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Radha Ashtami: बेपनाह प्रेम के बावजूद भगवान कृष्ण ने राधा के साथ क्यों नहीं किया था विवाह, राधा और रुक्मणी में क्या थी समानताएं

Radha Ashtami: बेपनाह प्रेम के बावजूद भगवान कृष्ण ने राधा के साथ क्यों नहीं किया था विवाह, राधा और रुक्मणी में क्या थी समानताएं

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी (Radha Ashtami 2021) का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये तिथि 14 सितंबर, मंगलवार को है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधा रानी की पूजा की जाती है। वैसे तो हमारे देश में राधा देवी के अनेक मंदिर हैं, मगर इन सभी में उत्तर प्रदेश के बरसाना में स्थित राधा रानी का मंदिर सर्वप्रमुख है।

Radha Ashtami: बरसाना की पहाड़ी पर स्थित है राधा रानी का प्राचीन मंदिर, इससे जुड़ी हैं कई रोचक बातें

राधा को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणी से भगवान कृष्ण की शादी हुई. राधा और रुक्मणी यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी की ही अंश हैं.

मौजूदा समय में भगवान कृष्ण और राधा रानी के कई मंदिर मिल जाएंगे. मथुरा के वृंदावन में राधा रानी का भव्य मंदिर है. भगवान कृष्ण के नाम के साथ हमेशा राधा का ही नाम जोड़ा जाता है. अब सवाल यह उठता है कि जब श्रीकृष्ण के जीवन में राधा इतनी महत्वपूर्ण थीं तो उन्होंने राधा से विवाह क्यों नहीं किया? आज हम यहां राधा रानी के बारे में कुछ अद्भुत जानकारी देंगे, जिसके बारे में आप शायद ही जानते होंगे.

कहां हुआ था राधा का जन्म और विवाह
राधा रानी का जिक्र महाभारत और भागवत पुराण में नहीं मिलता है. राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है. पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं. ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा, कृष्ण की मित्र थीं और उनका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था. कुछ विद्वान मानते हैं कि राधा रानी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए थे. लेकिन ज्यादातर जानकार मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था. राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है. बरसाना में राधा को ‘लाडली’ कहा जाता है.

ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार राधा, श्रीकृष्ण की मामी थीं क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था. ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के 5वें अध्याय में श्लोक 25, 26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है.

राधा के पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप थे. अत: गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुईं. माना जाता है कि गोकुल में रायाण रहते थे. मतलब यह कि राधा का श्रीकृष्ण से पिछले जन्म का भी रिश्ता है. यहां भी उन्हें माता लक्ष्मी का रूप माना जाता है.

रुक्मणी ही राधा थीं या राधा नाम की कोई महिला ही नहीं थी
कुछ विद्वान मानते हैं कि राधा नाम की कोई महिला ही नहीं थी. रुक्मणी ही राधा थीं. राधा और रुक्मणी दोनों ही कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं. श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मणी यानी राधा से ही हुआ था. पुराणों के अनुसार देवी रुक्मणी का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था. देवी राधा, वह भी अष्टमी तिथि को ही अवतरित हुई थीं. राधा के जन्म और देवी रुक्मणी के जन्म में एक अंतर यह है कि देवी रुक्मणी का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधा रानी का जन्म शुक्ल पक्ष में हुआ था. राधा रानी के जन्म दिवस को राधा अष्टमी या राधाष्टमी के नाम से जाना जाता है. इस वर्ष राधाष्टमी मंगलवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी.

राधा को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणी से भगवान कृष्ण की शादी हुई. राधा और रुक्मणी यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी की ही अंश हैं.

माना जाता है कि मध्यकाल या भक्तिकाल के कवियों ने राधा-कृष्ण के वृंदावन के प्रसंग का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया. राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की. इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत भी मध्यकाल में हुई. उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी. दक्षिण के आचार्य निम्बार्क जी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया था. ऐसा भी कहा जाता है कि जयदेव ने पहली बार राधा का जिक्र किया था और उसके बाद से श्रीकृष्ण के साथ राधा का नाम जुड़ा हुआ है. इससे पहले राधा नाम का कोई जिक्र नहीं था.

राधा-कृष्ण का सांकेतिक स्थल पर मिलन और विवाह
ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार और यदुवंशियों के कुलगुरु गर्ग ऋषि द्वारा लिखित गर्ग संहिता की एक कथा के अनुसार कृष्ण और राधा का विवाह बचपन में ही हो गया था. कहते हैं कि एक बार नंदबाबा श्रीकृष्ण को लेकर बाजार घूमने निकले थे, तभी उन्होंने एक सुंदर और अलौकिक कन्या को देखा. वह कन्या कोई और नहीं बल्कि राधा ही थीं. कृष्ण और राधा ने वहां एक-दूसरे को पहली बार देखा था. दोनों एक-दूसरे को देखकर मुग्ध हो गए थे. जहां राधा और कृष्ण पहली बार मिले थे, उसे संकेत तीर्थ कहा जाता है, जो संभवत: नंदगांव और बरसाने के बीच है. इस स्थान पर आज एक मंदिर है. इसे संकेत स्थान कहा जाता है. मान्यता है कि पिछले जन्म में ही राधा और कृष्ण ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है. यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है.

गर्ग संहिता के अनुसार एक जंगल में स्वयं ब्रह्मा जी ने राधा और कृष्ण का गंधर्व विवाह करवाया था. श्रीकृष्ण के पिता उन्हें अकसर पास के भंडिर ग्राम में ले जाया करते थे. वहां उनकी मुलाकात राधा से होती थी. एक बार की बात है कि जब वे अपने पिता के साथ भंडिर गांव गए तो अचानक तेज रोशनी चमकी और मौसम बिगड़ने लगा. कुछ ही समय में आसपास सिर्फ और सिर्फ अंधेरा छा गया. इस अंधेरे में एक पारलौकिक शख्सियत का अनुभव हुआ. वह राधा रानी के अलावा और कोई नहीं थी. अपने बाल रूप को छोड़कर श्रीकृष्ण ने किशोर रूप धारण कर लिया और इसी जंगल में ब्रह्माजी ने विशाखा और ललिता की उपस्थिति में राधा-कृष्ण का गंधर्व विवाह करवा दिया. विवाह के बाद माहौल सामान्य हो गया तथा राधा, ब्रह्मा, विशाखा और ललिता अंतर्ध्यान हो गए.

असल में इस वास्तविक घटना को अलंकृत कर दिया गया है. राधा सचमुच ही कृष्ण से बड़ी थीं और सामाजिक दबावों के चलते यह संभव नहीं था कि उम्र में कहीं बड़ी लड़की से विवाह किया जाए. लेकिन यदि दोनों के बीच प्रेम रहा होगा तो निश्चित ही गुपचुप रूप से गंधर्व विवाह किया गया हो और इस बात को छिपाए रखा गया हो.

इस बार 14 सितंबर, मंगलवार को राधा अष्टमी है। उत्तर प्रदेश के बरसाना में स्थित राधा रानी मंदिर पूरी तरह से देवी राधा को समर्पित है। यह स्थान कृष्ण के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। राधा रानी मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 250 मीटर है। वास्तव में इस मंदिर का इतिहास बहुत ही रोचक है और इससे जुड़ी कई धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इस मंदिर को बरसाने की लाड़ली का मंदिर और राधा रानी का महल भी कहा जाता है। आगे जानिए इस मंदिर से जुड़ी खास बातें…

मंदिर का इतिहास, संरचना और खास बातें…
– मान्यता है कि राधा रानी मंदिर मूल रूप से लगभग 5000 साल पहले राजा वज्रनाभ ( श्रीकृष्ण के वशंज) द्वारा स्थापित किया गया था। बाद में ये मंदिर खंडहर में बदल गया था। तब प्रतीक नारायण भट्ट द्वारा फिर से इसे खोजा गया और 1675 ईस्वी में राजा वीर सिंह द्वारा एक मंदिर बनाया गया था।
– बाद में, मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण नारायण भट्ट ने राजा टोडरमल की मदद से किया था। मंदिर के निर्माण के लिए लाल और सफेद पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, जो राधा और श्री कृष्ण के प्रेम का प्रतीक माने जाते हैं। राधा रानी के पिता का नाम वृषभानु और माता का नाम कीर्ति था।
– राधा रानी का जन्म जन्माष्टमी (Radha Ashtami 2021) के 15 दिन बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था। इसलिए बरसाना के लोगों के लिए यह जगह और दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन राधा रानी के मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। राधा रानी को छप्पन प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं।
– इस मंदिर में 200 से अधिक सीढ़ियां हैं जो जमीन से मुख्य मंदिर की ओर जाती हैं। इस मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों के तल पर वृषभानु महाराज का महल है, जहां वृषभानु महाराज, कीर्तिदा (राधा की माँ), श्रीदामा (राधा की सहोदर) और श्री राधिका की मूर्तियां हैं। इस महल के पास ही ब्रह्मा जी का मंदिर भी स्थित है।
– इसके अलावा, पास में ही अष्टसखी मंदिर है जहां राधा और उनकी प्रमुख सखियों की पूजा की जाती है। चूंकि मंदिर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है इसलिए मंदिर के परिसर से पूरे बरसाना को देखा जा सकता है।

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