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अखिलेश यादव का आरोप: मनरेगा नाम बदलना भाजपा की “ख़त्म करने” की साज़िश

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर आरोप लगाया कि मनरेगा का नाम बदलना दरअसल इसे धीरे-धीरे समाप्त करने की उनकी रणनीति है। उन्होंने बजट में कटौती, राज्य पर वित्तीय दबाव और ग्राम सभाओं को ‘अर्बन कैटेगरी’ में डालने को इसके मुख्य कारण बताया।

अखिलेश यादव का आरोप – मनरेगा का नाम बदलना भाजपा की “ख़त्म करने” की साज़िश

लखनऊ: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) का नाम बदलने की हालिया पहल दरअसल इसे धीरे-धीरे समाप्त करने की गोपनीय साज़िश है। अखिलेश यादव का यह बयान राजनीतिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि मनरेगा भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन का एक प्रमुख स्तंभ रहा है।

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मनरेगा योजना का उद्देश्य ग्रामीण भारत में रोजगार सुनिश्चित करना और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना है। 2005 में शुरू की गई यह योजना ग्रामीण परिवारों को वार्षिक न्यूनतम 100 दिन का रोजगार प्रदान करती है। योजना का प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्रामीण बुनियादी ढांचे, जल संरक्षण, सड़क निर्माण और सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल जैसी गतिविधियों में भी योगदान मिलता है।

अखिलेश यादव का कहना है कि मनरेगा को कमजोर करने का असर सीधे तौर पर गरीब ग्रामीणों और किसानों पर पड़ेगा। योजना के तहत उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता कम होगी, जिससे उनका जीवनयापन कठिन हो जाएगा।

अखिलेश यादव के मुख्य आरोप

अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर तीन मुख्य बिंदुओं के आधार पर आरोप लगाए हैं:

  1. बजट में लगातार कटौती:
    उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार हर साल मनरेगा का बजट कम कर रही है। इस कटौती का असर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस कदम से योजना के मूल उद्देश्य पर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
  2. राज्यों पर वित्तीय दबाव:
    यादव ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने राज्यों पर इतना दबाव डाल दिया है कि वे ‘जीएसटी सिस्टम’ के तहत मिलने वाले केंद्रीय फंड के अभाव में मनरेगा के लिए अतिरिक्त बजट नहीं जुटा पाएंगे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इस दबाव के कारण कई राज्य पहले से ही खाली ख़ज़ाने से जूझ रहे हैं और इसके परिणामस्वरूप वे मनरेगा जैसी योजनाओं को समाप्त करने के लिए मजबूर होंगे।
  3. ग्राम सभाओं को ‘अर्बन कैटेगरी’ में डालना:
    तीसरा आरोप यह है कि भाजपा सरकार ने सैकड़ों ग्राम सभाओं को अर्बन कैटेगरी में डालकर उनके लिए मिलने वाले बजट को कम कर दिया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और विकास कार्य प्रभावित होंगे और मनरेगा की प्रभावशीलता कम होगी।

अखिलेश यादव ने कहा, “सही मायनों में मनरेगा का नाम बदलना ही नहीं बल्कि उसका ‘राम-राम’ करना ही भाजपा का लक्ष्य है।” उनका कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि गरीब और ग्रामीण समुदायों के हितों पर हमला है।

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अखिलेश यादव का यह बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष का मानना है कि भाजपा सरकार की यह पहल ग्रामीण विकास और सामाजिक न्याय के लिए खतरा है। सपा अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा केवल अपने समर्थकों के लिए योजनाओं को सुरक्षित रखना चाहती है और गरीब वर्ग को इससे बाहर करने की कोशिश कर रही है।

यादव ने कहा कि अगर मनरेगा जैसी योजनाओं को कमजोर किया गया तो इसका सीधा असर उन ग्रामीण परिवारों पर पड़ेगा जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के कदम से सामाजिक असमानता और गरीबी बढ़ सकती है।

विश्लेषकों का कहना है कि मनरेगा जैसे योजनाओं का केवल नाम बदलना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बजट बढ़ाना, वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना और ग्रामीण क्षेत्रों में योजना के प्रभाव को बढ़ाना आवश्यक है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर सरकार मनरेगा का नाम बदलने के साथ-साथ इसके बजट और कार्यान्वयन में कटौती करती है, तो ग्रामीण भारत की सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा। इस दृष्टि से विपक्ष के आरोपों में राजनीतिक और सामाजिक महत्व दोनों ही हैं।

मनरेगा योजना ग्रामीण भारत में रोजगार और आर्थिक स्थिरता का आधार रही है। योजना के तहत लोग सड़क निर्माण, जल संरक्षण, कृषि सम्बन्धी कार्य और सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल जैसे कार्य करते हैं।

यदि योजना कमजोर होती है या इसका बजट कम किया जाता है, तो ग्रामीण लोगों को मिलने वाला रोजगार घट जाएगा। इससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होगी और ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ सकती है।

अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि भाजपा केवल अपने समर्थकों को लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रही है। उनका कहना है कि गरीब और कमजोर वर्ग की सुरक्षा के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं को मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने जनता से भी अपील की कि वे इस मुद्दे पर सतर्क रहें और अपनी आवाज़ उठाएं।

यादव ने कहा:

“भाजपा अपने सिवा किसी और का पेट भरते हुए नहीं देख सकती। गरीब कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!”

मनरेगा जैसी योजनाओं का महत्व केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में विकास, सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। अगर सरकार इसे कमजोर करती है, तो इसका प्रभाव सीधे ग्रामीण जीवन पर पड़ेगा। अखिलेश यादव का बयान इस बात की चेतावनी है कि इस दिशा में कोई भी कदम राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से गंभीर परिणाम ला सकता है।

सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि मनरेगा का नाम बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं होना चाहिए; इसके प्रभाव और कार्यान्वयन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। सरकार और विपक्ष दोनों को इस पर विचार करना आवश्यक है ताकि ग्रामीण भारत के लोगों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

 

Ashish Sinha

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