छत्तीसगढ़: जगदलपुर के सभी शासकीय कार्यक्रमों में अब केवल ‘देवभोग’ उत्पादों का होगा उपयोग, कलेक्टर का बड़ा आदेश






जगदलपुर: शासकीय आयोजनों में अब अनिवार्य रूप से होगा ‘देवभोग’ उत्पादों का उपयोग – कलेक्टर आकाश छिकारा का बड़ा फैसला

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विशेष रिपोर्ट: जगदलपुर के सभी शासकीय कार्यक्रमों में अब केवल ‘देवभोग’ डेयरी उत्पादों का होगा उपयोग, कलेक्टर आकाश छिकारा ने जारी किया कड़ा निर्देश – बिना टेंडर सीधे होगी खरीदी

स्थान: जगदलपुर (बस्तर), छत्तीसगढ़
दिनांक: 30 जून 2026
ब्यूरो रिपोर्ट: राज्य प्रशासनिक समाचार सेवा

जगदलपुर, 30 जून 2026। छत्तीसगढ़ शासन के मंशानुरूप और राज्य के स्थानीय पशुपालकों एवं किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में बस्तर जिले में एक बेहद दूरगामी और ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। बस्तर जिले के यशस्वी कलेक्टर श्री आकाश छिकारा द्वारा एक आधिकारिक परिपत्र (सर्कुलर) जारी कर यह निर्देशित किया गया है कि अब जिले के भीतर आयोजित होने वाले सभी शासकीय आयोजनों, महत्वपूर्ण बैठकों, सम्मेलनों, कार्यशालाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में केवल छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी दुग्ध महासंघ मर्यादित द्वारा उत्पादित ‘देवभोग’ ब्रांड के दूध और दुग्ध उत्पादों का ही अनिवार्य रूप से उपयोग किया जाएगा।

प्रशासन के इस बड़े कदम का सीधा उद्देश्य छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचलों में संचालित दुग्ध सहकारी समितियों से जुड़े हजारों स्थानीय पशुपालकों, दुग्ध उत्पादकों और सीमांत किसानों के आर्थिक हितों का संरक्षण करना है। प्रशासन का मानना है कि इस निर्णय से न केवल स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ेगी, बल्कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘स्वदेशी अर्थव्यवस्था’ के मॉडल को नया बल मिलेगा।

फैसले की मुख्य बातें: एक नजर में

मुख्य विषय प्रशासनिक विवरण और नियम
आदेश जारीकर्ता श्री आकाश छिकारा (कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी, बस्तर-जगदलपुर)
लागू होने की तिथि 30 जून 2026 (तत्काल प्रभाव से लागू)
अनिवार्य ब्रांड ‘देवभोग’ (छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी दुग्ध महासंघ मर्यादित का आधिकारिक ब्रांड)
लागू क्षेत्र जिले के समस्त शासकीय विभाग, निगम, मंडल, सार्वजनिक उपक्रम और स्थानीय निकाय
क्रय का कानूनी आधार छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम 2002 (यथासंशोधित 2020) के नियम 8.4 के तहत
विशेष रियायत शासकीय विभागों को सामग्री क्रय करने के लिए किसी भी प्रकार की निविदा (टेंडर) की आवश्यकता नहीं

भंडार क्रय नियम 2002 का हवाला: बिना टेंडर सीधे होगी खरीदी

कलेक्टर श्री आकाश छिकारा द्वारा जारी विस्तृत परिपत्र में इस निर्णय के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं को भी पूरी स्पष्टता के साथ रेखांकित किया गया है। परिपत्र में स्पष्ट किया गया है कि छत्तीसगढ़ भंडार क्रय नियम 2002 (यथासंशोधित 2020) के नियम 8.4 के अंतर्गत यह विशेष प्रावधान है कि यदि राज्य शासन की कोई भी विभागीय इकाई या सहकारी संस्था किसी सामग्री का स्वयं निर्माण या उत्पादन करती है, तो राज्य के अन्य शासकीय विभागों को उससे सीधे सामग्री क्रय करने का अधिकार है।

इस नियम के तहत, जगदलपुर और पूरे बस्तर जिले के शासकीय कार्यालयों को देवभोग के शुद्ध, प्रामाणिक और उच्च गुणवत्ता वाले दूध, दही, छाछ, पेड़ा, घी, और पनीर जैसे उत्पादों को खरीदने के लिए अलग से कोई भी लंबी निविदा प्रक्रिया या टेंडर बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। सभी विभाग सीधे छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी दुग्ध महासंघ से संपर्क कर इन उत्पादों को बाजार मूल्य या निर्धारित शासकीय दरों पर सीधे प्राप्त कर सकेंगे। इससे प्रशासनिक समय की बचत होगी और सीधे सरकारी महासंघ को आर्थिक लाभ पहुंचेगा।

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“इस निर्णय का मूल उद्देश्य हमारे छत्तीसगढ़ के माटी से जुड़े किसानों और पशुपालकों के पसीने को सही मूल्य देना है। जब शासकीय स्तर पर ‘देवभोग’ जैसे स्वदेशी और सहकारी ब्रांड को प्राथमिकता मिलेगी, तो हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। सभी आहरण एवं संवितरण अधिकारी (DDO) शासकीय कार्यक्रमों के बिलों के सत्यापन के दौरान इस आदेश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें।”

– श्री आकाश छिकारा, कलेक्टर, बस्तर-जगदलपुर

सभी विभागों पर तत्काल प्रभाव से लागू: बिलों के सत्यापन में होगी कड़ाई

यह महत्वपूर्ण आदेश बस्तर जिले के अंतर्गत आने वाले समस्त शासकीय विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs), निगमों, मंडलों, विकास प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों (नगर निगम, नगरपालिका, जनपद और ग्राम पंचायतों) पर तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है। आदेश का उल्लंघन करने या निजी ब्रांड के डेयरी उत्पादों का उपयोग करने पर संबंधित विभाग के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

कलेक्टर ने जिले के सभी आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (DDO – Drawing and Disbursing Officers) और सभी विभागाध्यक्षों (HoDs) को सख्त हिदायत दी है कि भविष्य में उनके विभाग द्वारा आयोजित होने वाले किसी भी शासकीय कार्यक्रम, बैठक या सम्मेलन के बाद जब वित्तीय देयकों (बिल-वाउचर) का प्रस्तुतीकरण और सत्यापन किया जाए, तो यह सूक्ष्मता से जांचा जाए कि उसमें केवल और केवल देवभोग ब्रांड के उत्पादों का ही क्रय दिखाया गया हो। यदि किसी अन्य ब्रांड के दुग्ध उत्पाद का बिल पाया जाता है, तो उस देयक के भुगतान पर रोक लगाई जा सकती है और संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय की जाएगी।

स्थानीय अर्थव्यवस्था और पशुपालकों के लिए संजीवनी

जानकारों का मानना है कि बस्तर जैसे जनजातीय बहुल और विकासशील क्षेत्र में इस प्रकार के सरकारी संरक्षण से स्थानीय डेयरी फार्मिंग (दुग्ध पालन) को एक नया जीवन मिलेगा। वर्तमान में राज्य के कई जिलों में स्थानीय किसान दुग्ध सहकारी समितियों के माध्यम से दुग्ध महासंघ से जुड़े हुए हैं। जब सरकारी स्तर पर देवभोग के दूध, मट्ठा, घी और मिठाइयों की मांग बढ़ेगी, तो दुग्ध महासंघ ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक मात्रा में और बेहतर दामों पर दूध की खरीदी कर सकेगा।

इस दूरगामी निर्णय के प्रमुख लाभ:

  • बिचौलियों का अंत: सीधे दुग्ध महासंघ से खरीदी होने के कारण निजी सप्लायरों और बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाएगी, जिससे शासकीय धन का सदुपयोग होगा।
  • गुणवत्ता की गारंटी: सरकारी लैबोरेट्रीज में जांचा हुआ देवभोग का दूध और उत्पाद पूरी तरह से मिलावट रहित और स्वास्थ्य के लिए उच्च गुणवत्ता वाले माने जाते हैं, जिससे शासकीय बैठकों में अतिथियों को उत्कृष्ट उत्पाद मिलेंगे।
  • ग्रामीण रोजगार में वृद्धि: दुग्ध उत्पादन में स्थिरता आने से बस्तर और छत्तीसगढ़ के युवाओं का रुझान पशुपालन की ओर बढ़ेगा, जिससे ग्रामीण स्तर पर ही रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
  • महिला स्व-सहायता समूहों को संबल: दुग्ध सहकारी समितियों में बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यरत हैं, इस निर्णय से महिला सशक्तिकरण को भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिलेगा।

आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की दिशा में एक अनुकरणीय कदम

छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी दुग्ध महासंघ मर्यादित का ‘देवभोग’ ब्रांड राज्य की अपनी पहचान है। जगदलपुर जिला प्रशासन द्वारा उठाया गया यह कदम ‘वोकल फॉर लोकल’ (Vocal for Local) और ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ के संकल्प को धरातल पर उतारने जैसा है। कलेक्टर आकाश छिकारा का यह परिपत्र यह साबित करता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति सुदृढ़ हो, तो सरकारी नियमों (भंडार क्रय नियम) का सही उपयोग करके किस प्रकार सीधे तौर पर समाज के अंतिम छोर पर बैठे किसान और पशुपालक को लाभान्वित किया जा सकता है। अब देखना यह होगा कि जिले के सभी विभाग इस लोक-कल्याणकारी आदेश का कितनी तत्परता और निष्ठा से क्रियान्वयन करते हैं।