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चोल काल के ऐतिहासिक ताम्रपत्र लौटेंगे भारत: पीएम मोदी की मौजूदगी में नीदरलैंड ने सौंपी 11वीं सदी की बहुमूल्य विरासत | Chola Copper Plates






चोल साम्राज्य के ऐतिहासिक ताम्रपत्रों की भारत वापसी: पीएम मोदी की मौजूदगी में नीदरलैंड ने सौंपे 11वीं सदी के ऐतिहासिक दस्तावेज


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बड़ी जीत: भारत लौटेंगे 11वीं सदी के ‘चोल ताम्रपत्र’

डच सरकार और लाइडेन यूनिवर्सिटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में सौंपी भारत की ऐतिहासिक विरासत

स्थान: द हेग, नीदरलैंड
दिनांक: 17 मई, 2026
स्रोत: विशेष ब्यूरो / विदेश मंत्रालय (MEA)

द हेग: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक गौरव की वैश्विक पुनर्स्थापना की दिशा में एक और युगांतरकारी सफलता मिली है। अपनी आधिकारिक नीदरलैंड यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक समारोह में हिस्सा लिया, जहां 11वीं शताब्दी के ऐतिहासिक चोल ताम्रपत्रों (Chola Copper Plates) को आधिकारिक रूप से भारत को सौंप दिया गया। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में आयोजित इस विशेष प्रत्यावर्तन (Repatriation) समारोह में डच सरकार और लाइडेन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इन अमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेजों को भारत सरकार को सुपुर्द किया। लगभग डेढ़ शताब्दी से भी अधिक समय के बाद भारत के महानतम राजवंशों में से एक, चोल साम्राज्य के इन राजकीय अभिलेखों की वतन वापसी हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण बन गई है।

१. हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

ताम्रपत्रों की वापसी पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के सांस्कृतिक गौरव का एक अहम दस्तावेज बताया। उन्होंने इस ऐतिहासिक कदम के लिए डच सरकार और लाइडेन यूनिवर्सिटी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आधिकारिक संदेश:

“हर भारतीय के लिए एक अत्यंत आनंदमयी क्षण! 11वीं शताब्दी के चोल ताम्रपत्र नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे। प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में इसके लिए आयोजित समारोह में भाग लिया। चोल ताम्रपत्रों के इस सेट में 21 बड़े पत्र और 3 छोटे पत्र शामिल हैं, जिनमें मुख्य रूप से दुनिया की सबसे खूबसूरत भाषाओं में से एक, तमिल भाषा में ग्रंथ लिखे हुए हैं।”

प्रधानमंत्री ने आगे बताया कि ये ताम्रपत्र महान सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम (Rajendra Chola I) से संबंधित हैं, जिन्होंने अपने पिता राजा राज चोल प्रथम (Rajaraja I) द्वारा किए गए एक मौखिक वादे को कानूनी और लिखित रूप दिया था। यह ऐतिहासिक दस्तावेज चोल राजवंश के अद्वितीय शासन तंत्र, उनकी संस्कृति और उनकी अद्वितीय नौसैनिक शक्ति (Maritime Prowess) को दुनिया के सामने प्रदर्शित करता है।

२. राजेंद्र चोल प्रथम और राजराजा प्रथम का काल: क्या लिखा है इन ताम्रपत्रों में?

पिता के वचन को पुत्र ने किया पूरा

इतिहास के पन्नों को पलटें तो दक्षिण भारत का चोल राजवंश अपनी बेहतरीन शासन व्यवस्था, भव्य तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर जैसे स्थापत्य और मजबूत नौसेना के लिए जाना जाता है। सौंपे गए ताम्रपत्रों का सीधा संबंध साम्राज्य के दो सबसे प्रतापी राजाओं—राजराजा चोल प्रथम और उनके महान पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम से है।

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इन ताम्रपत्रों में दर्ज विवरणों के अनुसार, सम्राट राजराजा चोल प्रथम ने अपने शासनकाल के दौरान लोक कल्याण या किसी धार्मिक-सामाजिक कार्य के लिए एक मौखिक भूमि दान या विशेषाधिकार देने का संकल्प (मौखिक प्रतिबद्धता) लिया था। उनके बाद, जब उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम सिंहासन पर बैठे, तो उन्होंने अपने पिता के उस मौखिक वचन का आदर करते हुए उसे ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करवाकर एक स्थायी राजकीय आदेश (Royal Decree) का रूप दिया।

तमिल भाषा और लिपि का बेजोड़ संगम

इन पत्रों पर मुख्य रूप से प्राचीन तमिल और कुछ हिस्सों में संस्कृत भाषा का उपयोग किया गया है। यह वह दौर था जब चोल साम्राज्य का प्रभाव केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने बंगाल की खाड़ी को ‘चोल झील’ में बदल दिया था और श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया तथा मालदीव तक अपनी नौसैनिक शक्ति का लोहा मनवाया था। ये ताम्रपत्र चोल काल की उन्नत प्रशासनिक प्रणाली, कर व्यवस्था और भूमि दान के नियमों की सटीक जानकारी देते हैं।

३. ताम्रपत्रों की तकनीकी और कलात्मक विशेषताएं

लौटाए जा रहे ऐतिहासिक दस्तावेजों की भौतिक और कलात्मक बनावट प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान (Metallurgy) की श्रेष्ठता को दर्शाती है:

विशेषता विवरण और तकनीकी विवरण
कुल पत्रों की संख्या कुल 24 ताम्रपत्र (21 बड़े आकार के मुख्य पत्र और 3 छोटे पूरक पत्र)
ऐतिहासिक कालखंड 11वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 1000 वर्ष से अधिक पुराने)
मुख्य भाषाएं प्राचीन तमिल (मुख्य पाठ) और संस्कृत (प्रशस्ति खंड)
राजवंश संबंध शाही चोल राजवंश (राजराजा चोल प्रथम एवं राजेंद्र चोल प्रथम)
सामग्री और सुरक्षा शुद्ध तांबे की परतें, जो एक विशेष धातु के छल्ले (Ring) से आपस में जुड़ी हुई हैं, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर (Royal Seal) अंकित है।

लाइडेन यूनिवर्सिटी में कैसे पहुंचे ये ताम्रपत्र?

19वीं शताब्दी के मध्य (Around 1850s) में, ब्रिटिश और डच औपनिवेशिक काल के दौरान, ये ताम्रपत्र भारत से बाहर ले जाए गए थे और बाद में इन्हें नीदरलैंड की प्रसिद्ध लाइडेन यूनिवर्सिटी (Leiden University) के संग्रहालय और पुस्तकालय में अनुसंधान के लिए सुरक्षित रख दिया गया था। पिछले कई दशकों से भारत सरकार और संस्कृति मंत्रालय इन ऐतिहासिक पुरावशेषों को वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहे थे, जो अब जाकर सफल हुए हैं।

४. चोल संस्कृति और नौसैनिक शक्ति (Maritime Prowess) पर भारत को गर्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में विशेष रूप से चोलों की नौसैनिक ताकत का जिक्र किया। आज के आधुनिक युग में भी सैन्य रणनीतिकार चोल साम्राज्य की समुद्री कूटनीति का अध्ययन करते हैं। चोलों के पास उस दौर में दुनिया का सबसे आधुनिक जहाजरानी बेड़ा था, जिसके बल पर उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ मजबूत व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए थे।

इन ताम्रपत्रों का भारत आना केवल कुछ धातुओं के टुकड़ों की वापसी नहीं है, बल्कि उस कालखंड के लिखित प्रमाणों की घर वापसी है जो यह साबित करते हैं कि भारत सदियों पहले से ही एक वैश्विक महाशक्ति और समुद्री व्यापार का केंद्र रहा है। तमिल भाषा को दुनिया की सबसे पुरानी और जीवंत भाषाओं में से एक बताते हुए प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच पर तमिल संस्कृति की महत्ता को एक बार फिर रेखांकित किया है।

५. सांस्कृतिक कूटनीति: मोदी सरकार में ऐतिहासिक धरोहरों की घर वापसी

पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार की सक्रिय सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) के कारण दुनिया भर के विभिन्न देशों से भारत की चोरी हुई या अतीत में बाहर ले जाई गई सैकड़ों बहुमूल्य मूर्तियों, पांडुलिपियों और पुरावशेषों को वापस लाया गया है। नीदरलैंड द्वारा चोल ताम्रपत्रों को सौंपना इसी सफल कूटनीतिक कड़ी का एक हिस्सा है। भारत और नीदरलैंड के बीच बने मजबूत दोस्ताना संबंधों और साझा हितों के चलते डच सरकार ने इन प्राचीन अभिलेखों को सहर्ष भारत को लौटाने का फैसला किया।

संपादकीय निष्कर्ष: इतिहास का न्याय और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर

नीदरलैंड की धरती से चोल कालीन ताम्रपत्रों की भारत वापसी हमारे इतिहास और जड़ों के प्रति एक बड़ा सम्मान है। ये 24 ताम्रपत्र केवल राजेंद्र चोल के राजकीय आदेश नहीं हैं, बल्कि ये इस बात के जीवित गवाह हैं कि हमारी सनातन संस्कृति में ‘वचन की महत्ता’ क्या थी—जहां एक बेटे ने अपने पिता के सिर्फ एक मौखिक आश्वासन को पूरा करने के लिए उन्हें तांबे की प्लेटों पर हमेशा के लिए अमर कर दिया। लाइडेन यूनिवर्सिटी से इन पत्रों का भारत आना हमारी कूटनीतिक और सांस्कृतिक नीति की एक बहुत बड़ी सफलता है। इन ऐतिहासिक धरोहरों को अब भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा जाएगा, जहां आने वाली पीढ़ियां और शोधकर्ता हमारे महान चोल पूर्वजों के गौरव, उनकी प्रशासनिक दूरदर्शिता और तमिल भाषा की महानता को करीब से देख और समझ सकेंगे।

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यह ऐतिहासिक रिपोर्ट भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय के आधिकारिक विवरणों पर आधारित है।


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