डिजिटल युग में पीला पोस्टकार्ड बना आदिवासियों की आवाज: ‘देवाभाऊ, हमें 18 वर्ष तक दें मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा’
ठाणे: जहां एक तरफ दुनिया 5G, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और पलक झपकते ही संदेश भेजने वाले स्मार्टफोन के दौर में जी रही है, वहीं महाराष्ट्र के सुदूर और दुर्गम आदिवासी पाड़ों (बस्तियों) में एक पुराना, शांत और बेहद आत्मीय माध्यम फिर से जी उठा है। यह माध्यम है—’पीला पोस्टकार्ड’। महाराष्ट्र के चार प्रमुख जिलों—ठाणे, पालघर, नाशिक और रायगड के हजारों आदिवासी बच्चों ने अपने हाथों में पेन और पोस्टकार्ड थामकर राज्य सरकार के खिलाफ एक अनोखा, शांतिपूर्ण और बेहद भावुक अभियान छेड़ दिया है।
इन मासूम बच्चों की मांग बेहद बुनियादी लेकिन भविष्य को बदलने वाली है। ये बच्चे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से गुहार लगा रहे हैं कि राज्य में हर बच्चे के लिए ‘मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा’ के अधिकार का दायरा बढ़ाकर उसे 18 वर्ष की आयु तक (यानी कक्षा 12वीं तक) कानूनी रूप से लागू किया जाए। वर्तमान में देश और राज्य में शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून केवल 14 वर्ष की आयु या कक्षा 8वीं तक ही मुफ्त शिक्षा की गारंटी देता है।
– शाहपुर के एक आदिवासी स्कूल के छात्र द्वारा पोस्टकार्ड पर लिखा संदेश
2 जुलाई की वो ऐतिहासिक सुबह: जब बक्सों और डाकघरों में उमड़ी बच्चों की भीड़
इस ऐतिहासिक और व्यापक जागरूकता अभियान की शुरुआत 2 जुलाई को हुई। इस दिन इन चार जिलों के हजारों गांवों, आश्रम शालाओं (आदिवासी आवासीय विद्यालयों) और जिला परिषद स्कूलों के बच्चे सुबह-सुबह अपने घरों से निकले। उनके चेहरों पर उम्मीदें थीं और हाथों में पीले रंग के पोस्टकार्ड।
इस अभियान की तस्वीरें बेहद भावुक और आंखें खोलने वाली थीं। कई क्षेत्रों में बच्चे अपने पास के स्थानीय डाकघरों में पहुंचे और सीधे पोस्टमास्टरों के हाथों में अपने पत्र सौंपे। जिन गांवों में डाकघर दूर थे, वहां बच्चों ने अपने-अपने स्कूलों में खुद ही सुंदर और रंग-बिरंगे कागजों से सजाए गए बक्से (Post Boxes) तैयार किए थे। बच्चों ने कतारों में लगकर, बड़ी ही संजीदगी के साथ अपने पत्रों को इन सजे हुए बक्सों में डाला। यह केवल एक पत्र नहीं था, बल्कि यह उनके बेहतर भविष्य, उनके सपनों और उनके अधिकारों का दस्तावेज था जिसे वे सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचाना चाहते थे।
‘श्रमजीवी संगठन’ की अनूठी पहल: हक की लड़ाई को मिला नया मंच
इस अभूतपूर्व और बड़े पैमाने पर आयोजित किए गए जागरूकता अभियान के पीछे आदिवासियों और हाशिए पर मौजूद समुदायों के अधिकारों के लिए दशकों से काम कर रहे सामाजिक संगठन ‘श्रमजीवी संगठन’ का हाथ है। संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने इन बच्चों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक किया और इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अपनी समस्याओं को लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से सीधे राज्य के मुखिया के सामने रखें।
संगठन के संस्थापक और वरिष्ठ आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता विवेक पंडित तथा संस्थापिका विद्युतलता पंडित के मार्गदर्शन में इस पूरे अभियान की रूपरेखा तैयार की गई थी। ठाणे जिले के शाहपुर तालुका से इस मुहिम का जोरदार शुभारंभ किया गया, जहां अकेले शाहपुर से ही लगभग 8,000 से अधिक विद्यार्थियों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को संबोधित करते हुए पत्र लिखे। संगठन का कहना है कि डिजिटल माध्यमों की तुलना में पोस्टकार्ड का एक अलग ही मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव होता है। जब मुख्यमंत्री कार्यालय में हजारों की संख्या में ये पीले पत्र पहुंचेंगे, तो सरकार को यह अहसास होगा कि यह मांग कितनी जमीनी और गंभीर है।
आखिर क्यों जरूरी है 18 वर्ष तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा?
वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था के तहत ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ (RTE, 2009) 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। लेकिन आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह कानून एक बड़ी खामी के रूप में सामने आता है।
1. 14 साल के बाद ‘ड्रॉपआउट’ का भयावह जाल
आदिवासी क्षेत्रों में जैसे ही बच्चा 14 साल की उम्र पार करता है (यानी कक्षा 8वीं पास करता है), उसके ऊपर से कानून का सुरक्षा कवच हट जाता है। गरीब आदिवासी परिवारों के पास आगे की पढ़ाई की फीस भरने, किताबें खरीदने या शहर के बड़े स्कूलों-कॉलेजों में भेजने के लिए पैसे नहीं होते। नतीजा यह होता है कि 14 साल के बाद आदिवासी बच्चों में स्कूल छोड़ने (Dropout) की दर अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाती है।
2. बाल श्रम और बाल विवाह की मजबूरी
पढ़ाई छूटने के बाद इन बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। लड़कों को अक्सर ईंट भट्टों, खेतों या होटलों में बाल मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वहीं, दूसरी ओर लड़कियों की सुरक्षा और आर्थिक तंगी के चलते उनके परिवार बेहद कम उम्र में ही उनका बाल विवाह कर देते हैं। यदि शिक्षा 18 वर्ष की आयु (यानी 12वीं कक्षा) तक मुफ्त और अनिवार्य कर दी जाए, तो ये बच्चे न केवल बाल श्रम और बाल विवाह से बचेंगे, बल्कि वे आत्मनिर्भर बनने की उम्र तक अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर सकेंगे।
3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के सिद्धांतों के अनुकूल
आदिवासी संगठनों का यह भी तर्क है कि केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में भी शिक्षा के ढांचे को 5+3+3+4 के रूप में पुनर्गठित करने की बात कही गई है, जिसमें 18 वर्ष की आयु तक की शिक्षा शामिल है। ऐसे में महाराष्ट्र सरकार को आगे बढ़कर इस दिशा में कानून बनाना चाहिए ताकि आदिवासी बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके।
चार जिलों की जमीनी हकीकत: एक नजर में
इस पोस्टकार्ड अभियान ने मुख्य रूप से महाराष्ट्र के उन चार जिलों को कवर किया है जहां आदिवासी आबादी काफी घनी है और जहां बुनियादी सुविधाओं तथा उच्च शिक्षा के संसाधनों की आज भी भारी कमी है:
| जिला | मुख्य आदिवासी क्षेत्र/तालुका | अभियान का मुख्य फोकस और जमीनी चुनौतियां |
|---|---|---|
| ठाणे | शाहपुर, मुरबाड | शहरी क्षेत्र के करीब होने के बावजूद सुदूर ग्रामीण इलाकों में उच्च माध्यमिक विद्यालयों (11वीं-12वीं) की भारी कमी। ड्रॉपआउट दर अधिक। |
| पालघर | जव्हार, मोखाडा, डहाणू, वाडा | कुपोषण और रोजगार के लिए पलायन एक बड़ी समस्या। पढ़ाई छूटने के बाद बच्चे माता-पिता के साथ ईंट भट्टों पर चले जाते हैं। |
| नाशिक | इगतपुरी, त्र्यंबकेश्वर, पेठ, सुरगाणा | पहाड़ी और दुर्गम रास्ते होने के कारण माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। मुफ्त परिवहन का अभाव। |
| रायगड | कर्जत, खालापूर, महाड (कातकरी जनजाति) | कातकरी जैसी अत्यंत पिछड़ी जनजातियों में साक्षरता दर बेहद कम। 14 वर्ष के बाद शिक्षा जारी रखना इनके लिए अत्यंत कठिन। |
‘देवाभाऊ’ से बच्चों की भावनिक साद: “आप ही हमारे तारणहार”
महाराष्ट्र की राजनीति और आम जनता के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अक्सर ‘देवाभाऊ’ के नाम से संबोधित किया जाता है। आदिवासी पाड़ों के इन बच्चों ने भी अपने पत्रों में इसी आत्मीय नाम का इस्तेमाल किया है। बच्चों ने बड़ी ही मासूमियत के साथ लिखा है कि आज के आधुनिक दौर में जहां अमीर बच्चे बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूलों और डिजिटल क्लासरूम में पढ़ रहे हैं, वहीं वे केवल एक सुरक्षित और मुफ्त स्कूली शिक्षा की मांग कर रहे हैं।
श्रमजीवी संगठन के कार्यकर्ताओं ने बताया कि कई गांवों में बच्चों ने खुद अपने स्तर पर रैलियां निकालीं, नारे लगाए और माता-पिता को भी इस मुहिम से जोड़ा। बच्चों का कहना है कि यदि सरकार उनकी इस मांग को मान लेती है, तो यह केवल उनके लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नया सवेरा लेकर आएगा।
आगे की राह और सरकार के सामने चुनौती
हजारों की संख्या में भेजे जा रहे ये पोस्टकार्ड अब सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) पहुंच रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों का मानना है कि यह अभियान सरकार की प्राथमिकताओं को परखने की एक बड़ी कसौटी है। शिक्षा के अधिकार का दायरा बढ़ाना सिर्फ एक नीतिगत फैसला नहीं है, बल्कि इसके लिए भारी बजटीय आवंटन, नए बुनियादी ढांचे के निर्माण और शिक्षकों की बड़े पैमाने पर भर्ती की आवश्यकता होगी।
लेकिन इन मासूम आदिवासी बच्चों ने यह साबित कर दिया है कि भले ही वे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े हों, लेकिन वे अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह सजग हैं। डिजिटल क्रांति के इस दौर में इन पीले पोस्टकार्डों की गूंज कितनी दूर तक जाती है और ‘देवाभाऊ’ इन आदिवासी बच्चों की इस भावनिक पुकार पर क्या कदम उठाते हैं, इस पर अब पूरे राज्य की निगाहें टिकी हुई हैं।














