3 करोड़ की सड़क हाथ लगाते ही उखड़ी: ठेकेदार बोला- कॉम्पिटिशन में ज्यादा बचत नहीं होती; सब इंजीनियर ने कहा- सब ठीक है
मुरैना। मध्य प्रदेश के बुनियादी ढांचा विकास और निर्माण कार्यों में पारदर्शिता के दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है। चंबल अंचल के मुरैना जिले से भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के तकनीकी पर्यवेक्षण और ठेकेदारों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ पोरसा क्षेत्र में लगभग तीन करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बनाई जा रही एक डामर सड़क निर्माण कार्य पूरा होने से पहले ही ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी है। हालत यह है कि ग्रामीण जब सड़क पर पैर फेरते हैं या हाथ लगाते हैं, तो डामर और गिट्टी की पूरी परत उखड़कर जमीन की ढीली मिट्टी के रूप में बाहर आ जाती है।
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला पहलू निर्माण एजेंसी यानी ठेकेदार और सरकारी महकमे के तकनीकी अधिकारियों का रवैया है। जहाँ एक तरफ ठेकेदार अपनी तकनीकी कमियों और घटिया सामग्री के इस्तेमाल को छुपाने के बजाय ‘बाजार के कॉम्पिटिशन और मुनाफे की कमी’ का बहाना बना रहा है, वहीं दूसरी ओर विभाग के सब इंजीनियर पूरी बेशर्मी से ऑन-कैमरा कह रहे हैं कि ‘सब ठीक है’। ग्रामीणों ने इस बदहाली का लाइव वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया है और जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को भेजकर काम रोकने की मांग की है।
धरातल की हकीकत: पैर फेरते ही दिखने लगी नीचे की मिट्टी
हुसैनपुरा और माधोपुरा के स्थानीय निवासियों ने निर्माण स्थल पर विरोध प्रदर्शन करते हुए बताया कि सड़क के नाम पर सिर्फ औपचारिकता पूरी की जा रही है। तकनीकी मापदंडों के अनुसार, डामरीकरण से पहले पुरानी सड़क की ढीली मिट्टी को पूरी तरह साफ करना होता है। उसके बाद बेस मटीरियल (गिट्टी और सब-बेस) बिछाकर भारी रोलर के जरिए उसका कंपैक्शन (समतलीकरण) किया जाता है, ताकि सड़क का आधार मजबूत हो सके। इसके बाद ही डामर और बारीक गिट्टी का मिक्सचर (बिटुमिनस कंक्रीट) डाला जाना चाहिए।
लेकिन नागाइच कंस्ट्रक्शन कंपनी ने सारे नियमों को ताक पर रख दिया। ग्रामीणों ने मीडिया के सामने प्रदर्शन करते हुए दिखाया कि जैसे ही सड़क के किनारे या बीच में पैर से हल्का सा रगड़ा जाता है, पूरी गिट्टी और डामर अलग हो जाते हैं और नीचे की पीली मिट्टी साफ दिखाई देने लगती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि अभी यह स्थिति है, तो इस मार्ग पर भारी वाहनों के गुजरते ही सड़क पूरी तरह गड्ढों में तब्दील हो जाएगी और जनता का तीन करोड़ रुपया सीधे तौर पर पानी में बह जाएगा।
इंजीनियरिंग मापदंडों का खुला उल्लंघन
सड़क निर्माण के तय मानकों (MoRTH Guidelines) के अनुसार किसी भी ग्रामीण या जिला मुख्य मार्ग के निर्माण में निम्नलिखित चरणों का पालन अनिवार्य होता है, जिसका इस परियोजना में पूरी तरह अभाव देखा गया:
| चरण (Steps) | निर्धारित नियम व मानक | हुसैनपुरा-माधोपुरा मार्ग पर क्या किया गया? |
|---|---|---|
| सफाई व सब-ग्रेड तैयारी | जमीन की ढीली मिट्टी और कचरा हटाकर रोलर से बेस मजबूत करना। | मिट्टी को बिना साफ किए और बिना रोलर चलाए सीधे उसी पर काम शुरू कर दिया। |
| गिट्टी की लेयर (WBM/WMM) | उचित आकार की गिट्टी डालकर पानी के साथ रोलिंग करना ताकि ताकत मिले। | नाममात्र की गिट्टी बिखेरी गई, जिसका डामर के साथ कोई बॉन्ड नहीं बन पाया। |
| डामर का तापमान | मिक्सिंग और बिछाने के दौरान डामर का तापमान 140 से 160 डिग्री होना चाहिए। | ठंडा और घटिया डामर इस्तेमाल हुआ, जिससे गिट्टियां चिपकने के बजाय बिखर रही हैं। |
ठेकेदार का अजीब तर्क: ‘कॉम्पिटिशन में ज्यादा बचत नहीं होती’
जब इस घटिया निर्माण को लेकर नागाइच कंस्ट्रक्शन कंपनी के ठेकेदार रामनिवास शर्मा से तीखे सवाल पूछे गए, तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला था। उन्होंने किसी भी प्रकार के तकनीकी दोष या लापरवाही को सिरे से खारिज तो नहीं किया, लेकिन भ्रष्टाचार को ढकने के लिए एक नया लॉजिक दे दिया। रामनिवास शर्मा ने कहा, “आजकल टेंडर लेने के लिए मार्केट में बहुत कॉम्पिटिशन है। बहुत कम रेट पर टेंडर डालना पड़ता है, जिससे ठेकेदारी में अब ज्यादा बचत नहीं होती है।”
ठेकेदार का यह बयान सीधे तौर पर यह स्वीकारोक्ति है कि टेंडर हासिल करने की होड़ में जो अंडर-कटिंग (कम दाम पर टेंडर लेना) की जाती है, उसका नुकसान अंततः सामग्री की गुणवत्ता से समझौता करके पूरा किया जाता है। हालांकि, बढ़ते विरोध को देखते हुए ठेकेदार ने यह भी जोड़ा कि “अगर कहीं कोई थोड़ी-बहुत कमी रह गई है, तो आप लोग बता दीजिए, हम उसे दोबारा उखाड़कर सही करवा देंगे।” सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी पैसे की बर्बादी और घटिया निर्माण को सिर्फ ‘दोबारा ठीक करा देने’ के आश्वासन से माफ किया जा सकता है?
अधिकारियों की विफलता: पल्ला झाड़ने में जुटे जिम्मेदार
इस पूरे मामले में लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी कटघरे में है। निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी के लिए जिम्मेदार सब-डिवीजनल ऑफिसर (SDO) एलएन गुप्ता से जब ग्रामीणों की शिकायतों और वायरल वीडियो के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने ऑन-स्पॉट जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने सारा ठीकरा अपने अधीनस्थ तकनीकी अमले पर फोड़ दिया।
वहीं दूसरी तरफ, जब इस मामले के मुख्य तकनीकी पर्यवेक्षक यानी सब इंजीनियर ब्रजेश शर्मा से बात की गई, तो उनका रवैया बेहद टालमटोल वाला और बेपरवाह लगा। उन्होंने ग्रामीणों के दावों और वीडियो साक्ष्यों को नजरअंदाज करते हुए कहा, “अभी तक की स्थिति में सब ठीक है। निर्माण में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं है। फिर भी, अगर स्थानीय लोगों को कोई शिकायत है या कोई कमी दिख रही है, तो हम मौके पर जाकर निरीक्षण करेंगे और उसे ठीक करवाएंगे।” हालांकि, अपनी गर्दन फंसती देख उन्होंने अंत में यह जरूर कहा कि “हम गुणवत्ता से समझौता नहीं करेंगे और किसी भी स्थिति में गलत या बिना जांच के बिल पास नहीं करेंगे।”
सीधी की ‘लीला साहू’ का उदाहरण: जब सोशल मीडिया ने बदली तस्वीर
मुरैना की इस घटना ने मध्य प्रदेश के ही सीधी जिले की एक हालिया घटना की याद ताजा कर दी है, जहाँ सोशल मीडिया की ताकत और एक ग्रामीण महिला की बेबाकी ने पूरी सरकार को हिलाकर रख दिया था। सीधी जिले के खड्डी खुर्द गांव की रहने वाली लीला साहू ने अपने क्षेत्र की जर्जर और बदहाल सड़क को लेकर एक अनोखा वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया था।
लीला साहू ने अपने स्थानीय बघेली लहजे में सीधे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए कहा था— “मोदी जी, 29 के 29 सांसद जिता दिए.. अब तो सड़क बनवा दीजिए।” यह वीडियो इंटरनेट पर इस कदर वायरल हुआ कि राज्य के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। वीडियो सामने आने के मात्र दो दिन के भीतर सीधी कलेक्टर कार्यालय से लीला साहू के पास फोन पहुंचा और जिला प्रशासन ने तत्काल बजट स्वीकृत कर सड़क निर्माण शुरू कराने का आश्वासन दिया। लीला साहू रातों-रात पूरे प्रदेश में ‘सड़क वाली दीदी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गईं।
मुरैना के हुसैनपुरा और माधोपुरा के ग्रामीणों का कहना है कि वे भी अब इसी राह पर हैं। अगर स्थानीय प्रशासन और पीडब्ल्यूडी के मंत्रियों ने इस 3 करोड़ की सड़क के घोटाले पर संज्ञान नहीं लिया, तो वे इस वीडियो को मुख्यमंत्री और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय तक पहुंचाएंगे।
बड़ा सवाल: जनता के टैक्स के पैसे का बंदरबांट कब रुकेगा?
मध्य प्रदेश में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए हर साल बजट में हजारों करोड़ रुपयों का प्रावधान किया जाता है। लेकिन धरातल पर नागाइच कंस्ट्रक्शन जैसी कंपनियों और ब्रजेश शर्मा जैसे सब इंजीनियरों की जुगलबंदी के कारण योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। टेंडर प्रक्रिया में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का बहाना बनाकर ठेकेदार घटिया गिट्टी और कम डामर का उपयोग करते हैं, और सरकारी अधिकारी दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर ‘सब ठीक है’ का प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं।
हुसैनपुरा-माधोपुरा मार्ग का यह मामला केवल एक सड़क का नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक सड़न का प्रतीक है जहाँ तीन करोड़ की लागत वाली सड़क को जनता अपने हाथों से उखाड़ सकती है। अब देखना यह होगा कि मुरैना कलेक्टर और पीडब्ल्यूडी के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में ठेकेदार के खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई करते हैं या फिर सब इंजीनियर के ‘सब ठीक है’ वाले बयान के नीचे इस भ्रष्टाचार को हमेशा के लिए दफन कर दिया जाएगा।
Praveen
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