भोपाल में नवीन आपराधिक कानूनों और ICJS डिजिटल समन्वय पर राज्य स्तरीय महा-कार्यशाला कल






भोपाल में नवीन आपराधिक कानूनों और ICJS डिजिटल समन्वय पर राज्य स्तरीय महा-कार्यशाला का आयोजन

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भोपाल में जुटेंगे न्याय और कानून व्यवस्था के दिग्गज: नवीन आपराधिक कानूनों के डिजिटल क्रियान्वयन और ICJS समन्वय पर कल राज्य स्तरीय महा-कार्यशाला

भोपाल, 27 जून 2026: देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में युगांतरकारी बदलाव लाने वाले तीन नए कानूनों के प्रभावी और शत-प्रतिशत डिजिटल क्रियान्वयन को लेकर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक बड़े मंथन की तैयारी पूरी हो चुकी है। अंतः-क्रियाशील आपराधिक न्याय प्रणाली (Interoperable Criminal Justice System – ICJS) के अंतर्गत न्यायपालिका, पुलिस, जेल, अभियोजन और फॉरेंसिक साइंस के बीच डिजिटल तालमेल को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कल, यानी रविवार 28 जून 2026 को भोपाल के ऐतिहासिक कुशाभाऊ ठाकरे सभागार (मिंटो हॉल) में एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।

कार्यक्रम की मुख्य बातें:
स्थान: कुशाभाऊ ठाकरे सभागार (मिंटो हॉल), भोपाल
दिनांक एवं समय: रविवार, 28 जून 2026, प्रातः 09:30 बजे से
मुख्य एजेंडा: BNS, BNSS और BSA का डिजिटल एकीकरण तथा ICJS प्लेटफार्म का सुदृढ़ीकरण।
प्रमुख सहभागी: माननीय न्यायाधीश, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, मेडिकल ऑफिसर्स, अभियोजन, जेल और फॉरेंसिक लैब (FSL) के विशेषज्ञ।

1. कार्यशाला का मूल उद्देश्य: पांच स्तंभों में अभूतपूर्व डिजिटल समन्वय

1 जुलाई 2024 से देश भर में प्रभावी हुए तीन नए आपराधिक कानूनों—भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) ने औपनिवेशिक काल के पुराने कानूनों (IPC, CrPC और साक्ष्य अधिनियम) को प्रतिस्थापित किया था। इन कानूनों की मूल आत्मा ‘न्याय’ पर केंद्रित है, न कि ‘दंड’ पर। इन नए विधायी प्रावधानों को जमीन पर पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए सबसे बड़ी चुनौती और आवश्यकता विभिन्न विभागों के बीच रीयल-टाइम सूचनाओं के आदान-प्रदान की है।

भोपाल में आयोजित होने वाली यह कार्यशाला इसी उद्देश्य को समर्पित है। देश में क्रिमिनल जस्टिस डिलीवरी को पारदर्शी, त्वरित और तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए केंद्र सरकार के ICJS प्रोजेक्ट के तहत मध्य प्रदेश पहला ऐसा राज्य बनने की दिशा में अग्रसर है जो सभी पांचों स्तंभों को एक एकल डिजिटल धागे में पिरो रहा है।

आपराधिक न्याय प्रणाली के 5 प्रमुख स्तंभ जिन पर केंद्रित होगा मंथन:

  • पुलिस (Police): ई-एफआईआर (e-FIR), जीरो एफआईआर और डिजिटल साक्ष्य संकलन (जैसे घटनास्थल की वीडियोग्राफी)।
  • न्यायाधीश/न्यायपालिका (Judiciary): इलेक्ट्रॉनिक समन, वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही और डिजिटल रिकॉर्ड का त्वरित हस्तांतरण।
  • अभियोजन (Prosecution): केस डायरी का ऑनलाइन विश्लेषण, डिजिटल चार्जशीट की समयबद्ध समीक्षा और अदालतों में मजबूत पैरवी।
  • कारागार (Prisons): बंदियों का डिजिटल डेटाबेस, ई-मुलाकात और बंदियों की अदालतों में वर्चुअल पेशी (Video Conferencing)।
  • फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (Forensic Science Laboratory – FSL): डिजिटल फॉरेंसिक रिपोर्टिंग, साक्ष्यों की ऑनलाइन ट्रैकिंग और चेन ऑफ कस्टडी का डिजिटल प्रबंधन।

2. कार्यक्रम की रूपरेखा और उच्च स्तरीय सहभागिता

इस कार्यशाला का आयोजन गृह विभाग, विधि एवं विधायी कार्य विभाग और मध्य प्रदेश पुलिस के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। रविवार सुबह 9:30 बजे से शुरू होने वाले इस सत्र में राज्य के सभी जिलों से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है।

विभाग / स्तंभ सहभागिता करने वाले अधिकारी/प्रतिनिधि ICJS के अंतर्गत मुख्य डिजिटल जिम्मेदारी
न्यायपालिका (Judiciary) विभिन्न जिलों के माननीय न्यायाधीश एवं विधिक विशेषज्ञ ई-कोर्ट्स (e-Courts) के माध्यम से केस का त्वरित निपटारा और डिजिटल साक्ष्यों की स्वीकार्यता।
पुलिस विभाग (Police) सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक (SP), महानिरीक्षक (IG) और वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी CCTNS पोर्टल के जरिए जांच, साक्ष्य और एफआईआर को रीयल-टाइम अपलोड करना।
स्वास्थ्य विभाग (Medical Officers) वरिष्ठ मेडिकल अधिकारी और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स एमएलसी (MLC – Medico-Legal Case) रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का ऑनलाइन अपडेशन।
अभियोजन (Prosecution) जिलों के मुख्य लोक अभियोजक एवं वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी e-Prosecution ऐप के माध्यम से मामलों की डिजिटल मॉनिटरिंग।
जेल विभाग (Prisons) जेल अधीक्षक और कारागार प्रबंधन के तकनीकी विशेषज्ञ e-Prisons सॉफ्टवेयर के माध्यम से बंदियों का रिकॉर्ड और अदालतों के साथ सीधा समन्वय।
फॉरेंसिक विभाग (FSL) फॉरेंसिक साइंस लैब्स के निदेशक एवं वैज्ञानिक अधिकारी साक्ष्यों की जांच के बाद रीयल-टाइम ऑनलाइन रिपोर्ट जारी करना ताकि जांच में देरी न हो।

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3. नवीन कानूनों (BNS, BNSS, BSA) में डिजिटल तकनीक की रीढ़: क्यों जरूरी है ICJS?

नए कानूनों में प्रौद्योगिकी (Technology) को केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया गया है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के तहत इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड्स को प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence) के समकक्ष मान्यता दी गई है। वहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में तलाशी और जब्ती (Search and Seizure) के दौरान अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी करने का प्रावधान है।

ऐसी स्थिति में, यदि पुलिस द्वारा रिकॉर्ड की गई वीडियो क्लिप या डिजिटल साक्ष्य अदालत तक सुरक्षित और छेड़छाड़-मुक्त (Tamper-proof) तरीके से नहीं पहुंचता है, तो मामले के खारिज होने का खतरा रहता है। यहीं पर ICJS (Interoperable Criminal Justice System) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक ऐसा साझा प्लेटफॉर्म है जहां एक विभाग द्वारा दर्ज की गई जानकारी दूसरे विभाग को तुरंत और सुरक्षित रूप से उपलब्ध हो जाती है।

विशेष नोट: “ICJS के माध्यम से अब केस डायरी, फॉरेंसिक रिपोर्ट और गवाहों के बयान कागजी फाइलों के जाल में नहीं फंसेंगे। पुलिस स्टेशन से लेकर अदालत के कंप्यूटर तक डेटा का प्रवाह एक क्लिक पर होगा, जिससे ‘तारीख-पर-तारीख’ के युग का अंत होगा और न्याय समयबद्ध तरीके से मिल सकेगा।”


4. कार्यशाला के मुख्य तकनीकी सत्र (Technical Sessions Agenda)

दिनभर चलने वाली इस कार्यशाला को कई महत्वपूर्ण तकनीकी सत्रों में विभाजित किया गया है, ताकि व्यावहारिक समस्याओं का समाधान निकाला जा सके:

  1. प्रथम सत्र – डिजिटल साक्ष्य और कानून: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को प्रमाणित करने की प्रक्रिया (पुराने सेक्शन 65B के नए स्वरूप पर चर्चा)।
  2. द्वितीय सत्र – पुलिस और फॉरेंसिक एकीकरण: गंभीर अपराधों (7 वर्ष से अधिक की सजा वाले मामलों) में फॉरेंसिक टीमों की अनिवार्य उपस्थिति और डिजिटल साक्ष्य का क्लाउड स्टोरेज।
  3. तृतीय सत्र – मेडिकल और अभियोजन समन्वय: मेडिकल ऑफिसर्स द्वारा तैयार की जाने वाली चोट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को कैसे तुरंत ई-प्रॉसिक्यूशन और ई-कोर्ट के माध्यम से जज के सामने प्रस्तुत किया जाए।
  4. चतुर्थ सत्र – ओपन फोरम और समस्या निवारण (FAQ Session): इस सत्र में मैदानी स्तर पर काम करने वाले पुलिस अधिकारियों और न्यायाधीशों के बीच आने वाली व्यावहारिक तकनीकी दिक्कतों (जैसे कनेक्टिविटी, डेटा सुरक्षा और क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली) पर सीधी चर्चा होगी।

5. डिजिटल न्याय प्रणाली में मध्य प्रदेश का बढ़ता कदम

मध्य प्रदेश देश के उन अग्रणी राज्यों में शामिल है जिसने नए कानूनों के लागू होने के बाद से ही अपने पुलिस कर्मियों, अभियोजकों और न्यायिक अधिकारियों के लिए व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए हैं। राज्य ने अपने CCTNS (Crime and Criminal Tracking Network & Systems) को काफी हद तक अपडेट कर लिया है।

इस राज्य स्तरीय कार्यशाला के माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार का लक्ष्य एक ऐसा ‘जीरो-गैप डिजिटल इकोसिस्टम’ तैयार करना है, जिसमें:

  • समन तामीली 100% डिजिटल (SMS/Email के जरिए) हो सके।
  • जेल से कैदियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत लाने की आवश्यकता न्यूनतम हो, जिससे सुरक्षा और संसाधनों की बचत हो।
  • फॉरेंसिक रिपोर्ट सीधे जांच अधिकारी (IO) के टैबलेट/कंप्यूटर पर उपलब्ध हो।

6. निष्कर्ष: एक पारदर्शी और त्वरित न्याय प्रणाली की ओर ऐतिहासिक कदम

भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित होने जा रही यह एक दिवसीय कार्यशाला महज एक प्रशासनिक बैठक नहीं है, बल्कि यह भारत की भावी कानूनी और न्यायिक व्यवस्था का एक खाका (Blueprint) है। सभी पांचों स्तंभों का एक छत के नीचे आना और डिजिटल रूप से जुड़ने की रणनीति बनाना इस बात का प्रमाण है कि मध्य प्रदेश नागरिक केंद्रित न्याय प्रणाली (Citizen-Centric Justice System) को लागू करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

इस कार्यशाला से निकलने वाले निष्कर्ष और डिजिटल रणनीतियां आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो सकती हैं। रविवार को होने वाले इस मंथन पर पूरे देश के कानूनी और प्रशासनिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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