्य | विशेष उपलब्धि / प्रगति |
|---|---|---|
| मध्यप्रदेश राज्य रैंकिंग | तृतीय स्थान (देश भर में) | 21,90,930 कार्य पूर्ण, 1,81,506 प्रगति पर |
| शीर्ष जिले (मध्यप्रदेश) | डिंडोरी (तीसरा), खंडवा (पांचवां), शहडोल (नौवां) | भारत के टॉप 10 जिलों में शामिल |
| नगर निगम श्रेणी | खंडवा (दूसरा), इंदौर (पांचवां) | शहरी जल प्रबंधन में उत्कृष्ट प्रदर्शन |
| खेत तालाब (Farm Ponds) | 65,763 पूर्ण | ग्रामीण स्तर पर जल संचय को मजबूती |
| कूप पुनर्भरण (Dug Well) | 96,670 संरचनाएं | भूजल स्तर बढ़ाने में सहायक |
| पारंपरिक जल संरचनाएं | 3,129 मरम्मत कार्य | प्राचीन धरोहरों का पुनरुद्धार |
कृषि समृद्धि और जल संचय जनभागीदारी का व्यवहारिक मॉडल
धरातल पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल-संचय को मजबूती देने के लिए राज्य सरकार द्वारा 10,475.14 करोड़ रूपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई है। इसके तहत राज्य में व्यापक स्तर पर जल संरक्षण एवं रीचार्ज से जुड़े 34,488 कार्यों को पूरा किया गया है। जल संकट के दीर्घकालिक समाधान के उद्देश्य से प्रदेश में 208 भव्य अमृत सरोवरों का निर्माण व विकास सुनिश्चित किया गया है और 5,448 वॉटरशेड संबंधी कार्यों को सफलता के साथ धरातल पर उतारा गया है।
जल चौपालों और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कम पानी वाली फसलों, ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिस्टम जैसी तकनीकों के प्रति प्रशिक्षित किया जा रहा है। “प्रति बूंद अधिक फसल” और “कम पानी में अधिक उत्पादन” के इस मंत्र ने न केवल भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है, बल्कि किसानों की लागत को कम कर उनकी आय में वृद्धि की है।
‘सदानीरा समागम’: वैश्विक पटल पर गूंजा मध्यप्रदेश का जल प्रबंधन मॉडल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के इन अभिनव प्रयासों की गूंज अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है। वीर भारत न्यास द्वारा भोपाल के भारत भवन में आयोजित ‘सदानीरा समागम’ ने जल संरक्षण को समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ जोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। इस ऐतिहासिक समागम में साइप्रस, फिजी, मेक्सिको, नेपाल, त्रिनिदाद एवं टोबैगो और इक्वाडोर जैसे विभिन्न देशों के राजनयिकों, राजदूतों और नीति विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
समागम में शामिल विदेशी प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री द्वारा संचालित जल प्रबंधन के ‘मध्यप्रदेश मॉडल’ को आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकता बताया। उन्होंने जनभागीदारी और शासकीय संकल्प के इस अनूठे समन्वय की सराहना की और इस मॉडल को अपने-अपने देशों में भी लागू करने की इच्छा जताई।
आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य का संकल्प
मुख्यमंत्री के नेतृत्व में महिलाओं, युवाओं और कृषकों की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को एक पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी बना दिया है। ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ और ‘जल संचय जनभागीदारी’ जैसे प्रयास केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध, सुरक्षित और जल-संपन्न मध्यप्रदेश की सुदृढ़ नींव रख रहे हैं। मध्यप्रदेश आज जल संरचनाओं की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि, नदियों के पुनर्जीवन और पर्यावरण संतुलन के क्षेत्र में देश का एक अनुकरणीय राज्य बन चुका है।
Praveen
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