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नगरी निकायों में अध्यक्षों से वित्तीय अधिकार वापस लेना अलोकतांत्रिक

नगरी निकायों में अध्यक्षों से वित्तीय अधिकार वापस लेना अलोकतांत्रिक

भारतीय जनता पार्टी की साय सरकार चुने हुये जनप्रतिनिधियों के अधिकारों को हनन  कर रही हैं। दुर्भाग्यजनक है कि लोकतांत्रिक प्रणाली से चुनकर सरकार में बैठे हुये लोग प्रजातांत्रिक तरीके से चुने हुये जनप्रतिनिधियों के अधिकारों में कटौती कर रहे है। कल ही सरकार की ओर से राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित की गयी है, जिसके अनुसार अब नगर पालिका, नगर पंचायतों में अध्यक्षों को चेक पर हस्ताक्षर करने के अधिकार को वापस ले लिया। यह अधिकार अब मुख्य नगर पालिका अधिकारी को दे दिया गया है। प्रदेश के अधिकांश निकायों में कांग्रेस के अध्यक्ष चुनकर आये है। इसलिये दुर्भावना पूर्वक सरकार ने यह निर्णय लिया है।

कांग्रेस की सरकार ने जन प्रतिनिधियों को अधिकार संपन्न बनाने उनको वित्तीय अधिकार दिया था, लेकिन भाजपा सरकार ने इसे वापस ले लिया। कांग्रेस मांग करती है कि इस अधिसूचना को रद्द किया जाये तथा जनप्रतिनिधियों के वित्तीय अधिकार को बहाल किया जाये।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने पत्रकारों से चर्चा करते हुये कहा कि आज हम पांच महत्वपूर्ण विषयां पर आप सबसे बात करने उपस्थित हुये है। बिजली के दामो की बढ़ोतरी, नगरी निकायो के अध्यक्षो के वित्तीय अधिकार की वापसी, आवारा पशुओ की समस्या, 14 अगस्त को संविधान यात्रा, विश्व आदिवासी दिवस पर नवीन आरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर विषय पर चर्चा करेंगे।

एक सप्ताह से अधिक दिनों से राज्य की स्टील ईकाईयां बंद है जिसके कारण इन ईकाईयों में काम करने वाले 2 लाख से अधिक मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों और इन उद्योगो से जुड़े अन्य लोगो के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

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समाचार माध्यमों से हमें जानकारी मिली है कि उद्योगो के प्रतिनिधि लगातार सरकार से अपनी मांग मानने के लिये आग्रह कर रहे हैं, लेकिन सरकार हठधर्मिता पर अडी हुई है।

7 माह की भाजपा सरकार ने न सिर्फ उद्योगो, आम आदमी की बिजली के दामो को बढ़ा दिया है। लोहा उद्योग छत्तीसगढ़ की रीढ़ है और उनकी बिजली महंगी करना विष्णुदेव सरकार गलत निर्णय है।

घोषित तौर पर सरकार का दावा है कि 8 प्रतिशत घरेलू बिजली के दाम बढ़े हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले दो माह से सभी के घर का बिजली बिल दुगुना आ रहा है।

छत्तीसगढ़ जो देश के बड़े उर्जा उत्पादक राज्यों में से एक है, वही के नागरिको और उद्योगो को महंगी बिजली खरीदने को मजबूर होना पड़ा रहा है। कोयला हमारा, जमीन हमारी, पानी हमारा और हमें ही महंगे दाम पर बिजली?

उद्योगो की बिजली के दामो की पडोसी राज्यों से तुलना करे तो ओडिशा, जो सबसे अधिक इस्पात का उत्पादन करता है, उसकी बिजली दर लगभग 5 रूपये 10 पैसा से 5 रूपये 30 पैसा है। पश्चिम बंगाल, जो तीसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक राज्य है, उसकी बिजली दर 5 रूपये है। झारखंड और जिंदल पार्क, जो अन्य प्रमुख इस्पात उत्पादक क्षेत्र है, उनकी बिजली दर भी 5 रूपये है। छत्तीसगढ़ जो दूसरा सबसे इस्पात उत्पादक राज्य है, यहां की बिजली दर 7 रूपये 62 पैसा से 8 रूपये 50 पैसा है।

महंगी बिजली के साथ भाजपा सरकार आने के बाद से जनता को पूरे 24 घंटे बिजली नहीं मिल रही है। पूरे प्रदेश में अघोषित बिजली कटौती हो रही है। 7 माह में विद्युत सरप्लस वाला छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कटौती का केंद्र बन गया है। कोई ऐसा दिन नहीं होता जब बिजली दो-चार घंटे के लिये बंद न हो, रात में तो बिजली की स्थिति तो और भयावह हो जाती है, घंटो बिजली गोल हो जाती है।

कांग्रेस पार्टी मांग करती है कि सरकार घरेलू एवं उद्योगो कृषि के बिजली के दामों की बढ़ोत्तरी वापस ले।

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