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मध्य प्रदेश: नर्मदापुरम में ₹9 करोड़ का दूधी नदी पुल बना ‘शोपीस’, एप्रोच रोड गायब; कांग्रेस ने बोला BJP सरकार पर करारा हमला
भोपाल/नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के बुनियादी ढांचे और सरकारी कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया है। नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले के बनखेड़ी ब्लॉक स्थित उमरोध गांव के समीप दूधी नदी पर करीब 9 करोड़ रुपये (सटीक लागत ₹8.86 करोड़) खर्च करके एक विशाल फ्लाईओवर/पुल का निर्माण तो कर दिया गया, लेकिन विडंबना यह है कि इस पुल तक पहुंचने के लिए आज तक ‘एप्रोच रोड’ (पहुंच मार्ग) ही नहीं बनाई गई है।
पुल निर्माण को तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन एप्रोच रोड के अभाव में यह करोड़ों का ढांचा पूरी तरह बेकार और अनुपयोगी साबित हो रहा है। इस मुद्दे को लेकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने राज्य की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और प्रशासनिक लापरवाही तथा भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है।
कांग्रेस (INC) का आधिकारिक सोशल मीडिया बयान
1. क्या है दूधी नदी पुल का पूरा मामला?
प्राप्त आधिकारिक और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, नर्मदापुरम जिले के बनखेड़ी क्षेत्र अंतर्गत उमरोध गांव में दूधी नदी के ऊपर 308 मीटर लंबे पुल का निर्माण कराया गया था। इस पूरी परियोजना पर सरकारी खजाने से लगभग 8.86 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। पुल का निर्माण लोक निर्माण विभाग (पुल निर्माण/सेतु संभाग) द्वारा कराया गया था।
परियोजना का मुख्य उद्देश्य नर्मदापुरम और पड़ोसी जिले नरसिंहपुर के बीच सड़क संपर्क को सुगम बनाना था। इस पुल के चालू होने से दोनों जिलों के लगभग 40 से 50 गांवों की आबादी को सीधा लाभ मिलना था। विशेष रूप से ग्रामीण किसानों, विद्यार्थियों और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए यह पुल मील का पत्थर साबित हो सकता था।
2. तीन साल से क्यों अटका है रास्ता?
पुल का ढांचा पूरी तरह बनकर तैयार है, लेकिन इसके दोनों ओर लगभग 1 किलोमीटर का पहुंच मार्ग (Approach Road) गायब है। स्थिति यह है कि पक्का पुल हवा में अधर में लटका सा महसूस होता है क्योंकि उस पर चढ़ने के लिए कोई पक्की सड़क ही नहीं है।
बारिश के मौसम में नदी के दोनों किनारों के कच्चे रास्ते दलदल और कीचड़ में तब्दील हो जाते हैं। स्थानीय ग्रामीणों को रोजमर्रा के कार्यों के लिए जान जोखिम में डालकर गड्ढों, कीचड़ और उफनते नदी-नालों के बीच से गुजरना पड़ता है। ग्रीष्मकाल और शीतकाल में भी धूल और ऊबड़-खाबड़ रास्तों के कारण वाहनों की आवाजाही लगभग असंभव रहती है।
3. सरकारी विभागों के बीच तालमेल की कमी और प्रशासनिक हीलाहवाली
इस अजीबोगरीब मामले ने मध्य प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र में विभागों के बीच समन्वय की कमी को उजागर किया है। जब मीडिया और स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल किए गए, तो जवाब और भी चौंकाने वाले सामने आए:
- विभागों में खींचतान: पुल का निर्माण सेतु निर्माण विभाग द्वारा कराया गया, लेकिन एप्रोच रोड के निर्माण की जिम्मेदारी किस विभाग (लोक निर्माण विभाग, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, या अन्य) की होगी, इसका स्पष्ट निर्धारण ही समय पर नहीं किया गया।
- अधिकारियों का पक्ष: सेतु निर्माण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने एप्रोच रोड से संबंधित फाइल और प्रस्ताव शासन को स्वीकृत हेतु भेज दिए हैं। अब शासन स्तर से तय होगा कि बजट का आवंटन किस मद से किया जाएगा।
- योजना की खामी: सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या परियोजना की डीपीआर (Detailed Project Report) बनाते समय पुल और एप्रोच रोड को एक ही योजना में शामिल क्यों नहीं किया गया? करोड़ों रुपये की लागत से बिना रास्ते के पुल बना देना किस प्रकार की इंजीनियरिंग प्लानिंग का हिस्सा है?
4. कांग्रेस का तीखा हमला: ‘कमिशनखोरी और घपलेबाजी का मॉडल’
कांग्रेस पार्टी ने इस घटनाक्रम को लेकर मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और पिछली भाजपा सरकारों पर जमकर निशाना साधा है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा शासनकाल में जनसुविधाओं से अधिक ध्यान ठेकेदारी और कमिशनखोरी पर दिया जा रहा है।
कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि ठेकेदारों को भुगतान करने के उद्देश्य से पुल तो आनन-फानन में बना दिया गया ताकि बजट भुनाया जा सके, लेकिन चूंकि एप्रोच रोड में कोई बड़ा मार्जिन नहीं दिखा या प्रशासनिक उदासीनता रही, इसलिए जनता को तीन वर्षों से भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। कांग्रेस ने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।
5. ग्रामीणों की व्यथा: “इलाज के अभाव में चली जाती है जान”
दूधी नदी के आसपास बसे उमरोध, चांडौन, और आसपास के दर्जनों गांवों के निवासियों में भारी असंतोष व्याप्त है। ग्रामीणों का कहना है:
“हमारे गांव से नर्मदापुरम या नरसिंहपुर अस्पताल जाने के लिए यह पुल सबसे छोटा मार्ग है। लेकिन जब पुल पर चढ़ने का रास्ता ही नहीं है, तो हमें 15 से 20 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। बारिश के दौरान अगर किसी महिला को प्रसव पीड़ा हो या कोई गंभीर बीमार हो जाए, तो एम्बुलेंस गांव तक नहीं आ पाती। 9 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से खर्च होने के बाद भी हमारी किस्मत में वही कीचड़ और गड्ढे हैं।"
6. निष्कर्षण एवं आगे की राह
नर्मदापुरम का दूधी नदी पुल मामला भारतीय प्रशासनिक प्रणाली में रेड-टेपिज़्म (लालफीताशाही) और खराब टाउन-प्लानिंग का क्लासिक उदाहरण बन चुका है। करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति का तीन साल तक अनुपयोगी रहना सीधे तौर पर करदाताओं के पैसे की बर्बादी है।
विपक्ष के हमलों और मीडिया कवरेज के बाद अब देखना यह होगा कि मध्य प्रदेश शासन और लोक निर्माण विभाग इस मामले में कितनी तत्परता से संज्ञान लेते हैं और कब तक दूधी नदी पुल को एप्रोच रोड का सहारा देकर 50 गांवों के निवासियों के लिए चालू किया जाता है।












