Advertisement

पारिवारिक न्यायालयों में लंबित 11.4 लाख से अधिक मामलों का शीघ्र निपटारा किया जाना चाहिए: लोकसभा सांसद

पारिवारिक न्यायालयों में लंबित 11.4 लाख से अधिक मामलों का शीघ्र निपटारा किया जाना चाहिए: लोकसभा सांसद

नयी दिल्ली, 26 जुलाई (भाषा) लोकसभा सांसदों ने मंगलवार को कहा कि देश भर की पारिवारिक अदालतों में 11.4 लाख से अधिक मामले लंबित हैं और उनके शीघ्र निपटारे का आह्वान किया।

यह मुद्दा लोकसभा में फैमिली कोर्ट (संशोधन) विधेयक, 2022 पर एक बहस के दौरान आया, जिसे कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने विचार के लिए पेश किया था।

चर्चा में भाग लेते हुए जनता दल (यूनाइटेड) के कौशलेंद्र कुमार ने कहा कि पारिवारिक अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है और यह 11.4 लाख से अधिक है। उन्होंने मामलों के शीघ्र निपटारे की मांग की।

बीजू जनता दल के भर्तृहरि महताब ने भी उनके विचारों को प्रतिध्वनित किया और कहा कि सरकार को कहना चाहिए कि वह पारिवारिक अदालतों में लंबित मामलों को निपटाने के लिए क्या कर रही है।

“देश में 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 715 फैमिली कोर्ट हैं… कानून बदलने और इसे लागू करने में संसद सर्वोच्च है लेकिन व्याख्या अदालतों द्वारा की जाएगी। कौन सी अदालत तय करेगी कि आवेदन पूर्वव्यापी होगा। भी निर्धारित किया जाना चाहिए,” उन्होंने कहा।

महताब ने पूछा कि जब ऐसी अदालतें खोली जा रही हैं, तो क्या यह पता लगाना केंद्र का कर्तव्य नहीं है कि कोई अधिसूचना हुई है या नहीं।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सुनीता दुग्गल ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि पारिवारिक अदालतों में और नियुक्तियां की जानी चाहिए ताकि मामलों का तेजी से समाधान हो सके।

Gemini_Generated_Image_fohysbfohysbfohy
WhatsApp-Image-2026-03-12-at-6.48.17-PM-1-298x300 (1)
sjjj

पारिवारिक न्यायालय अधिनियम 1984 में सुलह को बढ़ावा देने और विवाह और पारिवारिक मामलों से संबंधित विवादों के त्वरित निपटान को सुरक्षित करने के लिए पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना के लिए अधिनियमित किया गया था। 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 715 फैमिली कोर्ट काम कर रहे हैं।

नागालैंड में 2008 में दो फैमिली कोर्ट और 2019 में हिमाचल प्रदेश में तीन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा जारी अधिसूचनाओं के माध्यम से स्थापित किए गए थे।

हिमाचल प्रदेश में पारिवारिक न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र की कमी का मुद्दा पिछले साल हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की कार्यवाही के दौरान सामने आया था।

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में एक अन्य याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने परिवार न्यायालय अधिनियम को हिमाचल प्रदेश तक विस्तारित करने वाली कोई अधिसूचना जारी नहीं की थी और राज्य सरकार को ऐसी अदालतें स्थापित करने के निर्देश बिना किसी कानूनी अधिकार के थे।

नागालैंड में पारिवारिक अदालतें भी 2008 से बिना किसी कानूनी अधिकार के चल रही थीं।

फैमिली कोर्ट (संशोधन) बिल हिमाचल प्रदेश में 15 फरवरी, 2019 से और नागालैंड में 12 सितंबर, 2008 से फैमिली कोर्ट की स्थापना के लिए धारा 1 की उप-धारा 3 में एक प्रावधान डालने का प्रयास करता है।

विधेयक में हिमाचल प्रदेश और नागालैंड की सरकारों और उन राज्यों की पारिवारिक अदालतों द्वारा किए गए उक्त अधिनियम के तहत सभी कार्यों को पूर्वव्यापी रूप से मान्य करने के लिए एक नई धारा 3 ए सम्मिलित करने का भी प्रयास किया गया है।

पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना और उनके कामकाज संबंधित उच्च न्यायालयों के परामर्श से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

file_0000000093d882119d122d54d9d757b5
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.12.06
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.38
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.39
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.39 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.40
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.40 (1)
WhatsApp-Image-2026-08-15-at-00.21.47