विश्व पृथ्वी दिवस पर तुलसी साहित्य समिति की काव्यगोष्ठी: ‘धरती को मां कहते हैं, तो सुन्दर इसे बनाना है’

विश्व पृथ्वी दिवस पर सरगर्मी से गूंजी कविताएं, पर्यावरण बचाने का लिया संकल्प
तुलसी साहित्य समिति की सरस काव्यगोष्ठी में कवियों ने दिया प्रकृति-संरक्षण का संदेश

file_000000000ae07206b6dd6cb6073112cd
WhatsApp Image 2026-03-12 at 6.47.26 PM (1)
file_000000009a407207b6d77d3c5cd41ab0

अम्बिकापुर।विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर तुलसी साहित्य समिति द्वारा केशरवानी भवन में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर यादव विकास ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता और पीजी कॉलेज अम्बिकापुर के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ब्रह्माशंकर सिंह उपस्थित थे। विशिष्ट अतिथियों में उपभोक्ता अधिकार संगठन के प्रदेश अध्यक्ष पंडित चन्द्रभूषण मिश्र ‘मृगांक’, केके त्रिपाठी और वरिष्ठ व्याख्याता सच्चिदानंद पांडेय शामिल रहे। संचालन संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष कवयित्री माधुरी जायसवाल ने किया।

गोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती की पारंपरिक वंदना और पूजन से हुआ। महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस और सरगुजिहा रामायण का संक्षिप्त पाठ किया गया। गीतकार कृष्णकांत पाठक ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर समां बांध दिया।

मुख्य अतिथि ब्रह्माशंकर सिंह ने पृथ्वी को माता बताते हुए कहा कि मनुष्य ने प्रकृति का अत्यधिक दोहन कर लिया है, जिससे पर्यावरण असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई है। उन्होंने चेताया कि यदि समय रहते हम नहीं चेते तो पृथ्वी का भविष्य संकट में पड़ सकता है।

कवयित्री माधुरी जायसवाल ने कविता के माध्यम से मातृभूमि को बचाने का आह्वान किया— “धरती को मां कहते हैं, तो सुंदर इसे बनाना है।” कवयित्री आशा पांडेय ने पृथ्वी की पीड़ा को स्वर देते हुए कहा— “जलती धरती मांग रही है, मेरा हक मुझको दे दो।” उन्होंने अपने दोहे में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर चिंता जताई।

66071dc5-2d9e-4236-bea3-b3073018714b
hotal trinetra
gaytri hospital
WhatsApp Image 2026-05-10 at 2.46.41 PM (1)

कवयित्री अंजू प्रजापति ने मानव की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करते हुए लिखा— “कटते रहे हर मोड़ पर, हम चुपचाप खड़े रहे।” वहीं, स्वाति टोप्पो ने जल स्रोतों के महत्व को खूबसूरती से रेखांकित किया। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर ने “एक पीपल सड़क किनारे, एक आंगन में तुलसी…” जैसी पंक्तियों से वृक्षारोपण का महत्व समझाया।

वरिष्ठ कवयित्री पूनम दुबे ‘वीणा’ ने मानवता को एक डाल के फूल बताते हुए प्रेम और सहयोग का संदेश दिया। युवा कवि अम्बरीश ‘अम्बुज’ ने देशभक्ति पर आधारित कविता में कहा— “तुम अपनी जान भी खतरे में डालो वतन खातिर…”

कविवर प्रकाश कश्यप की ग़ज़ल में मानवीय गिरावट का चित्रण हुआ— “आदमी जो मार के ज़मीर…” वहीं चन्द्रभूषण ‘मृगांक’ ने बदलते युग में संवेदनाओं के क्षरण पर दुख जताया।

शायर-ए-शहर यादव विकास ने अपनी प्रेरक ग़ज़लों से महफिल को जीवंत कर दिया— “आप इस शहर में नहीं होते, तो ये शहर बसा नहीं होता।” अंत में संस्था के अध्यक्ष मुकुंदलाल साहू ने सभी से धरती रूपी कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध लड़ने का आह्वान किया— “तुम ही अर्जुन हो सखे, तुम्हीं कृष्ण भगवान।”

कार्यक्रम में लीला यादव, दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव, प्रमोद, आनंद सिंह यादव सहित कई काव्यप्रेमी उपस्थित रहे। आयोजन को सफल बनाने में केशरवानी वैश्य सभा के अध्यक्ष ताराचंद गुप्ता और उपाध्यक्ष मनीलाल गुप्ता का योगदान सराहनीय रहा।