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रामगढ़ महोत्सव 2026: सरगुजा के ऐतिहासिक रामगढ़ के विकास के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने की 1 करोड़ की बड़ी घोषणा; सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाओं का किया अवलोकन






रामगढ़ महोत्सव 2026: सरगुजा के ऐतिहासिक रामगढ़ के विकास के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने की 1 करोड़ रुपये की बड़ी घोषणा


संस्कृति एवं पर्यटन

रामगढ़ महोत्सव 2026: सरगुजा के ऐतिहासिक रामगढ़ के भव्य विकास के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने की 1 करोड़ रुपये के विशेष अनुदान की घोषणा; सीताबेंगरा, जोगीमारा और हाथीपोल धरोहरों का किया अवलोकन

विशेष ब्यूरो रिपोर्ट: प्रदेश खबर न्यूज नेटवर्क |
स्थान: उदयपुर (सरगुजा), छत्तीसगढ़ |
दिनांक: 30 जून, 2026

सरगुजा (छत्तीसगढ़)। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज सरगुजा जिले के उदयपुर विकासखंड के अंतर्गत ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं रामवनगमन पर्यटन परिपथ से जुड़े पौराणिक स्थल रामगढ़ में आयोजित दो दिवसीय ‘रामगढ़ महोत्सव-2026’ के भव्य समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस गौरवशाली ऐतिहासिक अवसर पर मुख्यमंत्री ने क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व और पर्यटन संभावनाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के उद्देश्य से 1 करोड़ रुपये के विशेष अनुदान की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस राशि का उपयोग रामगढ़ क्षेत्र के सुनियोजित विकास, पर्यटन सुविधाओं के विस्तार और प्राचीन धरोहरों के संरक्षण के लिए किया जाएगा। यह पहला अवसर था जब मुख्यमंत्री ने स्वयं इस पावन और ऐतिहासिक स्थल का भ्रमण कर इसकी अनुपम छटा का अवलोकन किया।

विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला ‘सीताबेंगरा’ और भित्तिचित्रों की भूमि ‘जोगीमारा’ का अवलोकन

समापन समारोह के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने विश्व की सबसे प्राचीनतम नाट्यशाला के रूप में वैश्विक ख्याति प्राप्त ‘सीताबेंगरा गुफा’ का अत्यंत सूक्ष्मता से अवलोकन किया। उन्होंने गुफा की अनूठी स्थापत्य शैली, ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक विशेषताओं की विस्तृत जानकारी वहां उपस्थित पुरातत्वविदों और प्रशासनिक अधिकारियों से प्राप्त की। इसके साथ ही उन्होंने समीप ही स्थित ‘जोगीमारा गुफा’ का भी भ्रमण किया, जो अपने तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के प्राचीन अभिलेखों, ऐतिहासिक शिलालेखों और अद्वितीय भित्तिचित्रों (मौर्यकालीन चित्रकला) की समृद्ध परंपरा के लिए जानी जाती है।

मुख्यमंत्री ने इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित प्रकृति के अनूठे चमत्कार ‘हाथीपोल’ नामक प्राकृतिक सुरंग को भी देखा और इस क्षेत्र की बेजोड़ प्राकृतिक धरोहर की सराहना की। इस गरिमामयी अवसर पर उनके साथ छत्तीसगढ़ सरकार के कृषि मंत्री रामविचार नेताम, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल सहित क्षेत्र के विभिन्न जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और भारी संख्या में गणमान्य नागरिक व श्रद्धालु उपस्थित रहे।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का वक्तव्य: “रामगढ़ की पावन धरा सरगुजा की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक चेतना, अद्भुत कला, गहरी आस्था और हमारे गौरवशाली इतिहास का एक जीवंत प्रतीक है। विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला के रूप में प्रसिद्ध यह स्थल वास्तव में संस्कृति, इतिहास, कालजयी साहित्य और प्रकृति का एक अलौकिक संगम है। हमारी सरकार छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट वैश्विक पहचान को और अधिक समृद्ध बनाने तथा यहां स्थानीय स्तर पर आजीविका के नए अवसर सृजित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”

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छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक अस्मिता का संरक्षण: सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी

जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस बात पर विशेष बल दिया कि छत्तीसगढ़ की पावन भूमि केवल खनिज और प्रचुर प्राकृतिक संपदा से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक विशिष्ट व अनूठी पहचान रखती है। उन्होंने कहा कि रामगढ़ जैसी ऐतिहासिक धरोहरें हमारी क्षेत्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव की अमूल्य अमूर्त निधि हैं। इन अमूल्य धरोहरों का मूल स्वरूप में संरक्षण करना और इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए संवर्धित करना हम सभी की सामूहिक सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि राज्य सरकार इन सभी पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से स्थापित करने के लिए निरंतर और ठोस कार्य योजना बनाकर कार्य कर रही है। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह है कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक छत्तीसगढ़ की इस अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से भली-भांति परिचित हो सकें। इसके साथ ही, पर्यटन गतिविधियों में बढ़ोतरी होने से स्थानीय ग्रामीण युवाओं, आदिवासियों और शिल्पकारों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे, जिससे उनकी आजीविका सुदृढ़ होगी।

महाकवि कालिदास की कालजयी कृति ‘मेघदूतम्’ और आषाढ़ के प्रथम दिवस की परंपरा

उल्लेखनीय है कि रामगढ़ पर्वत की पश्चिमी ढलान पर स्थित सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाओं को भारतीय इतिहास, मूर्तिकला, प्राचीन शिलालेख और चित्रकला की प्राचीनतम व अनुपम धरोहर माना जाता है। इतिहास और साहित्य में यह सर्वमान्य मान्यता है कि महाकवि कालिदास ने इन्हीं सुरम्य पहाड़ियों की प्राकृतिक सुंदरता से प्रेरित होकर अपनी अमर और कालजयी कृति ‘मेघदूतम्’ की रचना की थी। इस महान ग्रंथ का आरंभ प्रसिद्ध श्लोक ‘आषाढस्य प्रथमदिवसे’ (अर्थात आषाढ़ महीने का पहला दिन) से होता है।

इसी ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक स्मृति को जीवंत व अक्षुण्ण बनाए रखने के पावन उद्देश्य से जिला पुरातत्व संघ और सरगुजा जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में प्रतिवर्ष आषाढ़ के प्रथम दिवस पर इस भव्य दो दिवसीय ‘रामगढ़ महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष भी महोत्सव की शुरुआत स्थानीय परंपरा के अनुसार बादलों की पूजा-अर्चना के साथ हुई, जिसमें देश भर के जाने-माने विद्वानों, शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने हिस्सा लिया और अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

रामगढ़ की प्रमुख ऐतिहासिक और प्राकृतिक विशेषताएं

रामगढ़ का यह पूरा क्षेत्र अपने आप में कई ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और भौगोलिक रहस्यों को समेटे हुए है। मुख्य रूप से इस क्षेत्र को तीन बड़े आकर्षणों के लिए जाना जाता है:

धरोहर का नाम प्रमुख ऐतिहासिक एवं स्थापत्य विशेषताएं
सीताबेंगरा गुफा लगभग 44 फीट लंबी यह गुफा विश्व की प्राचीनतम प्राकृतिक नाट्यशाला (रंगमंच) मानी जाती है, जहां प्राचीन काल में नाटकों का मंचन होता था। इसका संबंध रामायणकालीन मान्यताओं से भी है।
जोगीमारा गुफा यह गुफा तीसरी से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मौर्यकालीन भित्तिचित्रों और प्राचीन ब्राह्मी लिपि के अभिलेखों के लिए विख्यात है। इसे भारतीय चित्रकला का उद्गम स्थल भी कहा जाता है।
हाथीपोल सुरंग यह लगभग 180 फीट लंबी और 15 से 20 फीट ऊंची एक विशाल प्राकृतिक सुरंग है। सदियों तक पहाड़ों के बीच से जल के अनवरत प्रवाह के कारण इसका यह अलौकिक स्वरूप विकसित हुआ है।

हाथीपोल: प्रकृति का अनूठा और रहस्यमयी स्थापत्य

रामगढ़ पर्वत की एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्भुत पहचान ‘हाथीपोल’ नामक प्राकृतिक सुरंग है। लगभग 180 फीट लंबी और 15 से 20 फीट ऊंची यह विशाल प्राकृतिक सुरंग अपनी अनूठी और विस्मयकारी भौगोलिक संरचना के कारण यहां आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का सबसे प्रमुख केंद्र बनी हुई है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि लाखों वर्षों तक पहाड़ी के भीतर से हुए प्राकृतिक जल प्रवाह के कारण इस सुरंग का वर्तमान स्वरूप स्वतः विकसित हुआ है। इस सुरंग के दूसरे छोर पर निकलते ही सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाओं का मार्ग प्रशस्त होता है, जो इस पूरे दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र को और अधिक रहस्यमयी, दर्शनीय, आकर्षक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।

धार्मिक, सांस्कृतिक और रामायणकालीन आस्था का केंद्र

रामगढ़ पर्वत के निचले और मध्य शिखरों पर स्थित इन कलात्मक और ऐतिहासिक गुफाओं का गहरा संबंध रामायणकालीन परंपराओं और भगवान श्री राम के वनवास काल से भी जोड़ा जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार, अपने वनवास काल के दौरान भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने इस स्थान पर कुछ समय व्यतीत किया था, जिसके कारण इस पूरे परिपथ को ‘रामवनगमन पर्यटन परिपथ’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। यही कारण है कि यह स्थल न केवल पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के लिए शोध का विषय है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए गहरी धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आस्था का एक महान केंद्र भी है। मुख्यमंत्री की 1 करोड़ रुपये की इस नई घोषणा से इस पूरे अंचल में हर्ष का माहौल है और आने वाले दिनों में रामगढ़ एक वैश्विक पर्यटन हब के रूप में उभरने के लिए तैयार है।


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