ग्वालियर के भितरवार में बड़ा हादसा: उप स्वास्थ्य केंद्र की जर्जर ओपीडी का प्लास्टर गिरने से आशा कार्यकर्ता के सिर में गंभीर चोट, मलबे के बीच बाल-बाल बचीं गर्भवती महिलाएं
डबरा/ग्वालियर: मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिला अंतर्गत भितरवार विकासखंड के पवाया गांव से एक बेहद चिंताजनक और डराने वाली खबर सामने आई है। यहाँ के स्थानीय उप स्वास्थ्य केंद्र (Sub-Health Centre) में बुधवार को ओपीडी संचालन के दौरान एक बड़ा हादसा हो गया। मरीजों के इलाज के लिए चिन्हित ओपीडी कमरे की जर्जर छत का एक बड़ा हिस्सा (प्लास्टर) अचानक भरभरा कर नीचे आ गिरा। इस आकस्मिक घटना की सीधी चपेट में आने से वहाँ ड्यूटी पर तैनात आशा कार्यकर्ता कपूरी बाई नामदेव गंभीर रूप से घायल हो गई हैं। उनके सिर पर मलबे का भारी टुकड़ा गिरने के कारण गहरी चोट आई है और अत्यधिक रक्तस्राव हुआ है।
जिस वक्त यह भयानक वाकया हुआ, उस समय ओपीडी कक्ष के भीतर कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (CHO) ध्रुव जाटव, आशा कार्यकर्ता कपूरी बाई नामदेव और प्रवेश गुर्जर अपनी नियमित शासकीय सेवाओं का संपादन कर रहे थे। स्वास्थ्य कर्मियों के साथ ही रूटीन चेकअप और उपचार के लिए आई दो ग्रामीण गर्भवती महिलाएं संजू आदिवासी और मुस्कान आदिवासी भी ठीक उसी छत के नीचे बैठी हुई थीं। प्लास्टर गिरते ही कमरे में चीख-पुकार मच गई। यह महज एक सुखद संयोग रहा कि मलबे की मुख्य जद में बाकी लोग नहीं आए, अन्यथा एक बेहद दर्दनाक और जानलेवा त्रासदी घटित हो सकती थी।
हादसे के बाद अफरा-तफरी, घायल कार्यकर्ता को तत्काल पहुँचाया गया अस्पताल
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, बुधवार को उप स्वास्थ्य केंद्र में रोजाना की तरह ही ओपीडी की प्रक्रिया चल रही थी। आसपास के ग्रामीण अंचलों से गरीब और जरूरतमंद मरीज अपनी बीमारियों का परामर्श लेने पहुँचे हुए थे। तभी अचानक बिना किसी चेतावनी के छत का एक बड़ा हिस्सा भरभरा कर नीचे गिर गया। कमरे में चारों तरफ धूल का गुबार और सीमेंट-रेत का मलबा बिखर गया।
प्लास्टर का एक भारी और नुकीला हिस्सा सीधे आशा कार्यकर्ता कपूरी बाई के सिर पर लगा, जिससे वह वहीं लहूलुहान होकर गिर पड़ीं। केंद्र में मौजूद अन्य स्टाफ और ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए मलबे के बीच से उन्हें बाहर निकाला। घटना के तुरंत बाद गंभीर रूप से घायल आशा कार्यकर्ता को आनन-फानन में नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHH) ले जाया गया, जहाँ उपस्थित चिकित्सकों की टीम ने आपातकालीन स्तर पर उनका उपचार शुरू किया। डॉक्टरों के अनुसार, सिर की चोट गंभीर है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है।
चार साल पहले हुई थी सिर्फ कागजी ‘लीपापोती’, भ्रष्टाचार और लापरवाही की खुली पोल
इस हादसे ने स्वास्थ्य विभाग के दावों और सरकारी भवनों के रखरखाव की जमीनी हकीकत को पूरी तरह से उजागर कर दिया है। पवाया गांव के स्थानीय निवासी ब्रजेश और संजय ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यह उप स्वास्थ्य केंद्र पिछले कई वर्षों से अत्यंत दयनीय और खस्ताहाल स्थिति में आंसू बहा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि विभाग के तकनीकी अमले और ठेकेदारों की मिलीभगत के कारण सरकारी पैसों का दुरुपयोग तो हुआ, लेकिन भवन की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। इसी कागजी मरम्मत और लापरवाही का खामियाजा आज एक निर्दोष महिला कर्मचारी को भुगतना पड़ा है।
अधिकारियों को कई बार लिखा पत्र, सबसे ‘सुरक्षित’ माने जाने वाले कमरे की छत भी गिरी: CHO ध्रुव जाटव
इस पूरे मामले पर उप स्वास्थ्य केंद्र के कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (CHO) ध्रुव जाटव ने एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि इस भवन की खस्ताहाल स्थिति के बारे में वे स्वयं और उनका स्टाफ कई बार लिखित रूप में उच्च अधिकारियों को अवगत करा चुके हैं। प्रशासनिक स्तर पर कई बार पत्राचार के माध्यम से यह मांग की गई थी कि इस जर्जर इमारत में कभी भी कोई अप्रिय घटना घट सकती है, इसलिए इसका विकल्प तलाशा जाए।
ध्रुव जाटव ने दर्द बयां करते हुए कहा, “पूरी बिल्डिंग में जितने भी कमरे हैं, उन सभी की हालत बेहद खतरनाक है। जिस कमरे में हम वर्तमान में ओपीडी का संचालन कर रहे थे, वह बाकी कमरों की तुलना में थोड़ा बेहतर और सुरक्षित दिखाई देता था। लेकिन आज अचानक उसका भी प्लास्टर भरभरा कर गिर गया। यह तो ऊपर वाले का शुक्र और हमारी अच्छी किस्मत थी कि किसी की जान नहीं गई, क्योंकि यहाँ रोजाना बहुत बड़ी संख्या में ग्रामीण और विशेष रूप से गर्भवती महिलाएं एवं छोटे बच्चे इलाज के लिए आते हैं।”
आक्रोशित ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: जांच और नए भवन की मांग पर अड़े लोग
इस हादसे की खबर जैसे ही पवाया और आसपास के गांवों में फैली, भारी संख्या में ग्रामीण उप स्वास्थ्य केंद्र पर एकत्रित हो गए। स्वास्थ्य विभाग के प्रति लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार एक तरफ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित प्रसव के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ गर्भवती महिलाओं को ऐसी इमारतों में बैठने पर मजबूर किया जाता है जो कभी भी जमींदोज हो सकती हैं।
ग्रामीणों की मुख्य मांगें:
- तत्काल तालाबंदी: इस खतरनाक, जर्जर और अनुपयुक्त घोषित होने लायक बिल्डिंग को तुरंत प्रभाव से सील या बंद किया जाए।
- सुरक्षित स्थान पर शिफ्टिंग: नए भवन के निर्माण होने तक स्वास्थ्य केंद्र को गांव की ही किसी अन्य सुरक्षित, पक्की या किराए की इमारत में शिफ्ट किया जाए ताकि मरीजों का इलाज प्रभावित न हो।
- दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: जर्जर भवन की शिकायतों को नजरअंदाज करने वाले और पूर्व में हुई घटिया मरम्मत के जिम्मेदार अधिकारियों व ठेकेदारों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच बैठाकर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
- नया अस्पताल भवन: पवाया गांव में जल्द से जल्द एक सर्वसुविधायुक्त नए उप स्वास्थ्य केंद्र के भवन की स्वीकृति देकर निर्माण कार्य शुरू कराया जाए।
ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया और इस जर्जर भवन में दोबारा ओपीडी शुरू करने की कोशिश की गई, तो वे उग्र आंदोलन और चक्काजाम करने के लिए मजबूर होंगे, जिसकी समस्त जिम्मेदारी जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की होगी।
ग्वालियर के भितरवार में घटित यह हादसा देश और प्रदेश की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सरकारी तंत्र को किसी कर्मचारी या मरीज की जान जाने का इंतजार रहता है, तभी जाकर फाइलों पर जमी धूल साफ होती है? यदि समय रहते पवाया के इस स्वास्थ्य केंद्र की मरम्मत या पुनर्निर्माण करा लिया जाता, तो आज एक आशा कार्यकर्ता अस्पताल के बेड पर दर्द से नहीं कराह रही होती। अब देखना यह है कि इस घटना के बाद जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि क्या कदम उठाते हैं।















