मध्यप्रदेश का मैहर बैंड राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) सूची में शामिल, जानें इसका इतिहास






ऐतिहासिक गौरव: मध्यप्रदेश का ‘मैहर बैंड’ राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) सूची में शामिल, यूनेस्को की रेस में बढ़ा कदम

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संस्कृति एवं विरासत | विशेष रिपोर्ट

मध्यप्रदेश की संगीत परंपरा को वैश्विक पहचान: 108 वर्ष पुराना विश्वविख्यात ‘मैहर वाद्यवृंद’ राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) सूची में सम्मिलित

मुख्य संवाददाता, भोपाल |
अपडेटेड: 2026 |
टैग्स: #MaiharBand #MadhyaPradeshTourism #CulturalHeritage #UstadAlauddinKhan #NalTarang

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की गहरी सांस्कृतिक अभिरुचि और प्रदेश की अनमोल धरोहरों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के दृढ़ संकल्प के फलस्वरूप मध्यप्रदेश की संगीत विरासत को एक और ऐतिहासिक गौरव प्राप्त हुआ है। माँ शारदा की पावन नगरी की अनमोल धरोहर और विश्वविख्यात ‘मैहर वाद्यवृंद’ (मैहर बैंड) को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) की सूची में सम्मिलित कर लिया गया है। यह मील का पत्थर न केवल विंध्य क्षेत्र बल्कि संपूर्ण भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत के लिए एक अभूतपूर्व गौरव का क्षण लेकर आया है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की लोक-संस्कृति और पारंपरिक कलाओं को अक्षुण्ण रखने की दूरदर्शी नीति के अंतर्गत संस्कृति विभाग द्वारा उठाए गए प्रभावी एवं निरंतर कदमों का ही यह सुखद परिणाम है। इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सूची में स्थान मिलने से मैहर बैंड की सदियों पुरानी वादन शैली और उसकी मौलिकता को अब राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक संरक्षण प्राप्त होगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इसके प्रदर्शन और शोध का मार्ग प्रशस्त होगा।

“मैहर बैंड केवल वाद्यों का समूह नहीं, बल्कि यह भारतीय शास्त्रीय संगीत का वह अद्भुत इतिहास है जिसने युद्ध के अस्त्रों (बंदूक की नालियों) को सुरों के शास्त्र (नलतरंग) में बदल दिया। राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में इसका शामिल होना इसकी एक सदी से भी अधिक की साधना की राष्ट्रीय स्वीकृति है।”

प्रशासनिक हर्ष और बधाईयों का तांता

इस ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा के बाद प्रशासनिक और सांस्कृतिक हलकों में हर्ष की लहर दौड़ गई है। अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व और सामान्य प्रशासन शिव शेखर शुक्ला ने मैहर बैंड के प्रतिभावान कलाकारों एवं शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर को हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृति विभाग प्रदेश की इस गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पिछले वर्ष इस ऐतिहासिक कला रूप को राष्ट्रीय सूची में नामांकित करने के लिए केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत संगीत नाटक अकादमी को विस्तृत प्रस्ताव भेजा गया था। संगीत नाटक अकादमी भारत में यूनेस्को (UNESCO) की नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करती है, जो देश भर की जीवंत सांस्कृतिक ज्ञान प्रणालियों, शिल्पों और लोक कलाओं का कठोर मानकों पर परीक्षण कर उन्हें राष्ट्रीय सूची में शामिल करती है।

यूनेस्को की विश्व विरासत सूची की ओर बढ़ा मजबूत कदम

सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) की सूची में शामिल होना किसी भी पारंपरिक धरोहर के लिए यूनेस्को की ‘प्रतिनिधि सूची’ (Representative List of the Intangible Cultural Heritage of Humanity) में शामिल होने की दिशा में सबसे पहला और अनिवार्य कदम माना जाता है। केंद्र सरकार इसी राष्ट्रीय सूची में दर्ज विरासतों में से चुनिंदा कला रूपों का नामांकन प्रत्येक दो वर्ष में यूनेस्को को वैश्विक मान्यता के लिए भेजती है। मैहर बैंड के इस सूची में आने से अब भविष्य में इसके यूनेस्को धरोहर बनने की संभावनाएं बेहद प्रबल हो गई हैं।

मध्यप्रदेश के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि मैहर बैंड के साथ-साथ इस वर्ष प्रदेश की दो अन्य अनूठी परंपराओं—अगरिया जनजाति की पारंपरिक ‘अगरिया लोह’ (मिट्टी की भट्टियों से लोहा गलाने की स्वदेशी तकनीक) और पश्चिमी मध्यप्रदेश की कृषि-पारिस्थितिक विविधता को दर्शाने वाले ‘निमाड़ी जायका’ (निमाड़ क्षेत्र के व्यंजन) को भी राष्ट्रीय सूची में स्थान मिला है। इससे पूर्व प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों में से ‘भगोरिया नृत्य’, ‘नर्मदा परिक्रमा’ और पाटनगढ़ की प्रसिद्ध ‘गोंड चित्रकला’ को भी इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सूची में गौरवपूर्ण स्थान मिल चुका है।

संस्कृति विभाग की उपलब्धियों का सफर और ‘गुरुकुल’ की स्थापना

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की कला-संस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा और अनुराग के अनुरूप प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए संस्कृति विभाग द्वारा निरंतर प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में विभाग की इस शानदार सांस्कृतिक यात्रा में पूर्व में सात ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ भी प्राप्त हो चुके हैं, जो मध्यप्रदेश की भव्य प्रस्तुतियों और प्रबंधकीय कौशल को रेखांकित करते हैं।

मैहर बैंड की इस अनूठी और दुर्लभ संगीत परंपरा को न केवल जीवंत रखने बल्कि इसे आगामी पीढ़ियों तक पूरी शुद्धता के साथ सुरक्षित पहुंचाने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा एक दूरगामी कदम उठाया जा रहा है। विभाग द्वारा शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर के माध्यम से एक विशेष ‘गुरुकुल’ की स्थापना की जा रही है।

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गुरुकुल पद्धति से तैयार होगी नई पीढ़ी

  • प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का पुनरुद्धार: इस गुरुकुल में प्राचीन आवासीय शिक्षा पद्धति के तहत छात्र सीधे उस्तादों के सानिध्य में रहकर संगीत की बारीकियों को सीखेंगे।
  • दुर्लभ रागों और बंदिशों का संरक्षण: उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब द्वारा रचित विशेष रागों और बंदिशों को लिपिबद्ध और कंठस्थ कराने का कार्य किया जाएगा।
  • वाद्य वादन का विशेष प्रशिक्षण: युवाओं को विशेष रूप से उन वाद्यों को बजाने का कड़ा अभ्यास कराया जाएगा जो मैहर ऑर्केस्ट्रा की मुख्य पहचान हैं।

इस गुरुकुल पद्धति से प्रशिक्षित होकर निकलने वाले युवा कलाकार मैहर बैंड के अनूठे संगीत, विशिष्ट रागों और इसकी गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा को और अधिक समृद्ध कर सकेंगे, जिससे यह अनमोल कला समय के थपेड़ों से कभी ओझल नहीं होगी।

‘मैहर बैंड’ का गौरवशाली इतिहास और इसकी उत्पत्ति

स्वर और साधना के अद्भुत संगम ‘मैहर बैंड’ का इतिहास बेहद गौरवशाली, अनूठा और प्रेरणादायी है। इसकी स्थापना ब्रिटिश काल के दौरान वर्ष 1918 में महान संगीत मनीषी, बहुविद्याप्रवीण संगीताचार्य उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब (जिन्हें संगीत जगत में आदर से ‘बाबा’ कहा जाता है) ने की थी। इसके पीछे मैहर रियासत के तत्कालीन कला-पारखी महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव की गहरी प्रेरणा और पूर्ण सहयोग था।

माना जाता है कि प्रथम विश्वयुद्ध और उस दौर में फैली भीषण महामारी (प्लेग/इन्फ्लूएंजा) के कारण मैहर क्षेत्र में कई बच्चे अनाथ हो गए थे। संवेनशील हृदय के धनी बाबा अलाउद्दीन खाँ साहब ने उन अनाथ बच्चों को आश्रय दिया और उनके जीवन की निराशा को दूर करने के लिए उन्हें संगीत सिखाने का संकल्प लिया। बाबा ने उन बच्चों की रुचि और शारीरिक क्षमता के अनुसार अलग-अलग वाद्य यंत्र सौंपे और सामूहिक वादन का कड़ा प्रशिक्षण देना शुरू किया। इसी मानवीय और कलात्मक प्रयास से जन्म हुआ ‘मैहर वाद्यवृंद’ का।

विश्व का पहला शास्त्रीय ऑर्केस्ट्रा

भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में यह संपूर्ण विश्व का पहला ऐसा शास्त्रीय वाद्यवृंद (ऑर्केस्ट्रा) है, जिसने संगीत प्रेमियों को एक नए वितान से परिचित कराया। पारंपरिक रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत एकल वादन या गायन (Solo Performance) पर केंद्रित रहा है, जहाँ एक मुख्य कलाकार के साथ केवल तबला या तानपुरा जैसे संगतकार होते हैं। लेकिन बाबा अलाउद्दीन खाँ साहब ने इस रूढ़ि को तोड़ते हुए पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा की तर्ज पर भारतीय शास्त्रीय रागों को सामूहिक रूप से बजाने की एक नई विधा का आविष्कार किया।

बीते 108 वर्षों के अपने सुदीर्घ और यशस्वी सफर में इस बैंड ने अपनी मौलिकता और शास्त्रीय गरिमा को अक्षुण्ण रखा है। धरोहर के रूप में इसके कलाकारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस अनमोल वाद्यवृंद की परंपरा को पूरी निष्ठा, कड़े अनुशासन और साधना के साथ संजोकर रखा है। आज भी जब मैहर बैंड के कलाकार सफेद पारंपरिक वेशभूषा में मंच पर बैठकर एक साथ अपनी जुगलबंदी शुरू करते हैं, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

वाद्ययंत्रों का अनूठा मेल और ‘नलतरंग’ का अद्भुत आविष्कार

मैहर बैंड की सबसे बड़ी तकनीकी और कलात्मक विशेषता इसके दुर्लभ वाद्ययंत्र और उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब द्वारा तैयार की गई विशेष शास्त्रीय बंदिशें हैं। इस वाद्यवृंद में भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही संगीत संस्कृतियों के वाद्ययंत्रों का एक ऐसा संतुलित और मधुर समन्वय देखने को मिलता है, जिसकी कल्पना भी उस दौर में कठिन थी।

वाद्य यंत्र का प्रकार सम्मिलित वाद्य यंत्र संगीत में भूमिका
भारतीय पारंपरिक वाद्य सितार, सरोद, इसराज, तबला, ढोलक मुख्य राग संरचना और मुख्य सुरों को संभालना
पाश्चात्य/विदेशी वाद्य वायलिन, चेलो (Cello), हारमोनियम, सितार-बैंजो, क्लैरिनेट ऑर्केस्ट्रा को गूंज (Harmony) और बेस प्रदान करना
बाबा अलाउद्दीन खाँ का आविष्कार नलतरंग (Nal Tarang) बैंड का मुख्य आकर्षण, जलतरंग की तरह तीव्र और मधुर स्वर बिखेरना

कौतूहल का केंद्र: बंदूक की नाल से बना ‘नलतरंग’

इन सभी वाद्ययंत्रों के बीच सबसे अनोखा और मुख्य आकर्षण ‘नलतरंग’ है। उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब ने अपनी असीम रचनात्मकता का परिचय देते हुए मैहर रियासत के शस्त्रागार में पड़ी बेकार और टूटी हुई बंदूकों की नालियों (बैरल) को अलग-अलग आकारों में काटा। उन्होंने उन लोहे की नालियों को बेहद कलात्मक और वैज्ञानिक ढंग से तराश कर उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत के सप्तक (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) के अनुसार स्वरबद्ध किया।

इस प्रकार बंदूक की लोहे की नलियों से ‘नलतरंग’ जैसे अद्भुत, मधुर और प्रतिध्वनित होने वाले शास्त्रीय वाद्य का आविष्कार हुआ। पूरी दुनिया में मैहर बैंड के अलावा यह अनूठा वाद्य कहीं और नहीं पाया जाता। यह वाद्य यंत्र वैश्विक संगीत जगत, शोधकर्ताओं और संगीतविदों के बीच हमेशा से ही भारी कौतूहल, विस्मय और आकर्षण का केंद्र रहा है, क्योंकि यह विनाश के प्रतीक (बंदूक) से सृजन के सुर (संगीत) निकलने की साक्षात कहानी कहता है।

1924 का भातखंडे समारोह: राष्ट्रीय ख्याति का शंखनाद

मैहर वाद्यवृंद की राष्ट्रीय ख्याति का ऐतिहासिक शंखनाद वर्ष 1924 में हुआ था। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के प्रतिष्ठित केसर बाग में आयोजित ‘भातखंडे संगीत समारोह’ में जब इस बैंड ने अपनी पहली बड़ी बाहरी प्रस्तुति दी, तो वहाँ मौजूद समूचा भारतवर्ष और देश के दिग्गज संगीतकार चमत्कृत रह गए। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जैसे महान संगीत शास्त्रियों ने बाबा के इस प्रयोग की मुक्त कंठ से सराहना की थी।

उसी ऐतिहासिक सफलता के बाद से लेकर आज तक इस बैंड ने देश और दुनिया के लगभग सभी प्रतिष्ठित संगीत मंचों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। राष्ट्रपति भवन से लेकर देश के बड़े सांगीतिक समागमों में इसकी गूंज सुनाई देती रही है। संगीत और कला के प्रति इसके इसी अमूल्य और ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा वर्ष 2016 में इसे प्रदेश के सर्वोच्च सांस्कृतिक पुरस्कार ‘शिखर सम्मान’ से भी विभूषित किया जा चुका है।

सांस्कृतिक गौरव का नया सवेरा

वर्तमान में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के सीधे संरक्षण में यह वाद्यवृंद भारतीय शास्त्रीय संगीत की अनवरत बहती रसधारा के रूप में विश्व पटल पर मध्यप्रदेश का मस्तक ऊंचा कर रहा है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) सूची में शामिल होने के बाद अब इसके कलाकारों को बेहतर अवसर, वैश्विक मंच और वित्तीय संबल प्राप्त हो सकेगा।

मैहर घराने ने पंडित रविशंकर (सितार वादक) और उस्ताद अली अकबर खाँ (सरोद वादक) जैसे विश्वविख्यात संगीत मार्तंड देश को दिए हैं। इसी पावन घराने के प्रतीक ‘मैहर बैंड’ को मिला यह राष्ट्रीय सम्मान यह सिद्ध करता है कि कला और साधना की जड़ें कितनी भी पुरानी हो जाएं, उनका महत्व हमेशा शाश्वत रहता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश अपनी इस सांस्कृतिक निधि को वैश्विक क्षितिज पर चमकाने के लिए निरंतर अग्रसर है।

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