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झारखंड के मतदाताओं ने गोगो दीदी योजना को छोड़ मईयां सम्मान योजना को चुना

झारखंड के मतदाताओं ने गोगो दीदी योजना को छोड़ मईयां सम्मान योजना को चुना

झारखण्ड की सत्ता में किसी सरकार का वापसी करना झारखंड के इतिहास में पहली बार हाे रहा है।झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमाे) के नेतृत्व में इंडी गठबंधन ने झारखंड विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज की है। झामुमो और इंडी गठबंधन की जीत का जो सबसे बड़ा फैक्टर माना जा रहा है, वह है मंईयां सम्मान योजना।

मंईयां सम्मान योजना के तहत महिलाओं को 1000 रुपये दिए जा रहे हैं, जो दिसंबर महीने से 2500 रुपये दिए जाएंगे। इस योजना ने महिलाओं को काफी प्रभावित किया। झारखंड में कई विधासभा सीटों में महिलाओं की वोटिंग अधिक रही। इन महिलाओं ने एनडीए की ‘गोगो दीदी योजना’ को छोड़कर हेमंत की ‘मईयां सम्मान योजना’ को खूब पंसद किया और हेमंत सोरेन के सिर पर दुबारा जीत का सेहरा बांध दिया। इस जीत के अगुआ हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन को माना जा रहा है। इन दोनों ने ही पूरे चुनाव प्रचार का जिम्मा अपने कंधों पर उठा रखा थी।

हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने मिलकर 200 से अधिक सभाएं की। इन्होंने झामुमो उम्मीदवारों के साथ-साथ कांग्रेस और राजद उम्मीदवारों के लिए भी प्रचार किया। इन दोनों ने सभी 81 विधानसभा सीटों पर सभा किया और ये बताने में कामयाब रहे कि बीजेपी ने हेमंत को परेशान किया है और झूठे केस में जेल भेजा है। झारखंड चुनावों से पहले हेमंत सोरेन ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक केस में गिरफ्तार कर लिया।

हेमंत कि गिरफ्तारी के बाद झामुमो ने इसे मुद्दा बनाया और लोगों को ये मैसेज देने का प्रयास किया कि एक आदिवासी मुख्यमंत्री होने के नाते प्रताड़ित किया जा रहा है। झामुमो विक्टिम कार्ड खेलती रही, जिसने कहीं ना कहीं वोटरों को प्रभावित किया। इसके अलावा हेमंत के जेल जाने से उनके खिलाफ लोगों में जो एंटइनकमबेंसी था वह भी कम हो गया और सहानुभूति का फायदा हेमंत सोरेन को हुआ। हेमंत ने अपने पोस्टरों में भी अपने हाथ में जेल का लगा स्टैंप दिखाया था।

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झारखंड में झामुमो का सबसे बड़ा वोट बैंक आदिवासी और मुस्लिम को माना जाता है। आदिवासियों को हेमंत सोरेन ये समझाने में कामयाब रहे कि उन्हें आदिवासी होने के नाते परेशान किया गया। हेमंत की बातों से आदिवासी कनेक्ट हुए और आदिवासी बहुल इलाकों में झामुमो ने शानदार प्रदर्शन किया। इस रिजल्ट के बाद एक बार फिर से ये कहा जा सकता है कि आदिवासियों में झामुमो की पकड़ को कोई भी कमजोर नहीं कर सकता है।

भाजपा का नारा ‘बंटोगे तो कटोगे और एक हैं तो सेफ हैं’ का नारा बैक फायर कर गया। भाजपा ने संथाल क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठ, डेमोग्राफी चेंज और रोटी बेटी माटी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। पूरे चुनाव में भाजपा का जोर बांग्लादेशी घुसपैठ और आदिवासियों लड़कियों से उनकी शादी के बाद जमीन कब्जे पर रही। झामुमो लगातार लोगों को ये बताने की कोशिश करती रही है कि भाजपा लोगों को बांट रही है। इसके अलावा झामुमो के कई नेताओं ने ये भी बताया कि झारखंड की सीमा बांग्लादेश से नहीं लगती, इसलिए किसी भी तरह की घुसपैठ के लिए झारखंड सरकार जिम्मेदार नहीं है। इसका उल्टा असर ये हुआ कि मुस्लिम वोट भाजपा से पूरी तरह से कट गए। दूसरी तरफ, आदिवासियों सेंटिमेट पहले से हेमंत की तरफ था। ऐसे में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सीता सोरेन और चंपाई सोरेन को झामुमो से तोड़कर भाजपा में लाना उनके लिए नुकसानदायक रहा। एक तो भाजपा के अपने कैडर के लोग नाराज हुए, दूसरे आदिवासियों में मैजेस गया कि भाजपा हेमंत सोरेन की पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रही है और हेमंत सोरेन को खत्म करना चाहती है। इसके अलावा लोगों में ये भी संदेश किया कि भाजपा किसी भी तरह सत्ता पाना चाहती है।

हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद कल्पना सोरेन पार्टी में एक्टिव हुईं। वे पार्टी के लोगों से मिलने लगीं, सभा करने लगी। इसके बाद उन्हें गांडेय के उपचुनाव में उतारा गया, जहां से उन्होंने जीत हासिल की। सिर्फ पांच महीने बाद ही विधानसभा चुनाव हुए इसमें अकेले कल्पना ने 100 से ज्यादा सभाएं की। लोगों को इनके बोलने का अंदाज, आम लोगों से मिलने का तरीका और संवाद पसंद आया। कल्पना से सभाओं में भारी भीड़ दिखती थी। कल्पना ने महिला वोटरों को टारगेट किया और उनसे लगातार मिलती रहीं और इसमें कल्पना काफी हद तक कामयाब भी रहीं।

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